<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937</id><updated>2012-02-16T19:21:22.938+05:30</updated><category term='कहानी'/><category term='आत्‍मकथा'/><category term='ई बुक'/><category term='दस्‍तक'/><category term='26वीं कहानी'/><title type='text'>सूरज प्रकाश का रचना संसार.........</title><subtitle type='html'>sooraj prakash ka rachna sansaar</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>31</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-6116007417291117923</id><published>2009-09-18T15:25:00.002+05:30</published><updated>2009-09-18T15:31:18.971+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='26वीं कहानी'/><title type='text'>कहानी - छूटे हुए घर</title><content type='html'>वे महिलाएं अपनी जिंदग़ी के सबसे कठिन दौर से गुज़र रही थीं। वे बेहद चिड़चिड़ी हो गई थीं और हमेशा शिकायत के मूड में रहतीं। इन दिनों उनके पास बातचीत का सिर्फ एक ही टॉपिक था। इस विषय के अलावा वे न तो कुछ कहना चाहतीं, न सुनना। वे मौके या जगह की भी परवाह नहीं करती थीं, न यह देखती कि कोई उनका दुखड़ा सुनने के लिए तैयार भी है या नहीं। बस, उन्हें, ज़रा-सी शह मिली नहीं कि उनके दर्दभरे गीत शुरू हो जाते। वे अपना दुखड़ा न भी सुना रही होतीं, तब भी लगता, वे बिसूर तो ज़रूर ही रही थीं।&lt;br /&gt; इन रोने-धोने की वज़ह से उनकी सेहत खराब होने लगी थी। वे ज्यादा बूढ़ी, थकी-थकी-सी और चुक गई-सी लगने लगी थीं। उनके जीवन से बचा-खुचा रस भी विदा लेने लगा था और वे जैसे-तैसे दिन गुज़ार रही थीं। कुछ तो सचमुच ही बीमार हो गई थीं। अगर वे खुद बीमार नहीं थीं तो उनके परिवार का कोई न कोई सदस्य बीमार हो गया था और वे उसी की चिंता में घुली जा रही थीं।&lt;br /&gt; उनमें से अधिकतर की उग्र चालीस से पचास के बीच थी और वे मेनोपॉज के भीषण बेचैनी वाले कठिन दौर से गुज़र रही थीं, या किसी भी दिन उस दौर में जा सकती थीं। इस वज़ह से भी उनकी तकलीफें और बढ़ कई थीं। वे असहाय थीं। लाचार थीं। खुद को शोषित और पीड़ित तो वे मानती ही थीं। कुल मिलाकर उनके लिए ये बेहद तकलीफ भरे दिन थे।&lt;br /&gt; वैसे वे हमेशा से ऐसी नहीं थीं। वे सब की सब अच्छे घरों से आती थीं। पढ़ी-लिखी थीं। उनके स्कूल-कॉलेज जाने वाले बच्चे थे। रुतबे वाले पति थे। घर-बार थे। उनमें से कुछ के तो महानगर में खुद के फ्लैट्स भी थे। गाड़ियां थीं। उनके पास सुख-सुविधा का सारा सामान था। अच्छे-अछे अगने और ढेर सारी साड़ियां थीं। वे हर दृष्टि से भरपूर जीवन जी रही थीं। वे सब-की-सब अच्छा कमा रही थीं। कुछ का वेतन तो `कोई फोर फीगर' से बढ़कर `फाइव' फीगर तक पहुंचा था। और यही अच्छा कमाना उनके लिए अभिशाप बन गया था। वैसे देखा जाए तो उनके साथ कोई ऐसी गंभीर बात नहीं हुई थी कि वे सब-की-सब सदमा लगा बैठतीं या जिंदग़ी से इतनी बेज़ार हो जातीं। लेकिन वे अपनी ज़िंदगा की पहली बड़ी परीक्षा में ही फेल हो गई थीं और उनकी यह हालत हो गई थी।&lt;br /&gt; दरअसल वे सब-की-सब एक बहुत बड़े और महत्वपूर्ण संस्थान से जुड़ी हुई थीं। कुछ तो बहुत वरिष्ठ पदों पर भी कार्य कर रही थीं। इस संस्थान का प्रधान कार्यालय एक ऐसे महानगर में था, जिसमें वैसे तो ढेरों समस्याएं थीं, लेकिन वहां रहने वाले उस महानगर को बेहद प्यार करते थे। यह महानगर उनकी शिराओं में बहता था। उनकी सांस-सांस में रचा-बसा था। इस संस्थान की शाखाएं सभी प्रदेशों की राजधानियों में थीं। संस्थान में काम करना गर्व की बात माना जाता था, क्योंकि वहां बेतहाशा सुविधाएं थीं और वहां नौकरी का मतलब सुशी जीवन की गारंटी हुआ करता था। महानगर में स्थापित इस प्रधान कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों में महाओं का अनुपात अन्य केंद्रों की तुलना में बहुत अधिक था। यह अनुपात भी एक मायने में उनके लिए अभिशाप बन गया था।&lt;br /&gt; उनकी खुद की निगाह में, यह अभिशाप था-उनका ट्रांसफर। हालांकि इस ट्रांसफर में कूछ भी नया या गलत नहीं था। संस्थान के नियम और ज़रूरतें ही ऐसी थीं। ये ट्रांसफर अरसे से होते आ रहे थे और हर बरस होते ही थे। जो अधिकारी सीधी भर्ती से आते थे, जिनमें अक्सर लड़कियां भी होती थीं, वे इन स्थानांतरणों को सहर्ष स्वीकार कर लेते थे, क्योंकि वे जानते थे, कैरियर की सीढ़ी लगातार चढ़ते रहने के लिए पांच-सात ट्रंसफर तो देखने ही होंगे। फिर उनकी उम्र भी कम होती थी। वे कुछ भी कर गुज़रने के जोश से लबालब भरे होते। लेकिन समस्या उन अधिकारियों की होती जो संस्थान में ही पंद्रह-बीस बरस की नौकरी करने के बाद अधिकारी बनते थे। इनमें से भी महिलाओं के साथ ज्यादा समस्याएं होतीं। ट्रंसफर की बारी आते-आते वे उम्र के चार दशक पार कर चुकी होती। घर-बार सैठिल कर चुकी होतीं। जीवन में स्थायित्व आ चुका होता। बच्चे बड़ी कक्षाओं में पहुंचने को होते। लड़कियां होतीं तो वे उपनी उम्र के सबसे नाजुक मोड़ पर होतीं, जहां उन्हें पिता की नहीं, मां की ही ज़रूरत होती। उम्र के ये दौर ही उनके लिए अभिशाप बन कर आए थे।&lt;br /&gt; पिछले दो-तीन बरसों से संयोग कुछ ऐसा बन रहा था कि इन दिनों जितने भी ट्रंसफर हुए, हर सूची में इस महानगर की महिलाएं ही अधिक रहीं, जिन्हें वरिष्ठता क्रम से बाहर भेजा जाना था। अलबत्ता, इन महिलाओं के साथ संस्थान ने इतना लिहाज ज़रूर किया था कि उन्हें निकटतक प्रदेश की राजधानी में ही भेजा था, जहां से वे रातभर की यात्रा करके आ-जा सकती थीं। उनकी तुलना में उनके पुरुष सहकर्मी दूर-दूर के केंद्रो पर भेजे गए थे। इसके बावजूद ये महिलाएं खुद को अभिशप्त मान रही थीं।&lt;br /&gt; ये अभिशप्त महिलाएं हर तरफ से घिर गई थीं। एक तरफ घर-बार था। पढ़ने और महंगी जींस पहनने वाले लड़के थे। सपने देखने वाली जवान होती लड़कियां थीं, जिन्हें लगातार अपनी मांओं की ज़रूरत थी और दूसरी तरफ इन सबकी बेतहाशा बढ़ चुकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें नौकरी करते रने की ज़रूरत थी। उनमें से कुछ ही महिलाएं ऐसी थीं जो, आदतवश, वक्त गुज़ारने के लिए नौकरी कर रही थीं। वे बहुत अच्छे  घरों से थीं और नौकरी न करके भी अपना स्तर बनाए रख सकती थीं। बल्कि नौकरी करके वे जितना कमाती थीं, नौकरी के लिए खुद को सजाने-संवारने में उससे कहीं अधिक खर्च कर डालती थीं। कुछ ऐसी भी थीं, जिनके पति छोटी-मोटी या प्राइवेट नौकरी में थे और घर इन महिलाओं के वेतन से ही चल रहे थे। अगर नहीं भी चल रहे थे, तो भी उनकी अतिरिक्त और अच्छी-खासी आमदनी से उनके परिवार जिस तरह की सुख-सुविधाओं के आदी हो चुके थे, उन्हें त्यागने की वे लोग सोच भी नहीं सकते थे। कुछ महिलाओं ने कर्जे लेकर मकान बनवा लिये थे, या गाड़ी वगैरह खरीद ली थी, जिसकी किस्तें चुकाने के लिए उनका नौकरी करते रहना ज़रूरी था। उनकी यह मज़बूरी थी कि वे अगर नौकरी छोड़ना भी चाहतीं तो भी उनका परिवार उन्हें ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता था।&lt;br /&gt; निश्चित तारीख को उन्हें रिलीव कर दिया गया था। जो हैसियत वाली थीं और शौकिया नौकरी कर रही थींए उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। कुछ ऐसी भी थीं जो इस उम्र में अकेली रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं, या जिन्हें डर था, उनके बिना उनका घर-बार टूट-बिखर जाएगा, उनके सामने भी नौकरी छोड़ने के अलावा और कोई रास्ता न था। कुछ घबरा कर बीमारी की छुट्टी पर चली गई थीं, तो कुछ सचमुच बीमार पड़ गई थीं। लेकिन उन्हें भी कभी न कभी तो ठीक होना ही था और नए केंद्रों पर ज्वाइन भी करना ही था।&lt;br /&gt;अधिकतर महिलाओं के सामने समस्या यह थी कि वे कभी अकेली घर से बाहर निकली ही नहीं थीं। चार-पांच साल तक घर से अलग रहने की सोच-सोच कर उनकी रूह कांप रही थी। अधिकतर परिवारों की हालत ऐसी थी कि वे बच्चों को, परिवार को, नौकरीशुदा पति को, सास-ससुर को अपने साथ नहीं ले जा सकती थीं, या वे खुद इस पक्ष में नहीं थीं कि उनकी वजह से चार-पांच बरस के लिए पूरी गृहस्थी उजाड़ी जाए। वे गहरे असमंजस में थीं। ज्यादातर घरों में कई-कई दिन तक सलाह-मशविरे चलते रहे थे। आगा-पीछा सोचा गया था और अंतत: नये केंद्र पर ड्यूटी ज्वाइन कर ली गई थी। उन्होंने सोचा था-पहले जाएंगी तो पहले लौटेंगी। रो-धो कर बाकी महिलाएं भी वहां पहुंची थीं।&lt;br /&gt; यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई थी। वे एक तरह से बेघर हो गई थीं। यहां उन्हें नये सिरे से गृहस्भी जमानी थी। अपनी पहचान बनानी थी और अगले कई बरस तक अपने बिछुड़े परिवार के लिए ऐशो-आराम जुटाते रहने के लिए अकेले खटना था। संस्थान उन्हें यह सुविधा देता था कि जब तक उन्हें नये केंद्र पर रहने की जगह उपलब्ध नहीं करा दी जाती, वे दो महीने तक संस्थान के खर्चे पर किसी स्तरीय होटल में ठहर सकती थीं, लेकिन उनमें से कोई भी होटल में नहीं ठहरी थी। अकेली कैसे ठहर सकती थीं। कभी ठहरी ही नहीं थीं। सबने उन्हीं महिलाओं के यहां डेरे डाले थे, जो उनसे पहले यहां आ चुकी थीं और जिन्हें फ्लैट मिल चुके थे। दर असल, वे आयी ही उनके सहारे थीं कि चलो, कोई तो है अपना कहने को।&lt;br /&gt; वे शुरू-शुरू में आधी-अधूरी तैयारी के साथ आयी थीं। संस्थान के फिलहाल कुछ को रहने के लिए सजे-सजाए सिंगल रूम दे दिये थे और कुछ के हिस्से में शेयरिंग आवास की सुविधा आई थी, जहां एक-एक फ्लैट में तीन-तीन, चार-चार महिलाएं नाम-मात्र के किराये पर रह सकती थीं। तभी अचानक उन सबमें यह परिवर्तन आया था। इसे संयोग माना जाए या दुर्घटना, लेकिन जो कुछ हुआ था, उस पर विश्वास करने को जी नहीं चाहता था। ये मैच्योर और समझदार महिलाएं, जो संस्थान में बड़े-बड़े फैसले लिया करती थीं, अकेले के बलबूते पर विभाग तक संभालती थीं, अचानक लड़ने लगी थीं। शिकायतें करने लगी थीं। जिन महिलाओं के हिस्से में सिंगल रूम आए थे, उन्हें शिकायत थी-हम कभी अकेली नहीं रही हैं। हमें डर लगता है। हमें शेयरिंग आवास दिया जाए। जिन्हें शेयरिंग आवास दिया गया था, उन्हें अपनी पार्टनर पसंद नहीं थीं। वे कभी एनसीसी के कैंपों में नहीं गई थीं। न कभी ट्रैकिंग वगैरह में ही गई थीं। उन्हें शेयर करने की आदत नहीं थी। न कमरा, न रोजमर्रा की चीज़ें और नही प्रायवेसी। उन्होंने आज तक राज किया था अपने-अपने घरों में, बच्चों, पतियों पर, नौकरों पर। वहां वे मालकिन हुआ करती थीं और पूरी व्यवस्था, सेटिंग और मूवमेंट पर पूरा नियंत्रण रखती थीं। वहां सब कुछ उनकी इच्छानुसार हुआ करता था। लेकिन इस ट्रंसफर ने उनकी हैसियत, राजपाट और नियंत्रण का दायरा एक ही झटके में बिस्तर भर की जगह में सीमित कर दिया था। यहां उन्हें सब कुछ शेयर करते रहना था-किचन, ड्राइंगरूम, बाथरूम, यहां तक कि बर्तन भी। यहां हुकुम चलाने या सैट करने जैसा कुछ भी नहीं था। यहां न परिवार के साथ शाम की चाय थी, न पति के साथ खुसुर-पुसुर। यहां कोई उनके आदेश पर एक गिलास पानी या चाय लोने वाला नहीं था, क्योंकि वे सब की सब वरिष्ठ अधिकारी थीं, सहकर्मी थीं। हमउम्र थीं। वे यहां एक-दूसरे के जूठे बर्तन मांजने तो कत्तई नहीं आई थीं। शुरू-शुरू में उन्होंने कुछ समझौते भी किए। जिसके साथ भी ठहराया गया, ठहर गईं। मिल-जुलकर सामान भल ले आईं। एक सब्जी बना लेती, तो दूसरी फटाफट चपातियां बेल देती। तीसरी इस बीच सलाद बना देती। चाय के बर्तन धो देतीं। फिलहाल उनका पहला मकसद था-कम से कम खर्च में खुद गुज़ारा करके महानगर में अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे भेजना। यहां आ जाने के बाद उन्हें बीच-बीच में की जाने वाली रेलयात्राओं और एसटीडी फोनों के लिए भी अतिरिक्त पैसे बचाने ही थे।&lt;br /&gt; वैसे भी वे अकेले या बिना परिवार के होटलों में खाना खाने नहीं जाती थीं, बेशक शहर में अच्छे होटलों की कोई कमी नहीं थी और शहर के लाग बेहद शरीफ थे। वे अकेली औरत को दखकर लार नहीं टपकाते थे। अगर लोग शरीफ न भी होते तो भी कम से कम इन भद्र महिलाओं को, जिनकी उम्र चालीस से पचास के बीच थी और जो आजकल उदास-उदास रहा करती थीं, उनसे कोई खतरा नहीं हो सकता था। हालांकि इन महिलाओं ने अपना सारा जीवन देश के आधुनिकतम कहे जाने वाले महानगर में बिताया था, फिर भी वे पहले घरेलू महिलाएं थीं और बाद में आधुनिक। इसीलिए कभी-कभार होटल से खाना पैक करवा कर ले आती थीं। इसी में उन्हें सुभीता रहता था।&lt;br /&gt; तो अभी जिक्र हुआ था इन महिलाओं का अचानक आम औरतों में बदल जाने का। अब सचमुच ये महिलाएं शक्की, झगड़ालू और नाक-भौं सिकोड़ने वाली हो गई थीं, जिनकी नाक पर हर समय गुस्सा घरा रहता था। वैसे भी उन्होंने कभी ज़िंदगी में शेयर नहीं किया था, मिल-जुलकर नहीं रही थीं और कभी झुकी नहीं थीं। अब मामूली-सी बात को लेकर भी वे अपनी पार्टनरों से लड़ पड़तीं। बेशक यह लड़ना सार्वजनिक नल पर होने वाले लड़ने के स्तर तक नहीं उतरा था फिर भी गुबार तो निकाला जाता ही था। वे अब इस बात पर भी आपस में बोलना छोड़ सकती थीं कि वे चप्पल पहन कर रसोई में चली आती हैं... जब मैं अखबार पढ़ रही होती हूं तो ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाकर आरती करती हैं... चाय के अपने जूठे कप कहीं भी छोड़ देती हैं... बाथरूम... गंदे बालों से भरी गंदी कंघी..., वाशबेसिन... वगैरह... वगैरह...। ऑफिस में बीसियों कर्मचारियों पर नियंत्रण करने वाली और महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली महिलाएं अब इस बात पर भी लड़ लेती थीं कि ड्राइंगरूम में घूम रहा तिलचट्टा कौर मारे या देर रात या अल सुबह दरवाजे की घंटी बजने पर दरवाजा कौन खोले, या फिर रोज सुबह दूध कौन ले। कई बार खर्च शेयर करने को लेकर भी पंजे लड़ जाते। ये और ऐसी ढेरों बातें थीं जिनकी वजह से इस खूबसूरत, हरे-भरे, शालीन लोगों वाले फाश इलाके में रहने वाली ये भद्र महिलाएंं अपनी सुबह खराब करती थीं, दोपहर भर कुढ़ती रहती थीं। बेहद खूबसूरत शामों को, जब मौसम को देखकर किसी का भी मन खिल उठना चाहिए, वे या तो अपने डेरे पर आने से कतरातीं या सांझ ढले अपने-अपने दरवाजे बंद कर लेतीं। रात के वक्त जब सारा शहर उत्सव के मूड में होता, देर रात तक आवारागर्दी करता, शुशियां बांटता रहता, वे बिसूरते हुए करवटें बदलती रहती थीं।&lt;br /&gt; सुबह उठते समय आम तौर पर सभी पार्टनरों के चेहरों पर मुर्दनगी छायी होती और उनके सामने मनहूस चेहरों को देखते हुए एक और मनहूस दिन काटने के लिए होता। वे भारी मन से ऑफिस पहुंचतीं। वहां मन की यह भड़ास लंच टाइम में दैनिक किस्तों में अलग-अलग मेजों पर निकलती। एक ही फ्लैट शेयर करने वाली महिलाएं एक ही मेज पर कभी नहीं बैठतीं। कई बार वे पहले ही फोन पर तय कर लेतीं, आज किसे अपनी रामकहानी सुनानी है। हर महिला को ही कुछ न कुछ कना होता। उनमें से हरेक को श्रोताओं की ज़रूरत होती। अजीब हालत हो जाती। सभी बोलना चाहतीं। सुने कौन। उन मेजों पर बैठे पुरूष सहकर्मियों की अजीब हालत होती। उनके सामने ही ये भद्र महिलाएं अपनी ही सहकर्मियों, सखियों, दिन-रात की, खाने-पीने की साथिनों की छीछालेदर करतीं। उनके बखिए उधेड़तीं। सब की सब कोई माकूल सा कंधा तलाशते ही रोने लगतीं।&lt;br /&gt; कई बार ऐसा भी होता कि वे आपस में सलाह-मशविरा करके अपने पार्टनर बदलने का फैसला कर लेतीं। ऑफिस में कह-सुनकर कागज़ी कार्रवाई करवा लेतीं। कुछ दिन तो नयी पार्टनरों के साथी ठीक-ठाक चलता, फिर वहां भी वही पुरानी रागिनी छिड़ जाती। फ्लैट बदले जा सकते थे। पार्टनर बदले जा सकते थे, लेकिन जो जीज़ कोई नहीं बदल सकता था, वह था उनका खुद का स्वभाव, जिसके बारे में उनमें से कोई भी नहीं जानता था कि उसे बदल देने भर से सारी समस्याएं खुद-ब-शुद सुलझ जाया करती हैं। वे खुद को बदलने के बारे में सोच भी नहीं सकती थीं।&lt;br /&gt; इनकी तुलना में कुछ र्साभाग्यशाली महिलाएं ऐसी भी थीं जिन्हें वरिष्ठताक्रम से पूरा फ्लैट मिल गया था। लेकिन खुश वे भी नहीं थीं। जिन्हें ये फ्लैट लीज़ पर लेकर दिए गए थे, उन्हें भी ढेरों शिकायतें थीं-फ्लैट दूर है... गंदा है... पड़ोस खराब है... धूप बहुत आती है... धूप नहीं आती... ग्राउंड फ्लोर पर है... नहीं है... सुरक्षित नहीं है। लड़-झगड़ कर अपने लिए अलग फ्लैट ले लेने के बाद भी वे वहां अकेली नहीं रहती थीं। उन्हें डर लगता था। महंगा भी पड़ता था। अकेले वक्त भी नहीं गुज़रता था। यहां उन्हें एक सुविधा ज़रूर थी कि अपनी मर्जी से पार्टनर रख और बदल सकती थीं। इसके बावजूद खुश वे भी नहीं थीं।&lt;br /&gt; इनकी तुलना में कुछेक महिलाओं ने इन सारी समस्याओं का एक अलग ही हल खोज लिया था। व अपने एकाध बच्चे को अपने साथ ले आई थीं और वहीं उसका एडमिशन करवा दिया था। उनके लिए कुछ हद तक जीवन र्साक बन गया था। वक्त तो अच्छी तरह गुजरता ही था, यह तसल्ली भी रहती कि बच्चे को अपनी निगरानी में पाल-पोस रही हैं।&lt;br /&gt; ये अकेली, परिवार से बिछ़ुड़ी महिलाएं महानगर जाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। छुट्टियों की सूची मिलते ही वे साल भर का शेड्यूल बना लेतीं, कब-कब जाया जा सकता है। किसी नेता वगैरह के मरने पर होने वाली छुट्टी उनके लिए बोनस की तरह होती। कुछ तो बिला नागा हर शनिवार की रात की गाड़ी से जातीं, दिन भर वहां खटतीं, घर-परिवार की पटरी से उतरी गाड़ी संवारतीं और रात की ट्रेन से लौट आतीं। उनके पास हर वक्त अगले कई हफ्तों के आने-जाने के कन्फर्म टिकट होते।&lt;br /&gt; कई बार वे एक दिन के लिए जातीं और महीनों नहीं लौटती थीं। बीमार पड़ जातीं या बीमारी की छुट्टी ले लेतीं। ऐसे में उनकी कन्फर्म टिकटों पर उनकी हमउम्र सहेलियां यात्रा करतीं। उनके छुट्टी पर बेठ जाने से ऑफिस के कामकाज का नुकसान होता था, लेकिन वे परवाह नहीं करती थीं। उनका कहना था-हमारी ही कौन परवाह करता है। इन महिलाओं में कुछ ऐसी भी थीं जिन्होंने विवाह नहीं किया था और महानगर में अकेली रहती आई थीं। वे भी बिला नागा महानगर आती-जाती रहतीं, क्योंकि महानगर उनकी हर धड़कन में इतना रचा-बसा था कि उसे बार-बार देखे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता था। जब तक वे वहां जाकर वहां की हवा की सांस नहीं ले लेतीं थीं, उन्हें ऊर्जा नहीं मिलती थी।&lt;br /&gt; कुछ ऐसी भी रहीं जिन्होंने यहां आने के बाद परिस्थितियों से घबरा कर नौकरी छोड़ दी थी, जबकि कुछ इर इंतज़ार में थीं कि कब वे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवश्यक वर्ष पूरे करें और घर बैठें। जो यहां कई बरस पहले आई थीं, वे किसी भी दिन लौटने की आस लगाए बैठी थीं। वे हर दिन प्रधार कार्यालय से आने वाली डाक का इंतज़ार करतीं। उनकी हालत लेट चल रही ट्रेन के इंतज़ार में प्लेटफार्म पर बैठे यात्रियों जैसी थी। वे अरसे से आधे घंटे के नोटिस पर शहर छोड़ने की तैयारी किए बैठी थीं। इंतजार था कि खत्म नहीं होता था।&lt;br /&gt; उधर कुछ महिलाओं के यहां चले आने से उनके घर-परिवार वाले गंभीर रूप से बीमार हो गए थे या दिल हार बैठे थे। ऐसी महिलाओं को एक विशेष मामले के रूप में, एक वर्ष के लिए उन्हीं के खर्च पर वापस भिजवा दिया जाता था। यह अवधि बढ़ाई नहीं जाती थी, अलबत्ता, उस हालत में कम ज़रूर कर दी जाती थी, जब मरीज ही उससे पहले चल दे। यानी महिलाओं का विशेष मामले पर लौटने का आधार ही न रहे। संस्थान इसी लिखित शर्त पर उन्हें भेजता था। इसी के साथ एक और शर्त नत्थी कर दी जाती थी कि साल भर बाद, या उससे पहले, जैसी भी स्थिति हो, उन्हें किसी और केंद्र पर भी भेजा जा सकता था। सशर्त वापसी का लाभ उठाने में आमतौर पर महिलाएं डरती थीं। हां, अगर उन्होंने ठान ही लिया हो कि साल भर बाद नौकरी छोड़नी है, तो वे किसी न किसी तिमड़म से किसी की बीमारी का बहाना लेकर एक बरस के लिए लौट आतीं और जब बाद में उन्हें कहीं और भेजा जाता तो वे नौकरी छोड़ देती थीं। इस तरह वे अपने परिवार के पास एक बरस पहले पहुंच जाती थीं।&lt;br /&gt; कुल मिलाकर ये सारी भद्र महिलाएं बहुत मुश्किल से अपने दिन गुज़ार रही थीं। यह शहर बेहद शूबसूरत था, सांस्कृतिक गतिविधियों की कोई कमी नहीं थी। अच्छे पुस्ताकालय थी, घूमने-फिरने की जगहें थीं, लेकिन चूंकि उन्हें लगातार अपने बिछ़ुड़े घर की याद आती रहती थी, उन्हें यहां कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। उन्होंनक अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ घर और परिवार ही जाना था, इसलिए वे लिखने, पढ़ने, घूमने या जीने जैसा कुछ सोच ही नहीं पाती थीं। उन्होंने इतने बरसों में इस शहर को ढंग से देखा भी नहीं था, क्योंकि उनकी आंखों के आगे हर वक्त महानगर और उसमें अपना परिवास झिलमिलाता नज़र आता रहता था। वैसे तो इस बात पर भी बहस की जा सकती थी कि उन्होंने अपना महानगर ही मितना देशा या जाना था। छुट्टी के दिन उनके लिए बहुत भारी गुज़रते थे। कुछ भी तो करने के लिए नहीं होता था। अगर शेयरिंग पार्टनरों से बातचीत बंद हो तो और भी तकलीफ़ होती थी। दिन गुजरे नहीं गुज़रता था। कभी-कभार ही ऐसा हो पाता था कि वे मनमुटाव भुलाकर, मिलजुल कर खाने का प्रोग्राम बनाएं, या कहीं शॉपिंग पर जाएंं। वैसे वे एक-दूसरे से मिलने दूसरे फ्लैटों में भी चली जाती थीं। &lt;br /&gt; उनमें से कुछ को संस्थान के काम से आसपास के शहरों में निरीक्षण के लिए जाने की ज़रूरत पड़ती थी। कभी-कभी ये निरीक्षण इस तरह के पिछड़े या दूरदराज के इलाकों में होते, जहां रहने-खाने की तकलीफ होती। ऐसे निरीक्षणों पर जाने से वे भरसक बचतीं। कभी पूरी टीम में अकेली महिला होने के बहाने से, तो कभी किसी अन्य कारण से। ऐन वक्त पर उनके मना कर देने से या बीमारी की छुट्टी लेकर बैठ जाने से निरीक्षण का सारा शेड्यूल बिगड़ जाता। लेकिन अगर निरीक्षण के लिए महानगर की दिशा में जाना होता तो वे हर हाल में टीम में अपना नाम शामिल करवाने की जुगत भिड़ातीं। लल्लो-चप्पो करतीं। अगर निरीक्षण लंबा हुआ तो बीच की छुट्टियों में या रविवार को, दो-तीन घंटे की यात्रा करके चुपचाप महानगर होकर आया जा सकता था। विपरीत दिशा में कोई जाना न चाहती और महानगर की दिशा के लिए मारा-मारी होती।&lt;br /&gt;वे हमेशा अफवाहों से घिरी रहतीं, एक-एक से उनकी सच्चाई के बारे में पूछती फिरतीं। कभी खबर उड़ा देतीं-नयी ट्रांसफर पालिसी आ रही है तो कभी कहतीं-गोल्डर हैंड शेक स्कीम आ रही है, जिसमें संस्थान इच्छुक कर्मचारियों को ढेर सारा रुपया देकर सेवानिवृत्ति करेगा। महानगर के प्रधान कार्यालय से कोई भी वरिष्ठ अधिकारी आता तो वे उससे मुलाकात के लिए समय ज़रूर मांगतीं। अपने दुखड़े रोतीं... जवान लड़कियां... गिड़ते बच्चे... पति बीमार... शदियां...पढ़ाई... खुद की बीमारी... `मेनोपॉज'। ज्यादा रोना वे `इसी' का रोतीं। एक बार तो एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें मुलाकात का समय तो दिया, लेकिन साफ-साफ कह दिया था-आपके पास वापस जाने के लिए `मेनोपॉज' के अलावा और कोई कारण हो तो बताएं। सिर्फ इसी वजह से तो आपको ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt; सबके चेहरे एकदम काले पड़ गए थे और सबकी सब बिना एक भी शब्द बोले केबिन से बाहर आ गई थीं। बाद में पता चला था-प्रधान कार्यालय में इन महिलाओं ने स्थानांतरण के लिए जितने भी आवेदन भेजे थे, सब में प्रमुख रूप से `इसी' वजह से होने वाली तकलीफों का बखान किया गया था।&lt;br /&gt; यहां रहते हुए इन लोगों के साथ कुछ दुर्घटनाएं भी हो गई थीं। इससे इनके हौसले और मंद हो गए थे। एक महिला कॉलेज जाने वाली अपनी अति सुंदर लड़की को साथ लेकर आयी थी कि कामकाजी पति अकेले उसका ख्याल नहीं रख पाएंगे। एक-दो साल तक सब ठीक चलता रहा था। मां-बेटी एक दूसरे का सहारा बनी रही थीं। बेटी ने मां से अपने से सहपाठी का जिक्र किया था। उससे मिलवाया भी था, लेकिन विजातीय और बेरोजगार लड़के को मां ने पहली ही नज़र में ठुकरा दिया था। बेटी को चेताया भी था-उससे मेल-जोल न रखे।&lt;br /&gt; इधर मां एक ट्रेनिंग पर बाहर गई, उधर लड़की ने उसी लड़के से ब्याह रचाया, चाबी पड़ोस में दी और हनीमून पर निकल गई।&lt;br /&gt; मां को इतना सदमा लगा था कि वह नौकरी ही छोड़ गई थी। जिसके लिए सब कुछ कर रही थी वही दगा दे गई, अब किसके लिए कमाना-धमाना। पति की निगाहों में कसूरवार भी वही बनी थी कि लड़की को संभाल नहीं पाई।&lt;br /&gt; एक अन्य महिला अधिकारी के पति का महानगर में चक्कर चलने लगा था। इससे पहले कि मामला कोई निर्णयक मोड़ लेता, वह बोरिया-बिस्तर समेट कर लौट गई थी और वहां से इस्तीफा भेज दिया था। इन दो-एक मामलों से ये महिलाएं काफी विचलित हो गई थीं।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं था कि लगभग इन्हीं कारणों से अपना परिवार पीछे छोड़कर आए उनके पुरुष सहकर्मी उनसे कम परेशान थे। तकलीफें उन्हें भी होती थीं। लेकिन वे अपनी तकलीफों का इतना सार्वजनिक नहीं करते थे कि उनके प्रति बेचारगी का भाव उपजे। वैसे उनके पास खुद को भुलाए रखने या व्यस्त रहने के जरिए भी ज्यादा थे। उनके पास ताश थे, खाना और पीना था, फिल्में थीं। ब्लू पिल्में थीं। घूमना-फिरना था। किताबें थीं। ठहाके थे और बहसें थीं। वे कभी भी किसी भी दोस्त के घर जाकर महफिल जमा सकते थे। वहां रात गुज़ार सकते थे। देर तक सड़कों पर आवारागर्दी कर सकते थे। इन सब कामों में उनकी ईगो कभी आड़े नहीं आती थी।&lt;br /&gt; कई बार वे अपनी महिला सहकर्मियों को छेड़ते-जिन चीज़ों पर आपका बस नहीं हैं, उसके लिए क्यों अपनी सेहत खराब कर रही हैं। तनाव में रहने से क्या जल्दी ट्रंसफर हो लाएगा। वे उन्हें समझाते भी और उन पर हंसते भी थे-हमें ही देख लो। परिवार से अलग हैं तो भी खा-पी रहे हैं। हर वक्त मस्ती के मूड में रहते हैं। कभी चुपके से अपने घर जाकर तो देखो तुम्हारे पति और बच्चे तुम लोगों के बिना कितना सहज और खुला-खुला महसूस कर रहे होंगे, बल्कि आप लोगों के वहां पहुंचने पर बाल-बच्चे पूछते होंगे-आप कितने दिन की छुट्टी पर आई हैं, लेकिन उन पर इन सीरी बातों का कोई असर नहीं होता था। उनका एक ही जवाब रहता-आप पुरुष हैं। हम लेडीज की तकलीफ कैसे समझेंगे। आपके साथ इतनी जिम्मेदारियां होतीं तो पता चलता।&lt;br /&gt; बहरहाल ये बहसें चलती रहती थीं। एक के बाद एक बरस बीतते रहते थे। जैसे-जैसे उनके घर से दूर रहने की अवधि बढ़ती जा रही थी, ये महिलाएं घर की चिंता में और दुबली होती जा रही थीं। घर जो पीछे छूट गया था, लेकिन दिलो-दिमाग में लगातार बना रहता था। वे उसे दूर से ही जकड़े हुए थीं। वे वहां जल्द-से-जल्द पहुंच कर उसे अपने नियंत्रण में ले लेना चाहती थीं। उनके लिए एक-एक पल भारी पड़ रहा था।&lt;br /&gt; दूसरी तरफ, उनकी गैर-मौजूदगी में आमतौर पर घरों को कुछ भी नहीं हुआ था। न दीवारें दरकी थीं, न किसी के सिर पर छत ही गिरी थी। सभी घर जस के तस खड़े थे, बल्कि पहले की तुलना में आत्मनिर्भर और हर लिहाज से मजबूत। इन बरसों में पढ़ने वाले बच्चे कॉलेजों में जा पहुंचे थे या नौकरी वगैरह पर भी लग गए थे, शादियां भी कई बच्चों की हुई थीं इस बीच। अमूमन सभी घर इन महिलाओं की गैर-मौजूदगी में, लेकिन उनसे मिलने वाले पैसों की मदद से, कुछ भी `मिस' नहीं करते थे, वे परिस्थितियों के अनुमूल जीवन जीने लगे थे। उन घरों को इन महिलाओं-जो पत्नी, मां, बेटी, बहरन, कुछ भी हो सकती थीं, की ज़रूरत तो थी, लेकिन ये अब उन लोगों की दिनचर्या का, आदत का हिस्सा नहीं रही थीं। वे इनके लिए परेशान होते थे लेकिन व्याकुल नहीं होते थे।&lt;br /&gt; वक्त गुज़रता रहा था। तभी एक दिन दो समाचार सुनने को मिले थे। एक शुभ और दुसरा खराब। अच्छी खबर यह थी कि एक लंबे अरसे के बाद से सारी महिलाएं स्थानांतरित होकर महानगर वापस लौट रही थीं।&lt;br /&gt; दूसरी, उदास कर देने वाली खबर यह थी कि उनके स्थान पर लगभग उतनी ही महिलाएं स्थानांतरित होकर बाहर जा रही थीं। इस बार, पास और दूर के सभी केंद्र पर।&lt;br /&gt;रचनाकाल 1995&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-6116007417291117923?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/6116007417291117923/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=6116007417291117923&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/6116007417291117923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/6116007417291117923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='कहानी - छूटे हुए घर'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-4588164369344812429</id><published>2009-04-24T11:54:00.002+05:30</published><updated>2009-04-24T12:20:57.562+05:30</updated><title type='text'>उर्फ़ चंदरकला – 1991 की अश्लीलतम कहानी</title><content type='html'>ये कहानी 1976 की घटना पर 1991 में लिखी गयी थी और नवम्बर 91 में वर्तमान साहित्य में छपी थी। कहानी छपते ही हंगामा मच गया था। वार्षिक ग्राहकों ने अपना चंदा वापिस मांगा, देश भर में इसकी फोटोकॉपी करा के प्रतियां बांटी गयीं, गोष्ठियां हुईं, साल भर कहानी के पक्ष और विपक्ष में पत्र आते रहे। और मेरी लानत मलामत की जाती रही। कहानी का भूत अरसे तक हिन्दी जगत को सताता रहा। लीजिये, आप भी पढ़ कर अपनी राय बनाइये।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्फ़ चन्दरकला&lt;br /&gt; दोनों वहां वक्त पर पहुंच गये हैं। अभी एन आर की अर्थी सजायी जा रही है। वहां खड़ी भीड़ में धीरे-धीरे सरकते हुए वे सबसे आगे जा पहुंचे और मुंह लटका कर खड़े हो गये। दोनों ऐसी जगह जा कर खड़े हो गये हैं, जहां चेयरमैन और दूसरे वरिष्ठ अधिकारियों की निगाह उन पर पड़ जाये। तभी सतीश ने आनंद को इशारा किया, दोनों आगे बढ़े और अर्थी पर फूल मालाएं रखने वालों के साथ हो लिये। ज्यादातर लोग चकाचक सफेद कुर्ते पायजामों में हैं। इन दोनों के पास कोई सफेद या डल कपड़े नहीं हैं, इसलिए रोज के ऑफिस वाले कपड़ों में ही चले आये हैं।&lt;br /&gt; माहौल में बहुत उदासी है। रह-रह कर मिसेज एन आर, उनके छोटे लड़के और जवान लड़कियों की सिसकियों से माहौल और भारी हो जाता है। जब एन आर की मृत देह मंत्रोच्चारणों के साथ खुले ट्रक में रखी जाने लगी तो सतीश और आनंद ने भी आगे बढ़ कर हाथ लगा दिया। एन आर परिवार और दूसरों की रुकी हुई रुलाई फिर फूट पड़ी। सबकी तरह सतीश और आनंद भी अपनी उंगलियां आंखों तक ले गये, लेकिन वहां कोई आंसू नहीं है। &lt;br /&gt;दोनों धीरे-धीरे खिसकते हुए भीड़ से बाहर आ गये। सतीश ने आनंद का हाथ थामा और बोला - मिसेज एन आर बिना मेकअप के कितनी अजीब लग रही हैं। अपनी उम्र से दुगुनी।&lt;br /&gt; "अबे घोंचू, यही उनकी असली उम्र है। मेकअप से आधी लगती थी।" आनंद फुसफुसाया। तभी उसकी निगाह एन आर की बिलखती हुई बड़ी लड़की पर पड़ी। उसकी सफेद कुर्ते में से झांकती काली ब्रा की पट्टी पर नज़रें गड़ाये वह बोला," मुझसे तो इन लड़कियों का रोना नहीं देखा जा रहा। जी कर रहा है दोनों को सीने से लगाकर दिलासा दूं। पीठ पर हाथ फेर कर चुप कराऊं।" सतीश ने भी आंखों ही आंखों में लड़कियों के शरीर तौले और मायूस होते हुए कहा, "हां यार, एन आर इतनी खूबसूरत लड़कियों को यतीम कर गया। मुझसे भी उनका दुःख नहीं देखा जा रहा। एक तुझे मिले चुप कराने के लिए और एक मुझे।" उसने आनंद का हाथ दबाया और आदतन आँख मारी।&lt;br /&gt; ऑफिस की सारी गाड़ियां, बसें सबको श्‍मशान घाट तक ले जाने के लिए खड़ी हैं। कॉलोनी तक वापिस भी छोड़ जाएंगी। आज की छुट्टी घोषित कर दी गयी है। सब लोग बसों की तरफ बढ़ने लगे।&lt;br /&gt; बस में चढ़ने से पहले सतीश फिर फुसफुसाया," यार क्या करेंगे वहां? ….. सारा दिन बर्बाद जायेगा। यहां सबको अपना चेहरा दिखा ही चुके हैं। हाज़िरी लग गयी है। चल खिसकते हैं।"&lt;br /&gt; " हां यार, वैसे भी मूड भारी हो गया है। चल, सिटी चलते हैं। वहीं दिन गुजारेंगे।"&lt;br /&gt; उन्होंने देखा, और भी कई लोग बसों में चढ़ने के बजाये इधर-उधर हो गये हैं। मौका देखकर वे भी शव-यात्रा का काफिला शुरू होने से पहले ही फूट लिये।  &lt;br /&gt;         एन आर के बंगले से काफी दूर आ जाने के बाद आनंद ने सिगरेट सुलगाते हुए पूछा,"क्या ख्याल है तेरा, एन आर की जगह उसकी फैमिली में किसे नौकरी दी जायेगी।"&lt;br /&gt;        "अरे इसमें देखना क्या, तय है। बड़ी वाली लड़की ही ज्वाइन करेगी। एन आर जीएम था भई। थर्ड इन रैंक, अब उसकी विडो इस उम्र में तो डिस्पैच क्‍लर्क बनने से रही।" सतीश ने दार्शनिकता झाड़ी। &lt;br /&gt; " गुरु, मजा आ जायेगा तब तो। बल्कि मैं तो कहता हूं, जीएम के स्टैंडर्ड के हिसाब से तो दोनों लड़कियों को रखा जा सकता है। पर्सोनल मैनेजर अपना यार है। उससे कह कर इन्हें अपने सैक्शान में रखवा लेंगे।" आनंद ने मन ही मन लड्डू फोड़े।&lt;br /&gt;          "कुछ भी हो यार", सतीश फिर दार्शनिक हो गया, "आदमी की भी क्या जिंदगी है, यही एन आर कल तक कितनी बड़ी तोप था। अच्छे-अच्छों  को नकेल डाल रखी थी, आज कैसा निरीह सा पड़ा था मुझे ...."&lt;br /&gt;         "मत याद दिला यार" आनंद ने तुरंत टोका, "मेरी आंखों से तो उसकी रोती हुई लड़कियों की तस्वीर ही नहीं मिटती। बेचारी लड़कियां, कभी जाएंगे उनके घर। अफसोस करने। पूछेंगे, हमारे लायक कोई काम हो तो .....।"&lt;br /&gt;          "हां यार, जाना ही चाहिये। आखिर इन्सान ही इन्सान के काम आता है।" आनंद उससे पूरी तरह सहमत हो गया।&lt;br /&gt;          तभी एक खाली ऑटो वहां से गुजरा। आनंद ने उसे रोका, बैठने के बाद सिटी की तरफ चलने के लिये कहा।&lt;br /&gt;          "कल रात तू कितना जीता?" सतीश ऑटो में पसरते हुए बोला।  &lt;br /&gt;          "तीन सौ के करीब, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ, इस महीने कुल मिला कर घाटे में ही चल रहा हूँ।"&lt;br /&gt;         "जो रकम तू हार चुका है, उसे गिन ही क्‍यों रहा है। वो तो वैसे ही तेरे हाथ से जा चुकी।" सतीश ने अपनी नरम गुदगुदी हथेलियों में उसका हाथ दबाया,"चल आज तेरी जीत ही सेलिब्रेट की जाये। सारा दिन कहीं तो गुजारना ही है।"&lt;br /&gt;         "तेरे पास कितने हैं?" आनंद ने सतीश की जेब की थाह लेनी चाही।  &lt;br /&gt;          "होंगे सौ के आस-पास" सतीश ने लापरवाही जतायी।&lt;br /&gt;          सिटी पहुंच कर दोनों मेन मार्केट की तरफ चले। बाजार की रौनक से आंखें सेंकते हुए। जब सतीश को कोई दर्शनीय चीज़ नज़र आ जाती तो वह आनंद का हाथ दबा देता। आनंद की निगाह पहले पड़ती तो वह सतीश को कोंच देता। काफी देर तक वे यूं ही मटरगश्ती करते रहे।&lt;br /&gt;           तभी सड़क के किनारे बने एक पार्क के बाहर रेलिंग के सहारे खड़ी एक लड़की ने सतीश को आँख मारी। सतीश सकपका गया। दुनिया का आठवां आश्चर्य। आज तक तो यह काम वही करता रहा है। उसे आँख मारने वाली कौन सी अम्मा पैदा हो गयी। वह सांस लेना भूल गया। दोनों तब तक पाँच सात कदम आगे बढ़ चुके थे। सतीश ने हलके से मुड़ कर देखा, लड़की की निगाह अभी भी इस तरफ है। लड़की फिर मुस्कुरायी। सतीश ने तुरंत आनंद का हाथ दबाया," गुरु, रुक जरा। माल है। खुद बुला रही है।"  &lt;br /&gt;        आनंद ने शायद उसे देखा नहीं है। दोनों रुक गये। सतीश ने दिखाया, " वे रेलिंग के सहारे खड़ी है।"&lt;br /&gt;        " हां यार, लगती तो चालू है। करें बात?" आनंद की धड़कन भी तेज हो गयी।&lt;br /&gt;         "पर उसे दिन दहाड़े ले जायेंगे कहां?" सतीश ने आनंद की उंगलियां अपनी उंगलियों में फंसा लीं।&lt;br /&gt;  " पहले देख तो लें। कैसी है? कितना मांगती है? जगह तो बाद में भी तय कर लेंगे। चल पास जाते हैं।"&lt;br /&gt;        " तू जा, उससे बात कर।"&lt;br /&gt;        " अबे पौने आठ, आंख उसने तुझे मारी है। आगे मुझे कर रहा है।" लड़की अभी भी खड़ी इन दोनों की हरकतें देख रही है। &lt;br /&gt;        दोनों उससे थोड़ी दूर जा कर खड़े हो गये। आनंद ने सिगरेट सुलगा ली और सतीश खुद को व्यस्त दिखाने के लिए रेलिंग के सहारे जूते का तस्मा खोल कर बांधने लगा। &lt;br /&gt;        लड़की ने दोनों की तरफ देखा और बेशरमी से मुस्कुरायी। सतीश ने उसे आँख के इशारे से बुलाया। लड़की तुरंत बगीचे के अंदर चली गयी और उसे अपने पीछे पीछे आने का इशारा किया। &lt;br /&gt;         भीतर जा कर वह एक खाली बैंच पर बैठ गयी। दोनों उसी बैंच पर उससे हट कर बैठ गये। देखा, लड़की ठीक-ठाक है। उन्नीस बीस की उम्र। सस्ती साड़ी, प्लास्टिक की चप्पल, उलझे बाल। शायद कई दिन से नहायी भी न हो।&lt;br /&gt;        " चलेगी?" आनंद ने कश लगाते हुए पूछा।&lt;br /&gt;        " कित्ती देर के वास्ते?"&lt;br /&gt;       " दिन भर के लिए" इस बार सतीश बोला। &lt;br /&gt;        " जगा नहीं है अपुन के पास। तुमको इंतजाम करना पड़ेगा" लड़की ने स्पष्ट किया।&lt;br /&gt;         " कर लेंगे, पहले तू पैसे बोल।"&lt;br /&gt;        " दोनों के वास्ते सौ का पत्ता लगेगा, मंजूर हो तो बोलो।"&lt;br /&gt;        " सौ ज्यादा है। कम कर" सतीश ने उसे नज़रों से तौला। &lt;br /&gt;          " अस्सी दे देना और खाना खिला देना बस्स।" वह सतीश की आंखों में लपलपाती लौ देख कर बोली। &lt;br /&gt;         " पचास मिलेंगे, चलना हो तो बोल" सतीश अपनी औकात पर आ गया। &lt;br /&gt;         लड़की ने मना कर दिया, " पचास कम है। सत्तर दे देना।"&lt;br /&gt;        दोनों उठ गये और गेट की तरफ बढ़ने लगे। सतीश आनंद से पूछना ही चाहता था कि सत्तर ठीक हैं क्या, इससे पहले ही लड़की इनके पीछे लपकी, "चलो सेठ।"&lt;br /&gt; सतीश मुस्कुराया। सौदा महंगा नहीं है। दिन भर के लिए दोनों के हिस्से में पच्चीस-पच्ची़स ही आयेंगे। आनंद से पूछा," गुरु, तय तो कर लिया। अब इसे ले जायें कहां?  घर तो इस समय ले जा नहीं सकते। आज छुट्टी की वजह से पूरी कालोनी आबाद है। कोई भी चला आयेगा। होटल में ले जाने लायक यह है नहीं।"&lt;br /&gt; " तू ही तो मेरे पीछे पड़ गया था। अब ले भुगत।" दोनों को लगा, बेवक्त की दावत कुबूल कर बैठे हैं। लड़की अभी भी खड़ी इनके इशारे का इंतजार कर रही है। &lt;br /&gt; आनंद ने घड़ी देखी, साढ़े ग्या़रह, " चल, पिक्चर चलते हैं पहले। इस शो में हॉल खाली होते हैं। बाकी बाद में देखेंगे।" &lt;br /&gt;        सतीश ने लड़की से कहा, " चलो, पहले फिल्म देखेंगे।"&lt;br /&gt;        लड़की लाड़ से बोली, " पहले कुछ खिला दो सेठ, कल से एक कप चा भी नहीं पी है।"&lt;br /&gt;        आनंद ने अहसान जताया, " चल पहले कुछ खा ले, नहीं तो चिल्लायेगी।" वे एक सस्ते़ से रेस्तरां की तरफ बढ़ गये।  &lt;br /&gt;         सिनेमा हॉल में बहुत भीड़ नहीं है। दोनों ने उसे अपने बीच वाली सीट पर बिठाया। अँधेरा होते ही दोनों चालू हो गये। दोनों को ही लगा, लड़की मजबूत है। वह भी खा पी कर मूड में आ गयी है। दोनों ने अपना एक एक हाथ उसके ब्लाउज में खोंस लिया। पसीने और मैल से उनके हाथ चिपचिपाने लगे। लेकिन वे लगे रहे। कभी सतीश उसे भींच लेता है तो कभी आनंद चूमने लगता है। अब उनके लिए हॉल में बैठना मुश्किल हो गया है। आस-पास बैठे लोग भी महसूस कर रहे हैं, असली फिल्म तो यहीं चल रही है। तभी धींगामुश्ती में लड़की का ब्लाउज चर्र से फट गया। लड़की जोर से चिल्ला पड़ी, "हाय, मेरा ब्लाउज फाड़ दिया।" दोनों सकपका गये। तेजी से अपने हाथ खींचे। उन्हें उम्मीद नहीं थी, वह इतनी जोर से बोल पड़ेगी। आस-पास वाले हँसने लगे और सीटियां बजाने लगे। दोनों खिसिया कर एकदम बाहर की तरफ लपके। लड़की को भी बाहर आना पड़ा। &lt;br /&gt;         बाहर निकल कर दोनों बाथरूम में घुस गये। सतीश बोला, "यार, माल तो पटाखा है एकदम गर्म कर दिया साली ने। " &lt;br /&gt;         "हां यार, अब अंदर तो नहीं बैठा जा रहा। क्या करें?"&lt;br /&gt;         "एक तरीका है। ऑटो लेकर किले की तरफ निकल चलते हैं। वहां का रास्ता एकदम सुनसान है। घनी झाड़ियां भी हैं। वहीं चलते हैं।"&lt;br /&gt;         " हां, यही ठीक रहेगा।"&lt;br /&gt;         दोनों ने बाहर निकल कर लड़की को पीछे आने का इशारा किया। ऑटो तय करके उसमें बैठ गये और लड़की को बुला लिया। अभी ऑटो बाज़ार में ही था कि आनंद ने ड्राइवर को एक मिनट के लिए रुकने के लिए कहा। वह लपक कर गया। जब वापिस लौटा तो उसके हाथ में एक खाकी लिफ़ाफ़ा था। लिफाफे की शेप देखकर सतीश मुस्कुराया। लड़की दोनों के बीच दुबकी बैठी है। ब्लाउज ज्यानदा फट गया है उसका। साड़ी कस के लपेट रखी है उसने।&lt;br /&gt;         किले वाली सड़क पर शहर से काफी दूर आ जाने के बाद उन्होंने आटो रुकवाया। बिल्कुल सुनसान जगह है यह। पहले आनंद ऑटो में बैठा रहा और सतीश लड़की को लेकर झाड़ियों के पीछे निकल गया। जाने से पहले उसने लिफाफे में ही 'हाफ' खोल कर गला तर कर लिया है। &lt;br /&gt;        सतीश के आने तक आनंद घूँट भरता रहा और सिगरेटें फूँकता रहा। सतीश ने आते ही मुस्कुरा कर आनंद की तरफ देखा और उसका कंधा दबाया। अब सिगरेटें फूंकने की बारी सतीश की है। आटो ड्राइवर इतनी देर से इन सवारियों की हरकतें देख कर मुस्कुरा रहा है। सतीश के लौटने पर बेशर्मी से बोला, " साब मैं भी एक गोता लगा लूं गंगा में।"&lt;br /&gt; सतीश और आनंद ने एक दूसरे की तरफ देखा – यह तीसरा भागीदार कहां से पैदा हो गया। अब तक लड़की भी बाहर आ गयी है। &lt;br /&gt;  अजीब स्थिति है। ड्राइवर को 'हां' कैसे कहें और अगर मना करते हैं तो एक तो वह इस मामले का राज़दार है और उन्हें वापिस भी जाना है। लफ़ड़ा कर सकता है। दोनों ने आंखों ही आंखों में इशारा किया। इसे भी हो आने देते हैं। अपना क्या जाता है। तभी सतीश बोला, " बीस रुपये लेगेंगे।" ड्राइवर ने एक पल सोचा, फिर बोला "चलेगा। "&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सतीश लड़की को एक किनारे ले गया और उसे डरा दिया, " ड्राइवर धमकी दे रहा है। उसे भी निपटा दे। नहीं तो वापिस नहीं ले जायेगा। जा। चली जा। यहां और कोई ऑटो भी नहीं मिलेगा।" लड़की सचमुच डर गयी है। वह झाड़ियों की तरफ लौट गयी। ड्राइवर उसके पीछे लपका। उनके जाने के बाद सतीश ने कुटिलता से मुस्कुरा कर आनंद की तरफ देखा, " कैसी थी?"&lt;br /&gt;       " साली गंदी थी, लेकिन थी जोरदार। तुझे कैसी लगी?"&lt;br /&gt;       "वाह गुरु, मेरा पसंद किया हुआ माल और मुझी से पूछ रहा है, कैसी थी।"&lt;br /&gt;       वह हंसने लगा, "बहुत दिनों बाद ऐसी चीज़ मिली है। लगता है, ज्यादा दिनों से धंधे में नहीं है।" उसने कयास भिड़ाया। " अब क्या करें, सिर्फ ढाई बजे हैं अभी।" आनंद को अब कोई मलाल नहीं है। " चल किले तक हो कर आते हैं। वहीं देखेंगे।"&lt;br /&gt;      " इसे रात को भी रखना है क्या?"&lt;br /&gt;       " वो तो यार, बाद की बात है। पहले यह तो तय हो, अब इसका क्या करना है।  अभी पाँच मिनट में झाड़ियों से कपड़े झाड़ती निकल आयेगी हमारी अम्मा।"   &lt;br /&gt;       आनंद ने दाँत दिखाये, " अभी से तो अम्मा मत बना यार उसे, अभी तो दूध पीती बच्ची है। कुंवारी कली।" सतीश ने टहोका मारा।&lt;br /&gt;         "अबे लण्डूरे, अभी खुद ही तो उसका दूध पी के आ रहा है और कहता है, दूध पीती बच्ची है। आनंद ने धक्का मारा, "पता नहीं तेरे जैसे कितने बिगड़े बच्चों को दूध पिला चुकी है।"&lt;br /&gt;        तभी ड्राइवर कपड़े झाड़ता हुआ बाहर आया। उसका चेहरा चमक रहा है। तब तक लड़की भी बाहर आ गयी है। एकदम पस्त। साड़ी के भीतर से उसका फटा हुआ ब्लाउज और गुलाबी गोलाई नजर आ रहे हैं।  ड्राईवर ने अपनी सीट पर जमते हुए पूछा," अब कहां चलना है साहब?" &lt;br /&gt;       " किले की तरफ ले चलो।" सतीश ने आदेश दिया। अब उसके सामने तकल्लुफ करने की गुंजाइश नहीं है।  आनंद ने लड़की के गले में बांह डाल कर उसे भींच लिया और चूमते हुए बोला,  " थक गयी है क्या जाने मन।" लड़की ने सिर हिलाया," नहीं तो।"&lt;br /&gt;          सतीश उसकी जांघ पर हाथ फेरता हुआ बोला, "तूने अपना नाम तो बताया ही नहीं, क्या नाम है तेरा?"&lt;br /&gt; लड़की अपना मुंह सतीश के कान के पास ले जा कर फुसफुसायी "चमेली।"&lt;br /&gt;        "बदन से तो तेरे बदबू आ रही है और नाम चमेली है।" सतीश उसके सीने पर हाथ मारता हुआ हँसने लगा, "हम तुझे चंदरकला कह कर बुलायेंगे। चलेगा न।"&lt;br /&gt;        यह सतीश की पुरानी आदत है। वह हर किराये की लड़की को इसी नाम से पुकारता है। वह चंद्रकला नहीं कह पाता।  किले पर पहुंच कर उन्होंने ऑटो छोड़ दिया। ड्राइवर को पैसे देते समय सतीश ने बीस रुपये काट लिये। लड़की को ले कर पहले दोनों किले के भीतर घूमते रहे। उसके साथ मस्ती करते रहे। फिर किले के पिछवाड़े की तरफ निकल गये। यह जगह एकदम सुनसान है। चलते-चलते वे काफी दूर जा पहुंचे, जहां बहुत बड़े-बड़े पत्थर हैं। यह जगह सुरक्षित लगी उन्हें। वे पत्थरों के पीछे उतर गये।  &lt;br /&gt;         आनंद वहीं एक पत्थेर से टिक कर लेट गया और लड़की को अपने पास बिठा लिया। सतीश घास पर लेट गया। लेटे लेटे वह ऊंचे सुर में गाने लगा। अचानक वह उठा और लड़की से बोला," चल चंदरकला, अब तू एक गाना सुना। "&lt;br /&gt;        " मुझे गाना नहीं आता।" वह इतराते हुए बोली।&lt;br /&gt;         " आता कैसे नहीं, धंधेवालियों को गाना, नाचना सब कुछ आना चाहिए। चल गाना सुना।"&lt;br /&gt;        लड़की गाने लगी। उसे सचमुच गाना नहीं आता। यूं ही रेंकती रही थोड़ी देर। सतीश और आनंद ताली बजाने लगे। उसकी हिम्मत बढ़ी। उसने और जोर से अलापना शुरू कर दिया, लेकिन जल्दी ही हांफ गयी। आनंद ने सिगरेट निकाली तो लड़की बोली, "एक मुझे भी दो।" आनंद ने डिब्बी माचिस उसी को दे दी और कहा, "ले खुद भी पी और हमें भी पिला।" लड़की ने बारी बारी से दोनों के मुंह में सिगरेट लगा कर सुलगा दी। खुद भी पीने लगी। &lt;br /&gt;" सिगरेट ही पीती है या शराब भी?" सतीश ने धुंआ छोड़ते हुए पूछा।&lt;br /&gt;लड़की ने आनंद के पास रखे हॉफ की तरफ देखा और सतीश की नाक पकड़कर बोली, " कोई पिला दे तो पी लेती हूँ।"&lt;br /&gt; सतीश ने उसे पकड़कर अपने पास बिठा लिया और बोतल उसे दे दी, " ले मेरी जान, जितनी चाहे पी पिला।"&lt;br /&gt; लड़की ने तीन-चार घूँट खींचे। फिर बोतल सतीश के मुंह से लगा दी। सतीश को अचानक खांसी आ गयी तो लड़की जोर-जोर से हंसने लगी। तभी सतीश बोला, " चल नाच के दिखा।"&lt;br /&gt;वह नखरे करने लगी। सतीश ने उसे पकड़ कर खड़ा कर दिया और उसे जबरदस्ती नचाने लगा। आनंद भी उठ बैठा। दोनों ताली बजाने गाने लगे। लड़की हाथ पैर मारने लगी। उसे नशा होने लगा है। आनंद चिल्लाया, "ऐसे नहीं, ढंग से नाच। जरा तेज कदम उठा।&lt;br /&gt;  लड़की अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही है, लेकिन नाचना उसके बस की बात नहीं है। तभी सतीश लड़की के पास आया और उसकी साड़ी खोलने लगा। लड़की एकदम रुक गयी और उसे मना करने लगी।  सतीश ने पुचकारा, "चंदरकला डार्लिंग, कपड़े उतार कर नाच। खूब मजा आयेगा।" &lt;br /&gt;लड़की एकदम बिफर गयी, " मैं नंगी नहीं नाचूंगी।" सतीश ने कस के उसके बाल पकड़ लिए, "साली प्यार से मना रहा हूँ नाच, फिर भी नखरे कर रही है।"  लड़की बिगड़ गयी है, " देखो सेठ, खाली धंधे के वास्ते  मैं आई इधर। फालतू परेशान नईं करने का। एक तो इत्ता कम पइसा दे रये और उप्पर से लफड़ करने कू मांगते।"  उसने अपनी साड़ी कस के पकड़ ली और सतीश का हाथ झटक रही है। उसके बाल भी भी सतीश के हाथ में हैं। &lt;br /&gt;तभी आनंद ने लपक कर उसे सतीश की पकड़ से छुड़वाया। प्यार से थपथपाते हुए उसे दस का नोट देते हुए बोला, " ले ये नाचने के पैसे अलग से ले। अब तो नाच।"  लड़की अभी भी गुस्से में है। दस का नोट हाथ में लिए तय नहीं कर पा रही, क्या। करे।&lt;br /&gt; आनंद ने फिर पुचकारा, " यहां कोई नहीं आयेगा। और फिर हम से क्या शरम?"&lt;br /&gt;लड़की अब कातर निगाहों से दोनों की तरफ देख रही है। इससे पहले कि सतीश दोबारा उसके बाल पकड़ने के लिए आगे बढ़े, उसने कपड़े उतारने शुरू कर दिये। पैसे आनंद को पकड़ा दिया, "बाद में दे देना।"&lt;br /&gt; दोनों पत्थरों पर बैठ गये और फिर से गाने लगे। सतीश ने बची खुची शराब भी उसे पिला दी। दोनों देर तक शोर मचाते रहे। सतीश फिर उठ कर उसके साथ लचकने लगा। कभी उसे गोल-गोल घुमाने लगता तो कभी उसे ऊपर उठाने की कोशिश करता, लेकिन उसका वज़न संभाल न पाता। थोड़ी देर बाद वह खुद तो थक कर बैठ गया, लेकिन उसने लड़की को बैठने नहीं दिया। लड़की नाच-नाच कर बेदम हुई जा रही है। इधर दोनों चिल्लाये जा रहे हैं - "और तेज नाच ... और मटक ... और उछल ... और जोर लगा के ....।" &lt;br /&gt;आखिर लड़की एकदम निढाल हो कर पड़ गयी। वह पसीना-पसीना हो रही है। काफी देर तक यूं ही लेटी रही। आनंद ने एक सिगरेट सुलगायी और उसके होठों से लगा दी।&lt;br /&gt; " थक गयी है क्या? " वह पसीने से चिपचिपाते उसके बदन पर हाथ फेरता हुआ बोला। लड़की ने आंखें खोले बिना सिर हिलाया - हां।  आनंद ने लड़की को अपनी गोद में बिठा लिया और प्यार करने लगा। थोड़ी ही देर में वह उसे लेकर पत्थरों की ओट में चला गया। वापिस आने के बाद आंनद ने सतीश से पूछा,  "जाता है क्या उसके पास? अभी वहीं है।"  सतीश मुस्कुराते हुए उठा और बोला, " जैसी आज्ञा महाराज – और धीरे-धीरे जाता हुआ पत्थरों के पीछे गुम हो गया। उसे गये हुए अभी थोड़ी ही देर हुई है कि लड़की के चीखने चिल्लाने की आवाजें आने लगी। आनंद लेटा रहा। तभी लड़की नंगी भागती हुई आनंद के पास आयी और बड़बड़ाने लगी, " मुझे पता होता, एइसा गलीच आदमी है ये तो मैं आतीच नई। बिलकुल हैवान है। कित्ता परेशान करता है।" उधर सतीश के चीखने की आवाजें आ रही हैं। " इधर आ ओ चंदरकला, एक बार आ तो सही।" आनंद मुस्कुराया। तो सतीश आज फिर छोटी लाइन पर गाड़ी चलाना चाहता है या और कोई मांग रख बैठा है। उसे अच्छी तरह पता है, हर लड़की इस तरह के कामों के लिए आसानी से तैयार नहीं होती, फिर भी बाज नहीं आता वह। वह अभी भी चिल्ला रहा है, "आनंद जरा भेजना चंदरकला को। उससे कह, अब बिल्कुल तंग नहीं करूंगा।" लड़की ने कपड़े पहनने शुरू कर दिये हैं। वह अभी भी बोले जा रही है - पहले मेरा ब्लाउज फाड़ा, फिर कपड़े उतारे अब गलत-सलत करने को बोलता हैं, छी: एकदम जानवर की माफिक है तुम्हारा सेठ। लाओ, एक सिगरेट दो। साला मूड खराब कर दिया हलकट ने।"&lt;br /&gt;आनंद ने उसे सिगरेट दी और सतीश के पास जाने के लिए कहा। अब वह किसी कीमत पर जाने के लिए राज़ी नहीं है। सतीश अभी भी आवाजें दिय जा रहा है। आनंद ने बड़ी मुश्किल से लड़की को सतीश के पास इस शर्त पर भेजा कि अब अगर वह जरा भी गलत हरकत करे तो फिर कभी मत जाना उसके पास। वह राजी नहीं है। बड़ी मुश्किल से गयी। एक तरह से ठेल कर भेजा आनंद ने। &lt;br /&gt;तीनों जब किले से बाहर निकले तो धुंधलका हो रहा है। चाय पीते-पीते उन्होंने सात बजा दिये। वापिस चलने से पहले सतीश ने आनंद से पूछा, "रात भर रखने के बारे में क्या ख्याल है? "  &lt;br /&gt;आनंद ने कहा, "पहले इसे पूछते हैं, जाती भी है या नहीं। लड़की ने साफ मना कर दिया, "नई जाना मेरे कू। कित्ता  हैरान किये तुम लोग। मेरा हिसाब कर देवो और वहीं छोड़ देना मुजे।" सतीश ने पुचकारा, "नाराज नहीं होते जाने मन। चल तुझे बढ़िया खाना खिलायेंगे और दारू भी पिलाएंगे।" लगता है, अभी उसका मन नहीं भरा।&lt;br /&gt;दारू और खाने की बात सुन कर लड़की सोच में पड़ गयी है। कुछ सोच कर बोली, "पर मेरे कू फिर परेशान किया तो? &lt;br /&gt;"नहीं करेंगे, बस कहा ना।" आनंद ने दिलासा दिलाया। &lt;br /&gt;" रात का पूरा सौ का पत्ता लगेगा। एक पैसा कमती नई।" लड़की ने फैसला कर लिया। सतीश ने फिर पचास से शुरू किया। आखिर सौदा एक सौ तीस में पटा। दिन के मिला कर। दस उसे अलग से मिले हैं। &lt;br /&gt; आनंद ने ऑटो तय किया और कालोनी तक चलने के लिए कहा। आनंद ने पूछा, "ले जायेंगे कैसे?" &lt;br /&gt;सतीश मुस्कुराया, " वही अपना ऑपरेशन बुरका।" &lt;br /&gt;यह उनकी आजमायी हुई और सफल तरकीब है। जब भी रात को लड़की लानी होती है, लड़की तय कर लेने के बाद दोनों में से एक लड़की के साथ अंधेरे में इंतजार करता है और दूसरा असग़र को लेने चला जाता है। वह इनका खास दोस्त और कभी-कभी का पार्टनर है। वह अख़बार में लपेट कर अपनी बीवी का बुरका ले आता है। बुरके में लड़की सबके साथ घर के अंदर सुरक्षित पहुंच जाती है। बाद में बुरका पहन कर आनंद या सतीश असग़र के साथ कुछ दूर तक चला जाता है। लड़की सुबह जल्दी ही बाहर कर दी जाती है।   &lt;br /&gt;सारा रास्‍ता लड़की सतीश से नाराज बैठी रही। सतीश ने दो-चार बार छेड़खानी करने की कोशिश की। लेकिन वह ऊंघती बैठी रही। &lt;br /&gt;आपरेशन बुरका शुरू होते ही सतीश खाना और शराब लेने बाजार की तरफ निकल गया। आनंद असग़र और लड़की को लेकर चला।&lt;br /&gt;दोनों ने असग़र से बहुत कहा, आज की दावत में शरीक होने के लिए। लेकिन असग़र ने आँख दबा कर मना कर दिया, "आज नहीं।" अलबत्ता  जल्दी-जल्दी उसने एक दो पैग गले से नीचे उतार लिये।&lt;br /&gt;सतीश बुरका ओढ़े जब असग़र को छोड़ने गया तो आनंद ने लड़की को साबुन न दे कर नहाने के लिए कहा। उसने घर के दरवाजे खिड़कियां बंद कर दिये। बत्ति्यां बुझा दीं। सिर्फ टेबल लैम्प लगा कर जमीन पर रख दिया। दरियां बिछा कर खाना भी जमीन पर लगा दिया। नहाने के बाद तीनों खाने-पीने बैठे। &lt;br /&gt;लड़की अब बिल्कुल खामोश है। दोनों की हरकतों, शरारतों का कोई जवाब नहीं दे रहीं। जो भी गोद में बिठाता है, बैठ जाती है। जूठा खाते-खिलाते हैं, खा लेती है। धीरे-धीरे उसे नशा होने लगा है। वह लुढ़कने लगी है। बहकने लगी है। इन दोनों को भी चढ़ गयी है। नशे में इन्हें लड़की बहुत सुंदर लगने लगी है। दोनों उसकी तारीफ किये जा रहे हैं।&lt;br /&gt;  बत्ती बंद करते लड़की को इतना होश जरूर है कि उसने पूरे पैसे ले लिये और तीन-चार बार गिन कर अपने कपड़ों में छुपा कर लिए।&lt;br /&gt;   वे कब सोये, उन्हें पता ही नहीं चला। अचानक रात को नशा टूटने पर सतीश की नींद खुली। उसने घड़ी देखी, साढ़े तीन। आनंद और लड़की बेसुध सोये पड़े हैं। सतीश उठा और उसने झिंझोड़ कर लड़की को जगाया, " उठ, उठ चंदरकला, जल्‍दी कर।" &lt;br /&gt;लड़की अभी पूरी तरह नींद में है। वह कुनमुनायी और फिर सो गई। सतीश ने उसे फिर झिंझोड़ा, लड़की आंखें मलते हुए उठी और पूछा, "क्या  है सेठ", सतीश दबे स्वर में बोला, " फटाफट कपड़े पहन और फूट ले।" लड़की नशे और नींद की वजह से बैठ भी नहीं पा रही। वह फिर लेट गयी। सतीश ने फिर झिंझोड़ा उसे और एकदम खड़ा कर दिया। लड़की समझ नहीं पायी, यह क्या  हो रहा है। उसने सतीश का हाथ पकड़ कर उसकी घड़ी में वक्त देखा। वह परेशान हो गयी है। आधी रात को सात-आठ किलोमीटर कैसे जायेगी। सतीश अभी भी हड़बड़ा रहा है, " जल्दी कर, जल्दी कर,"  उसने सतीश से थोड़ी देर और रुकने देने के लिए कहा, लेकिन सतीश ने उसका हाथ पकड़कर उसके कपड़े पैसे उसे थमा दिये और उसे नंगी ही दरवाजे से बाहर कर दिया। उसकी चप्पलें उठा कर बाहर फेंक दीं। लड़की को झटका लगा, यह हो क्या रहा है। कुछ समझ नहीं पायी वह। आखिर बोली," जाती हूँ सेठ, ऑटो के लिए पन्द्रह-बीस रुपये तो दे दो।" सतीश भुनभुनाया, "नहीं, नहीं अब एक पैसा भी नहीं मिलेगा। चल फूट। " &lt;br /&gt;लड़की अभी भी आधी नींद में, कुछ और पैसों की उम्मीद में दरवाजे पर खड़ी है। सतीश ने फिर डपटा, " जाती है या नहीं।" &lt;br /&gt;" कुछ तो और दे दो।"&lt;br /&gt;सतीश ने जवाब में उसे कस के एक लात जमायी और भड़ाक से दरवाजा बंद कर दिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-4588164369344812429?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/4588164369344812429/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=4588164369344812429&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/4588164369344812429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/4588164369344812429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2009/04/1991.html' title='उर्फ़ चंदरकला – 1991 की अश्लीलतम कहानी'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-1862242891097602115</id><published>2008-12-30T11:33:00.002+05:30</published><updated>2008-12-30T11:36:09.381+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>मेरी चौबीसवीं कहानी - मर्द नहीं रोते</title><content type='html'>मित्रो &lt;br /&gt;मेरी  चौबीसवीं कहानी - मर्द नहीं रोते का आनंद लीजिये इस लिंक पर&lt;br /&gt; http://www.sahityashilpi.com/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-1862242891097602115?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/1862242891097602115/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=1862242891097602115&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/1862242891097602115'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/1862242891097602115'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/12/blog-post_30.html' title='मेरी चौबीसवीं कहानी - मर्द नहीं रोते'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-5423836760291429840</id><published>2008-12-17T09:32:00.002+05:30</published><updated>2008-12-17T10:02:10.774+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>बाजीगर - तेईसवीं कहानी</title><content type='html'>बाजीगर &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खबर हाथों हाथ पूरे दफ्तर में फैल गयी है। सभी लपक रहे हैं उस तरफ। जो भी सुनता है, चार को सुनाता है, फिर कानों सुनी को आंखिन देखी करने के लिए टीले की तरफ बढ़ जाता है। जो लोग उस तरफ से आ रहे हैं, ऐसे बतिया रहे हैं, हो-हो कर रहे हैं, मानो संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य देखकर आ रहे हों। उस तरफ जाने वालों को बता भी रहे हैं, ‘जाओ भइया, तुम भी दर्शन कर आओ शिवजी महाराज के। एकदम फोकट में।’ महिलाओं तक भी खबर पहुंच गयी है। वे भी आपस में खुसर-पुसर करके खी-खी कर रही हैं। सब अच्छी  तरह जानते हैं शिलाकांत जी कोई भी अनहोनी कर सकते हैं। करते भी रहते हैं। आये दिन सारा दफ्तर उनसे परेशान है, फिर भी उसकी इन हरकतों से मजे भी लेते रहते हैं। लेकिन उनकी अभी थोड़ी देर पहले की हरकत की खबर से तो लोगों को बहुत मजा आ रहा है, तभी तो टीले के नीचे सभी सैक्श़नों के चपरासी, बाबू लोग जमा हो गये हैं और हो-हो कर रहे हैं, उनसे और पंगे ले रहे हैं। &lt;br /&gt; दफ्तर की मुख्य  इमारत से कोई दो सौ गज दूर मोटर गैराज के पिछवाड़े एक ऊँचे टीले पर श्रीमान शिलाकांत, पीऊन अटैच्ड टू जनरल सैक्शन अलफ नंगे खड़े हैं। उनकी मैली वर्दी, फटी बनियान और धारीदार जांघिया आसपास बिखरे पड़े हैं। उनकी छ: फुट लम्बी, हट्टी-कट्टी बेडौल नंगी काया बहुत अजीब लग रही है। श्रीमान जी अपने पोपले श्रीमुख से मैनेजमेंट के खिलाफ धुंआधार गालियां प्रसारित कर रहे हैं, ‘अपने आपको समझते क्या हैं साले!  हमसे बदमासी करेंगे! लें, कर ले बदमासी!’  वे अपने अंग विशेष को एक हाथ से झटका देते हैं ‘लें, लें, कर लें बदमासी। हम भी देखें उनकी   . .. . में केतना दम हय। हमरी बदमासी देखेंगे तो होस ठिकाने आ जायेंगे भडुओं के! ससुरे जब से हमरे पीछे पड़े हैं। कहते है मीमो देंगे, चारसीट देंगे, सस्पेंन कर देंगे। अरे तुमने असली माई का दूध पीया हो तो आओ और चिपकाय देव हमरे पीछे मीमो सीमो।’’ वे अब अपने पिछले हिस्से  को दो-तीन झटके देते हैं। लोग उनकी हरकतों पर खूब हंस रहे हैं और हो-हो करके उन्हें और उकसा रहे हैं। आज पहली बार और वह भी भरे-पूरे आफिस में शिलाकांत ने सबको अपना खुल्‍ला खेल दिखा दिया है फोकट में। &lt;br /&gt; वैसे वे गाहे-बगाहे अपनी नयी-नयी हरकतों से सबका मान-अपमान करते करते ही रहते हैं, लेकिन उन्होंने मर्यादा की सारी सीमाएं एक साथ कभी नही लांघी थीं। बहुत हुआ तो किसी को मां-बहन की रसीली गालियां सुना दीं, गुस्से में सैक्शन में ही अपनी धोती उठा दी या ऐसा ही कुछ हंगामा। इससे आगे वे कभी नहीं बढ़े थे।&lt;br /&gt;आज के उनके इस पब्लिक शो के पीछे क्या कारण हैं, वहां खड़े लोगों में से किसी को नहीं मालूम। सब अपने-अपने कयास भिड़ा रहे हैं। थोड़ी देर पहले कोई बता रहा था कि बड़े बाबू ने जब उनसे उनकी पिछली तीन-चार गैर-हाजरियों की छुट्टी की अर्जी मांगी तो जनाब उखड़ गये। पहले वहीं गाली-गलौज करते रहे। जब बड़े बाबू ने मीमो देने और बड़े साहब के सामने पेशी करने की धमकी दी तो महाशय यहां आकर नटराज नृत्य करने लगे। अभी इसी खबर को विश्वसनीय माना जा ही रहा था और प्रचारित भी किया जा रहा था कि जनरल सैक्श़न का कोई चपरासी इसका खण्डन करते हुए एक और शगूफा छोड़ गया है। उसके अनुसार रिजर्व कोटे के नये यू.डी.सी. मुसद्दी लाल ने जब शिलाकांत को एक गिलास पानी लाने के लिए कहा तो बताते हैं इन्होंने ऊंच-नीच बोलना शुरू कर दिया। नौबत हाथापाई तक आने को थी कि शिलाकांत बिफर गये और यहां चले आये। इस कहानी को भी मानने न मानने की दुविधा से अभी भीड़ उबरी नहीं थी कि डिस्पैच क्लर्क अपने यारों के साथ इस तरफ खैनी खाते हुए मजा लेने की नीयत से चले आये और पहले की कहानियों को चन्डू‍खाने की निर्मिति बताते हुए एक नया ही किस्सा छेड़ने लगे। उनके अनुसार आज के इस अद्भुत सीन के निर्माता, निर्देशक वे खुद हैं। वे बड़े गर्व से बता रहे हैं कि उन्हीं  से हुई नोंक-झोंक का नतीजा है कि सबको शिलाकांत का यह गीत-संगीत और नृत्य  का कार्यक्रम देखने को मिल रहा है। सब उनके आस-पास जुट आये हैं, सच्ची  बात जानने के लिए। &lt;br /&gt; उनके अनुसार, पिछले दिनों शिलाकांत के खिलाफ दो-तीन मामलों में अलग-अलग विभागीय जांच की गयी थीं। एक मामला बिना पूर्व अनुमति के अलग-अलग मौकों पर छुट्टी लेने और बाद में भी अर्जी न देने का, दूसरा मामला तृतीय श्रेणी के अपने से वरिष्ठ कर्मचारी से दुर्व्यवहार और गाली-गलौज का तथा तीसरा मामला उनके खिलाफ कार्यालय का अनुशासन और कायदे-कानून न मानने के बारे में था। दो मामले सिद्ध हो गये थे और तीसरे में उन्हें चार्जशीट दी जानी थी। इन तीनों मामलों के गोपनीय पत्र लेने से वे कब से इनकार कर रहे थे। बिल्कुल हाथ नहीं धरने देते थे। बकौल डिस्पैच क्लर्क के, आज भी जब शिलाकांत ने ये पत्र प्राप्त करने और डाकबुक में हस्ताक्षर करने से आनाकानी की, तो पहले बड़े बाबू और फिर अधीक्षक सा‍हब से शिकायत की गयी। अधीक्षक महोदय ने सुझाया कि ये पत्र उन्हें सबके सामने थमा दिये जायें और यह बात डाक बुक में दर्ज कर ली जाये। डिलीवरी पीऊन ने ज्यों  ही शिलाकांत की जेब में ये लिफाफे जबरदस्ती ठूंसने चाहे, वे एकदम भड़क गये, गालियों पर उतर आये। जब बड़े बाबू ने डांटा और कमरे से बाहर निकल जाने के लिए कहा, तो जनाब यहां आकर यह नाटक करने लगे। &lt;br /&gt; वहां जुटे सब कर्मचारियों को डिस्पैच क्लर्क की बात में वजन लगा। सबको पता था, आये दिन उसके खिलाफ कोई न कोई विभागीय जांच चलती ही रहती है।  चिटि्ठयां लेने से इनकार करने का मामला भी कोई नया नहीं था। सबका ध्यान फिर शिलाकांत की तरफ चला गया था। वे फिर से शुरू हो गये थे, ‘सब साले चोर भरती हो गये हैं, कोई काम नहीं करना चाहता। सबसे सीनियर और बुजुर्ग आदमी को इस तरह लतियाया जाता है। मेरा धरम भ्रष्ट  करना चाहते हैं सरऊ। मुझे भंगियों को पानी पिलाने की ड्यूटी दी जाती है। मैं विरोध करता हूं, आवाज उठाता हूं तो मीमो-सीमो की धमकी दी जाती है। मैं भी देख लूंगा सब हराम के जनों को। एक-एक का कच्चा चिट्ठा जानता हूं, खोल दूं तो भडुवों को लुगाइयन के पेटीकोट में मुंह छिपाना पड़े।’ सब जोर-जोर से हंसने लगे। शिलाकांत को और ताव आ गया। उनकी आवाज और ऊंची हो गयी और गालियों में एकदम नंगापन आ गया। वे सविस्तार अफसरों और उनके चमचों के झूठे-सच्चे किस्से बखानने लगे। &lt;br /&gt; शिलाकांत भी एक ही जीव हैं। पचास के होने को आये, तीस साल की नौकरी हो गयी, कब से नाना-दादा बने हुए हैं, लेकिन चीजों के प्रति उनका नजरिया बच्चों से भी गया-गुजरा है। आजकल उनकी जिन्दगी का एक ही मकसद हो गया है—हर चीज का विरोध करना। उन्हें  उनके प्रति लिये गये हर निर्णय में षड्यन्त्र की बू आती है। उन्हें  लगता है, पूरी दुनिया में वे अकेले सही आदमी हैं और बाकी सब जटिल, गंवार, अनपढ़। इस खुशफहमी के बावजूद वे हद दर्जे के कामचोर, मुंहफट और कूड़मगज चपरासी के रूप में विख्यात हैं। कोई सैक्शन उन्हें लेने को तैयार नहीं होता। हर सैक्शन बिना चपरासी के गुजारा करने को तैयार है लेकिन शिलाकांत के रूप में आदमकद मुसीबत किसी को भी नहीं चाहिए। यही वजह है कि बार-बार जनरल सैक्शन से धकियाये जाने के बावजूद वे उसी सैक्शन के गले का हार बने रहते हैं।  &lt;br /&gt; यदि उन्हें आसान ड्यूटी दी जाती है तो यह उन्हें अपनी वरिष्ठता का अपमान लगता है, मुश्किल ड्यूटी को वे बुढ़ापे में अपने शोषण के रूप में लेते हैं। किसी भी जवाब तलब को वे अपना अपमान मानते हैं और यदि उन्हें कोई पूछता नहीं, तो वे यह मान लेते हैं कि उन्हें इग्नोर किया जा रहा है, इसे वे किसी कीमत पर बर्दाश्त  नहीं करते। उन्हें किसी से भी ऊंचा बोलने, गाली देने, काम करने से इनकार कर देने के सारे अधिकार हैं। लेकिन उनसे कोई ऐसी हरकत करे तो वे इस तरह के नाटक करने लगते हैं। छुट्टी की अर्जी न देना, घंटों गायब रहना, कैंटीन में हंगामे करना, दफ्तर द्वारा दी गयी वर्दी में छोटे-मोटे नुक्स निकालना उनके मौलिक अधिकार हैं। मैनेजमेंट द्वारा जवाब-तलब किये जाने को वे अपने मौलिक अधिकारों का हनन मानते हैं।&lt;br /&gt; उनके विरोध के तरीके भी अजीब हैं। कभी घंटों बड़बड़ाते रहेंगे, सिर पर खड़े होकर, कभी अपनी शिकायत को पोस्टर के आकार में उलटी-सीधी भाषा में लिखकर नोटिस बोर्ड पर चिपका आयेंगे, कभी तंग करनेवाले अधिकार/कर्मचारी के इतने कान खायेंगे कि उसी को माफी मांगने पर मजबूर कर देंगे। अपने अकेले के बलबूते पर अफसरों के खिलाफ नारेबाजी करने का सौभाग्य भी उन्हें ही प्राप्त है। &lt;br /&gt;हां, एक बात है, वे न कभी गिड़गिड़ाते हैं और न ही हाथ-पांव पकड़ कर माफी मांगते हैं। उनका कहना है कि वे जब कोई गलती ही नहीं करते, तो माफी किस बात की मांगें।    &lt;br /&gt;लेकिन शिलाकांत हमेशा से ऐसे नहीं थे। एक वक्त़ था जब उन्हें पूरे आफिस का सबसे बेहतरीन चपरासी समझा जाता था। एकदम चुस्त, मुस्तै्द। कोई भी काम करने के लिए एकदम तैयार। क्या मजाल जो किसी से ऊंची आवाज में बात करें। उन दिनों उन्हें जिस भी सैक्शन में या जिस अधिकारी के साथ रखा जाता, वे अपने मृदु स्वभाव और आज्ञापालन की मिसाल कायम करते थे। वे थे भी युवा और नौकरी में नये-नये आये थे। &lt;br /&gt;  तभी तो उनकी ईमानदारी और मेहनत से खुश होकर एक बार बड़े साहब ने उन्हें  कोठी की ड्यूटी पर लगा दिया था। काम था घर के छोटे-मोटे काम कर देना और मेमसाहब की मदद करना। पता नहीं इस बात में कहां तक सच्चाई है पर तब कहने वाले यही कहते थे कि साहब के घर पर काम करते-करते उनकी जीभ मेमसाहब की जवानी देखकर ही लपलपाने लगी थी, शायद मेमसाहब को भी कुछ शक हो गया था कि शिलाकांत छुप-छप कर उन्हें  नहाते हुए या कपड़े बदलते हुए देखते रहते हैं। ऊपर से भोलेनाथ बने रहने के बावजूद वे अपनी नजरों का खोट नहीं छुपा पाये थे और वहां से तुरन्त हटा दिये गये थे। लेकिन उनके बारे में इसके ठीक उलटी कहानी भी कही जाती रही। वह यह कि मेमसाहब खुद ही उनकी जवानी और कदकाठी पर मोहित हो गयी थीं और उनसे घर के कामकाज करवाने के बजाय अपने हाथ-गोड़ दबवाने लगी थीं। वे इससे भी आगे बढ़ पातीं या शिलाकांत को आगे बढ़ने के लिये आमन्त्रित कर पातीं शिलाकांत खुद ही बिफर गये थे ‘हम यहां बीबियन की मालिस करने की पगार नहीं पाते हैं,’  उन्होंने आफिस में बड़े बाबू से कह दिया था, ‘हमें आफिस में काम करने की पगार मिलती है, हम यहीं काम करेंगे। बहुत कुरेद-कुरेद कर पूछ कर लोगों ने भीतर की बात जाननी चाही थी पर वे टस से मस नहीं हुए थे। इस पूरे प्रकरण पर एकदम चुप्प  हो गये थे। आज बीस-पच्चीस साल बीत जाने पर भी सच्चाई किसी को मालूम नहीं है।  &lt;br /&gt; शिलाकांत की तीन पत्नियां हैं। दो गांव में और एक यहां पर लोकल। गांव की दोनों शादियों से उन्हें सात बच्चे हैं, पांच लड़कियां, दो लड़के। यहां वाली से तीन बच्चे हैं, दो बच्चे उसकी पहली शादी के हैं। वह साथ लायी थी। एक शिलाकांत से हुआ। सबको पता है उनकी तीनों शादियों के बारे में, लेकिन ऑफिस में उनकी एक ही शादी और उससे पांच बच्चे दर्ज हैं। गांव वाली बीवियों, बच्चों को वे यहां कभी नहीं लाये। खुद हर साल एक बार महीने भर के लिए घर जाते हैं, कभी किसी बच्चें का गौना कर आते हैं, तो कभी ब्याह। खेती-बाड़ी के सारे मामले वे उसी महीने में निपटा आते हैं। सुना है पहले काफी खेती थी उनकी, उसी में और शिलाकांत के भेजे थोड़े-बहुत पैसों से गुजर हो जाया करती थी। इधर बच्चों के बड़े हो जाने और ब्याह वगैरह हो जाने के बाद काफी जमीन हाथ से निकल चुकी है। कुछ जमीन भाई लोगों ने दबा ली है।&lt;br /&gt;       पहले उनके घर से हफ्ते में तीन-चार चिटि्ठयां आया करती थीं। सबकी सब बैरंग, वे ही हर बार पैसे देकर छुड़ाते। सारी चिटि्ठयां बैरंग आने के पीछे दो वजहें थीं, पहली तो यह कि उनकी बीवियों, बच्चों, भाइयों में से किसी का भी आपस में जरा सा झगड़ा, तू-तू, मैं-मैं हुई नहीं कि बच्चों  की कापी से पन्ना फाड़ा, खुद लिखना आता है तो ठीक वरना किसी बच्चे़ को घेर-घार कर शिकायत लिखवायी, गोंद या चावल के माड़ से चिपकायी और डाल दी लाल डिब्बे  में। घर पर पैसे, पोस्टकार्ड न भी हो तो परवाह नहीं, पाती तो पहुंचेगी ही बाबा के पास। कर्इ बार तो ऐसा होता कि झगड़ा करने वाली दोनों पार्टियों के खत उन्हें  एक ही डाक से मिलते। इससे उन्हें झगड़े की पूरी बात दोनों पक्षों से पढ़ने को मिल जाती और उन्हें  यह फैसला करने में कतई दिक्कत नहीं होती कि अगली बार उन्हें  खत में क्या लिखना है।&lt;br /&gt; आठवीं पास हैं शिलाकांत। अपनी चिट्ठी पत्री खुद ही करते हैं। बैरंग चिटि्ठयां पाने में शिलाकांत को बेशक गांठ से काफी पैसे ढीले करने पड़ते लेकिन वे इसका बुरा नहीं मानते थे। वे दो तर्क देते, एक तो चिट्ठी वक्त पर मिलती है, उन्हें ही मिलती है, सलामत मिलती है और डाकिया खुद उन्हें ढूंढ़ कर देता है और दूसरे वे यह मानते कि घर-बार के लोगों को जब तक तुरन्त और मुफ्त में उन तक शिकायत पहुंचाने का अवसर मिलता रहे, तभी तक बेहतर। वे लिख कर अपना बोझ हलका कर लेते हैं तो उन्हें इस सुख से क्यों वंचित रखा जाये।      &lt;br /&gt;लेकिन उनकी यह सुखद स्थिति ज्यादा अरसा नहीं चल पायी थी। तीन-तीन बीवियां, दस बच्चे, मामूली-सा वेतन उनकी मानसिक और आर्थिक हालत डांवाडोल होने लगी थी, इसका असर उनके कामकाज और व्यवहार पर नजर आने लगा। हर समय चिड़चिड़ाये बैठे रहते। कभी जबान भी न खोलने वाले शिलाकांत लोगों से उलझने लगे। शायद उन्हें सबसे ज्यादा दिक्कत आर्थिक थी, सो कर्जे का सहारा लेने की जरूरत पड़ने लगी, अब उन्होंने बैरंग चिटि्ठयां लेना भी बंद कर दिया था। जब उन्हें  पता ही है कि इनमें झगड़ों की बातों और शिकायतों, पैसों की मांग के अलावा कुछ नहीं है तो और पैसे क्यों  बरबाद किये जायें। उनका मानसिक सन्तुलन बिगड़ने की स्थिति आ गयी। शायद एकाध लड़की की शादी की बात भी टूट गयी थी और उनका काफी पैसा दबा लिया गया था। वे मामला सुलझाने लिए एक बार गांव गये तो पूरे तीन-चार महीने तक नहीं लौट पाये थे। एक तो छुटि्टयां नहीं थीं उनके पास, सो रजिस्टर्ड डाक से बुलावे पहुंचने लगे और दूसरे यहां वाली बीवी और बच्चों के भूखे मरने की नौबत आ गयी। वह बेचारी सबसे पूछती फिरी। दो-दो, चार-चार रुपये उधार मांग कर दिन गिनती रही। &lt;br /&gt;शिलाकांत जब लौटे तो गांव के मामले सुलझने के बजाय और उलझ चुके थे। सिर पर भारी कर्ज हो गया था। ऑफिस में भी बिना छुट्टी गैर-हाजिर रहने की स्थिति अनुकूल नहीं रही थी। ऐसे कठिन समय में एक बहुत बड़ी दुर्घटना हो गयी शिलाकांत के साथ। &lt;br /&gt;उन्होंने जिस पठान से पैसे उधार ले रखे थे, अरसे से उसका ब्याज भी नहीं चुका पा रहे थे। बकाया वेतन न मिलने के कारण वैसे ही फाकों की हालत में उनके दिन कट रहे थे। ऐसे में एक दिन पठान सवेरे-सवेरे उनके घर जा धमका और लगा उन्हे गलियाने, ‘अगर कर्जा चुका नहीं सकते तो लेते क्यों हो?  तीन-तीन बीवियों से मजे लेने के लिए पैसे हैं और हमारे लिए नहीं है। शायद शिलाकांत का परिवार उस दिन फाके पर था, वैसे ही उनका पारा गर्म था, सो शिलाकांत बाहर निकले और पठान की अच्छी-खासी धुनाई कर दी। &lt;br /&gt;पठान रोता हुआ थाने जा पहुंचा और शिलाकांत हवालात के अन्दर हो गये। बहुत हाथ-पैर मारे, लेकिन कोई जमानत के लिए तैयार न हुआ। यूनियन ने भी मदद करने से मना कर दिया। ऑफिस वाले तो पहले से ही तैयार बैठे थे सस्पैंशन ऑर्डर के साथ। बड़ी मुश्किल से बीवी ने अपने सारे जेवर, बर्तन-भाण्डे बेचकर पठान का कर्ज चुकाया, पुलिस को खिलाया-पिलाया, तभी शिलाकांत बाहर आ सके। हवालात से तो बाहर आ गये, लेकिन ऑफिस के अन्दर न घुस सके। वे सस्पैण्ड किये जा चुके थे। अब भी यूनियन उनकी तरफ से केस लड़ने को तैयार न थी। पूरे चार महीने तक सस्पैण्ड रहे। जब नौकरी पर बहाल किया गया तो सजा के तौर पर दो साल के लिए वेतनवृद्धियां रोक दी गयीं और भविष्य में कायदे से रहने की हिदायत दी गयी। यूनियन के रुख से बेजार होकर शिलाकांत ने उसकी सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और अपनी अलग से यूनियन बना ली। अब तक उन्होंने शराफत का जामा उतार फेंका था और मैनेजमेंट को दिये गये आश्वासन के बावजूद खुराफातें करने में लगे रहे। उनकी तरह के कुछ और भी ऐसे कर्मचारी थे, जिनके सही गलत कामों में यूनियन ने पक्ष लेने से इन्‍कार कर दिया था या पूरी तरह से उनके साथ नहीं रही थी, वे सब शिलाकांत के साथ हो लिये। आखिर उन्हें भी तो कोई मसीहा चाहिये था। यह बात दीगर है कि उनकी यूनियन को न तो कभी मान्यंता दी गयी, न ही सुविधाएं और न ही किसी विवाद की स्थिति में मान्‍यता प्राप्त यूनियन की तरह बातचीत के लिए उन्हें बुलवाया गया। &lt;br /&gt;शिलाकांत ने कभी परवाह नहीं कि कि कोई उनकी यूनियन को घास नहीं डालता या उसे कोई यूनियन मानने के लिए तैयार ही नहीं है। वे हर वक्त इस बात की टोह लेते रहते कि मान्यता प्राप्त यूनियन या मैनेजमेंट से कब कोई गलती या चूक होती है। वे तुरन्त अपनी अधकचरी भाषा में पोस्टर तैयार करके, दीवार पर, यूनियन या ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर दन्न से चिपका आते। उनकी भाषा एक दम धमकी भरी होती और उसमें किसी का लिहाज न रहता। उन्हें कई बार वार्निंग दी गयी कि वे अपनी इन ओछी हरकतों से बाज आयें, पर वे कहां मानने वाले थे। &lt;br /&gt;उनकी इन हरकतों से परेशान होकर एक बार मान्यता प्रापत यूनियन ने भी तय कर लिया कि शिलाकांत को मजे चखाये जायें। किसी कर्मचारी के जरिये उनके खिलाफ शिकायतें की गयीं कि हालांकि उन्होंने तीन-तीन शदियां कर रखी हैं, लेकिन घोषित एक ही की है। एक से अधिक शादियां सेवा-नियमों के खिलाफ हैं इसलिए उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाये। किसी तरह शिलाकांत को यह खबर लग गयी कि यह शिकायत किसने की है। आधी रात को गंडासा लेकर उसके घर पहुंच गये और उसकी गर्दन पर गंडासा रखते हुए धमकाया, ‘’मेरी तीन बीवियों और दस बच्चों का तो किसी तरह गुजारा हो जायेगा, पर अगर तेरी बीवी विधवा हो गयी तो सड़क पर आ जायेगी। सोच ले।’ उसकी घिग्घी बंध गयी। उस बेचारे ने तो यूनियन के कहने पर शिकायत की थी, उसे क्या पड़ी थी कि किसके तीन बीवियां हैं या पांच। उसने अगले ही दिन अपनी शिकायत वापिस ले ली थी। फिर किसी ने उनसे शादी को लेकर कोई लफड़ा नहीं किया। &lt;br /&gt;अलबत्ता, अब शिलाकांत पहले वाले भोले-भाले आदर्श चपरासी नहीं रहे थे। वे लोगों से, अपने संगी-साथियों से कटते चले गये। पता नहीं किस बात पर वे कैसे रिएक्ट करें। हां, लोगों को ऑफिस का मनहूस वातावरण रंगीन बनाना हो, कुछ फुलझडि़यां  सुननी हों तो उनसे बढि़या कोई पात्र नहीं था। लोग अक्सर उनसे पंगे ले लेते, उन्हें छेड़कर अपनी सीट की तरफ बढ़ जाते शिलाकांत को सुलगता हुआ छोड़कर। घंटों बकझक करते रहते शिलाकांत। कई बार स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती। वे तो अपनी तरफ से तो बड़ा सूझ भरा कदम उठाते, लेकिन सयाना बनने के चक्कर में उनसे कोई मौलिक बेवकूफी हो जाती। कई बार वे और लोगों के झांसे में भी आ जाते और ऊटपटांग हरकतें कर बैठते। &lt;br /&gt;एक बार ऑफिस के बाद कहीं जाने के लिए घर से निकले। चकाचक धोती और कुर्ता। शायद किसी दावत में जीमने जा रहे थे। बस स्टैण्ड पर भीड़ थी। दो-तीन बसें आयीं, लेकिन वे चढ़ नहीं पाये। एक बस रुकी। उसमें पहले ही बहुत भीड़ थी। किसी तरह वे फुटबोर्ड पर एक पैर रखने की जगह भर बना पाये थे कि बस चल पड़ी। दूसरा पैर जमीन पर था। शायद ऑफिस के ही किसी आदमी ने उनकी धोती पर पैर रख दिया। बस चल चुकी थी। नतीजा यह हुआ कि उसके पैर रखने से इनकी धोती जो खुली, खुलती चली गयी और बस के पीछे-पीछे हवा में लहराने लगी। शिलाकांत जी अजीब दुविधा में फंसे चिल्लाने लगे, ‘’अरे भाई बस रोको।‘’ वे मुश्किल से एक हाथ से डण्डा  पकड़े हुए थे। दूसरे हाथ से धोती लपकने की कोशिश की, पर हाथ भीड़ में ही फंस कर रह गया। बस तेज हो चुकी थी और उनकी धोती लहराने के बाद अब सड़क पर बिछी हुई थी। उन्होंने दनादन दो-चार गालियां ड्राइवर को, धोती पर पैर रखने वालों को और ही-ही कर रही जनता को दीं। किसी तरह बस रुकी, अपने कुर्ते को दबाये-दबाये धोती की तरफ लपके। धोती सड़क पर मिट्टी में बुरी तरह से गंदी हो गयी थी। बस अड्डे पर खडे लोग भी उनकी हरकत के मजे ले रहे थे। उन्हें और ताव आ गया। एक आड़ में जाकर धोती लपेटी और बस स्टैण्ड पर आकर जोर-जोर से गालियां बकने लगे, ‘’किस सरऊ की हिम्मत हुई है, सामने आये। हमारा वो देखना चाहता है धोती खुलबाय के तो ले, देख ले’’ वे वहीं बिना किसी का भी लिहाज किये अश्लील हरकतें और गाली-गलौज करने लगे। अगर उन्हें पता चल जाता कि धोती पर पैर किसने रखा है, तो उस दिन उसकी खैर नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिलाकांत काण्ड की खबर डिप्टी साहब तक पहुंच गयी है। हालांकि उनके लिए यह बहुत अच्छा  अवसर है अपने पुराने अपमान का बदला लेने का, लेकिन फिर भी वे रिस्‍क नहीं लेना चाहते। इतने साल बीत जाने पर भी न तो वे उस अपमान की कड़वी यादें भूल पाये हैं और न ही उसका बदला ही ले पाये हैं शिलाकांत से। ज्यों  ही उन्हें खबर दी गयी है कि शिलाकांत वहां खुराफात कर रहा है, क्या किया जाये, उन्हें मन्त्रांलय का कोई भूला हुआ काम याद आ गया है। उन्होंने तुरन्त जीप मंगवाने के लिए पी.ए. से कहा और एक फाइल उठा ऑफिस से फुर्र हो गये। न वहां होंगे, न इस बारे में कोई फैसला ही करना पड़ेगा। वे चाहें तो आज इस बच्चू को अच्छा मजा चखा सकते हैं, लेकिन उन्हें  पता है, यह औंधी खोपड़ी कल उनके केबिन में भी भरत नाट्यम करने पहुंच सकता है। फिर कहीं दांव शिलाकांत का पड़ गया तो। &lt;br /&gt;यह किस्सा काफी पहले का है। वे प्रशासनिक अधिकारी थे तब। शिलाकांत की खुराफातों से बहुत तंग आये हुए थे। कई बार समझाने, धमकाने, वेतन काटे जाने, वार्निंग दिये जाने के बावजूद वे सीधी राह पर नहीं आ रहे थे। कई विभागीय जांचें उनके खिलाफ चल रही थीं। शिलाकांत अपने मन की तरंग में यही माने चल रहे थे कि वे तो एकदम ठीक हैं। प्रशासनिक अधिकारी ही उनके पीछे पड़े हुए हैं हाथ धो के। दोनों अपनी-अपनी तरफ से दूसरे को गलत सिद्ध करने में और नीचा दिखाने में लगे हुए थे। संयोग से शिलाकांत मौका हथिया ले गये। &lt;br /&gt;डिप्टी साहब एक दिन लंच के वक्‍त यूं ही ज़रा धूप में अकेले खड़े हुए थे। आस पास बाबू, चपरासी लोग बैठे ताश खेल रहे थे। थोड़ी दूर कुछ और अधिकारी खड़े बतिया रहे थे। तभी जनाब शिलाकांत उनके पास आये और सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर खड़े हो गये। शिलाकांत के पास आते ही वे समझ गये थे कि आज कुछ अनहोनी होने ही वाली है। तभी शिलाकांत ने नमस्कार की मुद्रा में झुके-झुके ही उन्हें मां बहन की गालियां देना शुरू कर दिया। वे जब तक संभलते, समझते, शिलाकांत जी उन्हें बुरी तरह गालिया कर गेट की तरफ बढ़ चुके थे। इस सारी प्रक्रिया में मुश्किल से एक मिनट लगा। पूरे समय के दौरान शिलाकांत सिर झुकाये, हाथ जोड़े खड़े रहे। &lt;br /&gt;पहले तो उनकी समझ में ही नही आया, यह सब क्या  हो गया, फिर वे एकदम गुस्से  में आग-बबूला हुए साहब के केबिन की तरफ लपके थे। साहब लंच के बाद की झपकी ले रहे थे। डिप्‍टी इतने गुस्से में थे कि साहब के सामने पूरी बात कहने में भी तकलीफ हो रही थी। पूरी बात सुन कर साहब उनके साथ लपके हुए बाहर आये थे। डिप्टी साहब ने आसपास  मौजूद कई लोगों को बुलवा लिया था कि इन सबके सामने शिलाकांत ने मुझे गालियां दी है। वह सुनकर सभी सकपका गये थे। दरअसल किसी ने भी उसे गालियां देते हुए नहीं सुना था। बस उसे झुके-झुके गिड़गिड़ाते हुए देखा था। वैसे भी गंडासे वाले किस्से के बाद किसकी हिम्मत थी कि उनके खिलाफ झूठी-सच्ची गवाही दे। सबने वही कहा जो उन्हों ने देखा था। सुना तो वैसे भी किसी ने कुछ नहीं था। डिप्टी साहब को इसकी कतई उम्मीद नहीं थी कि वे इस अपमान का एक भी गवाह नहीं जुटा पायेंगे। वे अभी भी अपमान की आग में जल रहे थे। शिलाकांत उनके मुंह पर थूककर चले गये थे और उसकी जलालत वे झेल रहे थे। &lt;br /&gt;शिलाकांत कोई सवा दो बजे आये। लंच टाइम खत्म होने के पैंतालीस मिनट बाद। उन्हें  तुरन्त तलब किया गया और एकदम कड़े शब्दों  में इस घटना के बारे में साहब ने खुद पूछा। वे साफ मुकर गये, ‘’अजी साहब, क्या बात करते हैं, हम और साहब को गाली दिये?  ना ना, कभी नहीं हुजूर, हम तो साहब से दरखास करने गये थे कि साहेब घर पर हमारा बचवा बुखार में तड़प रहा है। सो हमें आधे घंटे की छुट्टी दी जाये ताकि हम उसे डाक्टर के पास ले जाकर उसकी दवा-दारू का इंतजाम कर सकें और हम कुछ नहीं बोले साहब !  साहब से बस हाथ जोड़े विनती करते रहे। सब बाबू लोग इसके गवाह हैं हुजूर। किसी से भी पूछ लीजिये और अगर हम झूठ बोल रहे हैं तो हमें अपने बीमार बच्चे की कसम। ये देखिये उसकी दवा की पर्ची भी हमारे पास है।‘’ और उन्होंने जेब से डाक्टर की पर्ची निकालकर दिखा दी। &lt;br /&gt;साहब और वे खुद दोनों ही समझ गये थे कि आज शिलाकांत ऊंचा खेल खेल गये हैं। बेहद शातिराना अंदाज में। उन पर हाथ डालने की कोई गुंजाइश नहीं थी। साहब ने शिलाकांत को भेजकर डिप्टी के कंधे पर हाथ रखकर कहा था। ‘’सम अदर टाइम सम अदर वे। वी कांट ट्रैप हिम टूडे। &lt;br /&gt;उनका मुंह अपमान से काला पड़ गया था। उनकी मुटि्ठयां शिलाकांत का गला दबाने के लिए कसमसा रही थीं और वे कुछ नहीं कर पा रहे थे। आज उसी घटना की याद ताजा हो आयी थी उन्हें और वे जीप लेकर निकल गये थे। आज अगर वे उसे घेर भी लें, क्या गारंटी कल शिलाकांत पहले जैसा खेल नहीं खेलेगा। उससे दूर ही भले। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीले पर अभी भी शिलाकांत का प्रवचन जारी है—‘’साले, समझते हैं कि शिलाकांत अकेला है। उसके आगे-पीछे रोने वाला कोई नहीं है। मार डालेंगे। बंबू किये रहेंगे ताकि शान्ति से बैठा रहे। अन्याय सहता रहे। हम बताये देत हैं मनिजमेंट और उसके चमचों के लिए हम ही अकेले काफी हैं। सबकी  . . . में डंडा करने को। एक-एक को बुलवाये लो। सबकी फाड़ के न रख दी तो हमारा नाम भी शिलाकांत नहीं,’’ वे अपने अंग विशेष को हिलाते हुए बके जा रहे हैं। नीचे भीड़ बहुत बढ़ गयी है। लंच टाइम हो चुका है सो सभी वहीं भागे चले आ रहे हैं। हर बार कोई न कोई उन्हें  उकसा देता है और वे नये से शुरू हो जाते है। तभी किसी ने उनकी तरफ एक तौलियानुमा कपड़ा फेंका ताकि वे बांध लें उसे और अपनी नंगई छोडें। वे फिर दहाड़े, ‘’ले जावो इस कफनी को और ओढ़ाय देव मनिजमेंट की लास को। वही बिना कफन के जलाने के इंतजार में सड़ रही है।‘’ सुरक्षा अधिकारी कुछेक गार्डों के साथ उन्हें नीचे उतारने और कपड़े पहनाने की कोशिश करता है, वे ऊपर से पत्‍थर मारने लगते हैं। उसी के पितरों का तर्पण करने लगते हैं।&lt;br /&gt;जब बड़े साहब को इस मामले की खबर दी गयी तो वे एकदम आगबबूला हो गये हैं, तुरन्त प्रशासनिक अधिकारी, कार्मिक अधिकारी और सुरक्षा अधिकारी को तलब किया गया है। वे दहाड़े, ‘’ये क्या हो रहा है ऑफिस में। यह ऑफिस है या गंगाघाट? आप लोग कुछ देखते करते क्यों नहीं? उन्होंने बारी-बारी से तीनों को घूरा। कोई कुछ कह से, इससे पहले ही वे बोले, ‘’नो, नो, मै कुछ सुनना नहीं चाहता। अगर वह सीधी तरह नही मानता, तो टेक सम स्टर्न एक्शन। कॉल पुलिस। ही इज स्पाइलिंग द ऑफिस एटमास्फेयर। डू समथिंग इमीडियेटली’’ उन्होंने बिना किसी को कुछ भी कहने का मौका दिये हुए कहा। कार्मिक अधिकारी ने किसी तरह से हिम्मत जुटाकर कहा, ‘’सर पुलिस बुलाने में बहुत कंपलीकेशंस हैं। अगर वह गिरफ्तार कर लिया गया तो बाद में कोर्ट-कचहरी के चक्कर हमें ही काटने पड़ेंगे।‘’ कार्मिक अधिकारी अपनी खाल बचाये रखना चाहते हैं।  &lt;br /&gt;‘’देन डू व्हाट एवर यू कैन डू, बट दिस रास्कल मस्ट वी टॉट ए लेसन दिस टाइम।‘’ तभी उन्हें कुछ सूझा, तीनों को रुकने के लिए कहा और एकदम फैसला करने के अन्दाज में बोले, ‘’एक काम कीजिये आप’’ उन्होंने सुरक्षा अधिकारी से कहा, ‘’आप फायर ब्रिगेड को फोन कीजिये, फायर इंजिन से उसकी अच्छी तरह धुलाई करा दीजिए।  अपने आप ठिकाने होश आ जायेंगे, उस इडियट के।‘’ तीनों अधिकारी साहब से एकदम सहमत हो गये हैं। उन्हें मन ही मन अफसोस भी हुआ कि इतना बढिया आइडिया उन्हें क्यों नहीं सूझा। &lt;br /&gt;फायर इंजिन की घंटी की आवाज सुनकर वहां खड़ी भीड़ में भगदड़ मच गयी है। उसके लिए एकदम रास्ता बना दिया गया है। धक्का मुक्की करके हर आदमी अब आगे जाना चाह रहा है। सब हैरान भी हो रहे हैं कि यह किसके दिमाग की उपज है। डेढ़-दो घंटे से जो तमाशा चल रहा है, उसका पटाक्षेप होने ही वाला है। यह दृश्य कोई भी मिस नहीं करना चाहता। फायरमैन अपनी-अपनी पोजीशन लेकर पानी का जेट तैयार करके आदेश की प्रतीज्ञा में हैं। सुरक्षा अधिकारी, कार्मिक अधिकारी और अन्य अधिकारी शिलाकांत को आखिरी चेतावनी दे रहे हैं: ‘’शराफत से कपड़े पहनकर नीचे आ जाओ वरना.....’’ &lt;br /&gt;शिलाकांत यह सब अमला देखकर और भड़क गये हैं। और ऊँचे टीले पर जा खड़े हुए हैं और अपनी गालियों का प्रसाद नये मेहमानों को भी देने लगे हैं। सब लोग हो-हो करके हंसने लगे। सुरक्षा अधिकारी को एकदम ताव आ गया। वह पहले वहां खड़ी भीड़ पर दहाड़ा, ‘’क्‍या तमाशा लगा रखा है सबने यहां? जाओ अपनी-अपनी सीट पर। आप लोगों की वजह से ही वह इतनी देर से नाटक कर रहा है। जाइए आप लोग’’, लोग दो-चार कदम पीछे हट कर फिर खड़े हो गये। गया कोई नहीं। वे इस नाटक का अन्त देखे बिना कैसे जा सकते हैं। &lt;br /&gt;तभी सुरक्षा अधिकारी ने शिलाकांत को स्नान कराने का आदेश दे दिया। पानी की तेज धार जब उन पर पड़ी तो वे सारी गालियां भूल गये। फायरमैनों को भी आज की इस ड्यूटी में मजा आ रहा है। उन्होंने शिलाकांत को पानी की मोटी धार से इतना परेशान कर दिया कि उनके लिए खड़ा रहना मुश्किल हो गया। वे चिल्लाने लगे। पहले घुटनों के बल झुके, तो पानी की धार भी नीचे कर दी गयी। फिर वे जमीन पर बिल्कु‍ल लेट से गये। हाथ ऊपर करके हाय-हाय करने लगे। उनकी सांस फूल गयी और वे हांफने लगे। सुरक्षा अधिकारी ने पानी रोकने का इशारा किया और चिल्ला कर पूछा, ‘’क्यों श्रीमान, दिमाग की मैल उतर गयी या अभी बाकी है ?’’ &lt;br /&gt;शिलाकांत एकदम बेदम पड़े हैं बुरी तरह हांफते हुए। हाथ हवा में टंगे हुए है। खेल खत्म हो गया है। सुरक्षा अधिकारी ने अग्निशमन दल को धन्यवाद दिया और सुरक्षा गार्डों को आदेश दिया कि वे शिलाकांत को कपड़े पहनाकर उसके केबिन में ले आयें। &lt;br /&gt;लोगों के हुजूम लौट रहे हैं, ऑफिस की तरफ। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा आ जाये, वाला भाव लिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-5423836760291429840?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/5423836760291429840/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=5423836760291429840&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/5423836760291429840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/5423836760291429840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='बाजीगर - तेईसवीं कहानी'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-7107274086590065279</id><published>2008-10-25T17:30:00.001+05:30</published><updated>2008-10-25T17:41:14.963+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ई बुक'/><title type='text'>उपन्‍यास देस बिराना ई बुक के रूप में</title><content type='html'>हमारे मित्र रवि रतनामी ने अपने ब्‍लाग rachanakar.blogspot.com पर कुछ दिन पहले पाठकों तक मेरी दो किताबें ई बुक्‍स के जरिये पाठकों तक पहुंचायी हैं। ये हैं चार्ली चैप्लिन की आत्‍म कथा का अनुवाद http://www.esnips.com/doc/26a37191-f6a2-41b2-8946-119ab4c771b4/charlie-chaplin-ki-atma-katha-by-suraj-prakash&lt;br /&gt;और चार्ल्‍स डार्विन की आत्‍म कथा का अनुवाद -http://www.esnips.com/doc/59aa7087-a4e3-4d84-9902-a10f4414b42c/charls-darwin-ki-aatmakatha। &lt;br /&gt;अब वे मेरे उपन्‍यास देस बिराना को ई बुक के रूप में ले कर आये हैं। http://rachanakar.blogspot.com/2008/10/blog-post_8070.html&lt;br /&gt;इस उपन्यास को पीडीएफ़ ई-बुक में डाउनलोड कर पढ़ने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें.&lt;br /&gt; उपन्‍यास ऑनलाइन विकि सोर्स पर भी उपलब्ध है. विकि सोर्स पर ऑनलाइन पढ़ने के लिए यहाँ  जाएँ)&lt;br /&gt;बेहद पठनीय और सहज भाषा शैली में रचा गया यह मार्मिक उपन्यास एक ऐसे अकेले लड़के की कथा लेकर चलता है जिसे किन्हीं कारणों के चलते सिर्फ चौदह साल की मासूम उम्र में घर छोड़ना पड़ता है, लेकिन आगे पढ़ने की ललक, कुछ कर दिखाने की तमन्ना और उसके मन में बसा हुआ घर का आतंक उसे बहुत भटकाते हैं। यह अपने तरह का पहला उपन्यास है जो एक साथ ज़िंदगी के कई प्रश्नों से बारीकी से जूझता है। अकेलापन क्या होता है, और घर से बाहर रहने वाले के लिए घर क्या मायने रखता है, बाहर की ज़िंदगी और घर की ज़िंदगी और आगे बढ़ने की ललक आदमी को सफल तो बना देती है लेकिन उसे किन किन मोर्चों पर क्या क्या खोना पड़ता है, इन सब सवालों की यह उपन्यास बहुत ही बारीकी से पड़ताल करता है। इसी उपन्यास से हमें पता चलता है कि भारत से बाहर की चमकीली दुनिया दरअसल कितनी फीकी और बदरंग है तथा लंदन में भारतीय समुदाय की असलियत क्या है।&lt;br /&gt;प्रसंगवश ये उपन्‍यास एमपी3 में ऑडियो रिकार्डिंग के रूप में भी उपलब्‍ध है। इसे तैयार कराया था लंदन की एशियन कम्‍यूनिटी आर्टस और कथा यूके ने।&lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-7107274086590065279?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/7107274086590065279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=7107274086590065279&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/7107274086590065279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/7107274086590065279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='उपन्‍यास देस बिराना ई बुक के रूप में'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' 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इस पात्र को मैं कभी भी अपने या शायद पात्र के मनमाफिक तरीके से नहीं लिख पाया, बेशक आज भी मुझे वो उतना ही हांट करता है और हर बार कोई भी कहानी शुरू करने से पहले वह चरित्र अपने हिस्से के शब्द मुझसे मांगता है लेकिन हर बार यही कहानी रह जाती है। &lt;br /&gt;इसी चक्कर में 24 बीस बीत जाने के बाद भी आज भी मेरी ये पहली कहानी अप्रकाशित ही रह गयी है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अल्बर्ट&lt;br /&gt;मुझे तुम पर शर्म आ रही है अल्बर्ट। तुम इस लायक भी नहीं रह गये हो माय सन कि तुम्हें बेटा कहूं। पता नहीं यह पत्र पढ़ने के लिए तुम घर पर लौट कर आओगे भी या नहीं। मुझे पता होता कि यहां आने पर मुझे इस तरह से परेशान होना पड़ेगा तो मैं आता ही नहीं। चार दिन से बंबई आया हुआ हूं और तुम्हारा बंद दरवाजा ही देख रहा हूं। सुबह शाम तुम्हारे घर के चक्कर काट काट कर थक गया हूं। तुम्हारा पड़ोसी बता रहा था कि यह पहला मौका नहीं है कि तुम चार पांच दिन से घर नहीं लौटे हो। पहले भी कई बार ऐसा होता रहा है कि तुम कई कई दिन घर नहीं लौटते या घर पर होते हो तो दरवाजा नहीं खोलते। कहां रहते हो, क्या करते हो, किसी को कोई खबर नहीं। तुम्हारे ऑफिस के भी चक्कर काटता रहा हूं। वहां तुम पंद्रह दिन से नहीं गये हो। दरअसल तुम्हारे ऑफिस ने जब तुम्हारी खोज खबर लेने के लिए ये वाली रजिस्ट्री हमारे पास गोवा भेजी तो ही हमें पता चला कि तुम फिर अपनी पुरानी हरकतों पर उतर आये हो तो मुझे खुद आना पड़ा। अब मैं तुम्हें कैसे बताऊं कि मुझे यहां आने के लिए कितनी मुश्किलों से पैसों का जुगाड़ करना पड़ा है।&lt;br /&gt;अल्बर्ट, क्यों तुम इस तरह से अपने आप से नाराज़ हो और खुद को शराब में खत्म कर रहे हो। कितने बरस हो गये तुम्हें इस तरह से एक बेतरतीब, बेकार और अर्थहीन जिंदगी जीते हुए। तुम महीना महीना ऑफिस नहीं जाते। जाते भी हो तो पीये रहते हो। तुम्हारे ऑफिस वाले बता रहे थे कि तुम काम में एक्सपर्ट होने के बावजूद काम नहीं कर पाते क्योंकि न तो तुममें काम में ध्यान देने की ताकत रह गयी है और न ही तुम्हारा शरीर ही इस बात की इजाज़त देता है। तुम्हारे ऑफिस वाले इन सबके बावजूद तुम्हें नौकरी से नहीं निकालते। तरह तरह से काउंसलिंग करके, जुर्माने लगा कर और वार्निंग दे कर तुम्हें सही राह पर लाने की कोशिश करते रहते हैं। सिर्फ इसलिए कि तुम फुटबॉल के बहुत अच्छे खिलाड़ी रहे हो। काम में बहुत माहिर माने जाते रहे हो और फिर तुम्हें ये नौकरी खिलाड़ी होने की वजह से ही तो मिली थी। उन्हें विश्वास है कि तुम ज़रूर यीशू मसीह की शरण में लौट आओगे और फिर से अच्छा आदमी बनने की कोशिश करोगे। पर कहां। तुम जो जिंदगी जी रहे हो, तुमने कभी सोचा है कि तुम खुद के साथ और अपने बूढ़े पेरेंट्स के साथ कितना गलत कर रहे हो। हमारी बात तो खैर जाने दो। बहुत जी लिये हैं। रही सही भी किसी तरह कट ही जायेगी। पर कभी अपनी भी तो सोचो। इस तरह से कब तक चलेगा।&lt;br /&gt;याद करो बेटा, तुमने कितना शानदार कैरियर शुरू किया था। किसी भी फील्ड में तुम पीछे नहीं रहे थे। पढ़ाई में तो हमेशा फर्स्ट आते ही थे, सभी स्पोर्ट्स में खूब हिस्सा लेते थे तुम। स्कूल और कॉलेज की फुटबॉल की टीम के हमेशा कैप्टन रहे। फिर गोवा की तरफ से खेलते रहे। तुम्हारी पर्फार्मेंस बेहतर होती गयी थी। तब हम सब कितने खुश हुए थे जब कुआलाम्पुर जाने वाली नेशनल टीम में तुम चुने गये थे। उस रात हम देर तक नाचते गाते रहे थे। &lt;br /&gt;तुम्हारी टीम जीत कर आयी थी। जीत का गोल तुमने दागा था। तुम्हारी वापसी पर एक बार फिर हमने सेलिब्रेट किया था। हमने मदर मैरी को थैन्क्स कहा था कि तुम्हारा लाइफ कितने शानदार तरीके से शुरू होने जा रहा था। तभी तुम्हें स्पोर्ट्स कोटा में ये नौकरी मिल गयी थी और तुम बंबई आ गये थे। बस, बेटे तभी से तुम शराब के हो कर रह गये हो। तुमने एक बार भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा है। पहले तुम बंबई में आपनी शामों का अकेलापन काटने के लिए पीते रहे। हमने बुरा नहीं माना। हमारी पूरी कम्यूनिटी पीती है। सेलिब्रेट करती है। और फिर हम तुम्हें साथ बिठा कर पिलाते रहे हैं, लेकिन एक लिमिट तक। पर शायद हमारी ही गलती रही। तुम तो रोज़ ही पीने लग गये थे। दिन में नौकरी या थोड़ी बहुत फुटबॉल और शाम को तुम अकेले ही पीने बैठ जाते थे। जब हमें पता चला था तो हमने यही समझा था कि नया नया शौक है, तुम खुद संभल जाओगे, लेकिन नहीं। तुम नहीं संभले तो नहीं ही संभले। हमने तुम्हारी मैरिज करानी चाही तो तुम हमेशा ये कह कर ही टालते रहे कि खुद तो होटल की डोरमैटरी में पड़ा हूं, फैमिली कहां रखूंगा।&lt;br /&gt;बस, तब से सब कुछ हाथ से छूटता चला गया है। कितने बरस हो गये तुमसे ढंग से बात किये हुए। गोवा तुम कभी आते नहीं। तुम्हारी ममा तुम्हारे लिए कितना तो रोती है। अब तो बेचारी ढंग से चल फिर भी नहीं सकती। बेटे का सुख न उसने देखा है न मैंने। &lt;br /&gt;तुम यकीन नहीं करोगे अल्बर्ट, उस समय मैं कितना टूट गया था जब तुम्हारे ऑफिस के लोगों ने हमें बताया कि तुम्हारी गैर हाजरी के कारण तुम्हारी पगार हर साल बढ़ने के बजाये कम कर दी जाती है। कोई ऐसा एंडवास या लोन नहीं जो तुमने न ले रखा हो। ऑफिस का कोई ऐसा बंदा नहीं जिसके तुमने सौ पचास रुपये न देने हों। और कि तुम कहीं भी पार्क में, रेलवे प्लेटफार्म पर या ऑफिस की सीढियों में ही सो जाते हो। सामान के नाम पर तुम्हारे पास टूथ ब्रश और दो फटे पुराने कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं। एक जोड़ा जो तुमने पहना होता है और दूसरा, तुम्हें ये फ्लैट मिलने तक तुम्हारी ड्रावर में रखा रहता था।&lt;br /&gt;तुम्हारे सैक्शन ऑफिसर बता रहे थे कि तुम ढंग से जी सको, और अपनी पूरी पगार एक ही दिन में पीने में न उड़ा दो, इसके लिए उन्होंने तुम्हारी पगार एक साथ न देकर तुम्हें कुछ रुपये रोज देना शुरू किया था लेकिन कितने दिन। तुम तब से ऑफिस ही नहीं गये हो।&lt;br /&gt;माय सन, शायद हमें ये दिन भी देखने थे। इस बुढ़ापे में तुम्हारी मदद मिलना तो दूर, हर बार कोई ऐसी खबर जरूर मिल जाती है कि हम शर्म के मारे सिर न उठा सकें। तुम्हारा पड़ोसी बता रहा था कि जब ऑफिस से सीनियरटी के हिसाब से तुम्हें ये फ्लैट मिला तो तुम्हारे पास फ्लैट की सफाई के लिए झाड़ू खरीदने तक के पैसे नहीं थे। सामान के नाम पर तुम्हारी मेज की ड्रावर में जो सामान रखा था, वही तुम एक थैली में भर कर ले आये थे। तुम्‍हारी लत ने तुम्हें यहां तक मजबूर किया कि तुम फ्लैट के पंखे तक बेचने के लिए किसी इलैक्ट्रिशियन को बुला लाये थे। &lt;br /&gt;बेटे, तुम छोड़ क्यों नहीं देते ये सब . . . नौकरी  भी। गोवा में हमारे साथ ही रहो। जैसे तैसे हम चला रहे हैं, तुम्हारे लिए भी निकाल ही लेंगे। हर बार तुम वादा करते हो, कसम खाते हो, दस बीस दिन ढंग से रहते भी हो, फिर तुम वही होते हो और तुम्हारी शराब होती है। &lt;br /&gt;तुम्हारे ऑफिस वालों ने तुम्हारी मेडिकल रिपोर्ट दिखायी थी मुझे। गॉड विल हैल्‍प यू माय सन। तुम जरूर अच्छे हो जाओगे। छोड़ दो बेटे ये सब। तुम्हारी ममा तुम्हारी सेवा करके तुम्हें अच्छा कर देगी।&lt;br /&gt;पिछले एक बरस में मैं चौथी बार बंबई आया हूं। पिछली बार की तरह इस बार भी तुम मुझे नहीं मिले हो। तुम्हारी ममा ने इस बार यही कह कर मुझे भेजा था कि तुम्हें साथ ले ही आऊं। पर तुम्हें ढूंढूं कहां। पिछले चार दिन से तुम्हारे घर और ऑफिस के चक्कर काट काट कर थक गया हूं। तुम्हारी तलाश में कहां कहां नहीं भटका हूं। तुम कहीं भी तो नहीं मिले हो।&lt;br /&gt;अल्बर्ट, मैं थक गया हूं। तुम्हें समझा कर भी और तुम्हें तलाश करके भी। फिर कब आ पाऊंगा कह नहीं सकता। इन चार दिनों में भी होटल में, खाने पीने में और आने में कितना तो खर्चा हो गया है। चाह कर भी एक दिन भी और नहीं रुक सकता। वापसी के लायक ही पैसे बचे हैं। &lt;br /&gt;ये खत मैं तुम्हारे दरवाजे के नीचे सरका करक जा रहा हूं। कभी लौटो अपने घर और होश में होवो तो ये खत पढ़ लेना। मैं तो तुम्हें अब क्या समझाऊं। तुम्हें अब यीशू मसीह ही समझायेंगे और ..। &lt;br /&gt;गॉड ब्लेस यू माय सन..।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-7921312443987140971?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/7921312443987140971/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=7921312443987140971&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/7921312443987140971'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/7921312443987140971'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/10/1984.html' title='अल्बर्ट -1984 में लिखी पहली कहानी'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' 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src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-3397819435801099275?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/3397819435801099275/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=3397819435801099275&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/3397819435801099275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/3397819435801099275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='चार्ली चैप्लिन की आत्‍मकथा का अनुवाद रचनाकार.ब्‍लागस्‍पाट पर'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-1053805128818165644</id><published>2008-08-29T10:22:00.002+05:30</published><updated>2008-08-29T10:37:18.587+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>बाइसवीं कहानी रचनाकार.ब्‍लागस्‍पाट पर</title><content type='html'>मित्रो &lt;br /&gt;आदान प्रदान योजना के तहत मेरी लम्‍बी कहानी देश, आज़ादी की पचासवीं वर्षगांठ और एक मामूली सी प्रेम कहानी आप रचनाकार.ब्‍लागस्‍पाट पर पढ़ें. लिंक यहां दे रहा हूं. मेरे अपने ब्‍लाग पर रचनाएं आती रहेंगी &lt;br /&gt;http://rachanakar.blogspot.com/2008/08/blog-post_5754.html&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-1053805128818165644?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/1053805128818165644/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=1053805128818165644&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/1053805128818165644'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/1053805128818165644'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/08/blog-post_29.html' title='बाइसवीं कहानी रचनाकार.ब्‍लागस्‍पाट पर'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-274944790077652907</id><published>2008-08-21T15:39:00.000+05:30</published><updated>2008-08-21T15:41:30.918+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>इक्‍कीसवीं कहानी - घर बेघर</title><content type='html'>घर बेघर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंदन से महेश आया हुआ है। यारी रोड का अपना मकान खाली कराने के लिए। दो बरस पहले जब वह हमेशा के लिए लंदन बसने के इरादे से बंबई से गया था वो एक भरोसेमंद एजेंट की मार्फत एक बरस के लिए अपना मकान एक मलयाली को दे कर गया था। तय हुआ था कि वह ठीक एक साल बाद मकान खाली कर देगा। और भी कुछ वायदे किये थे उसने, मसलन वह महेश की सारी डाक एस्टेट एजेंट के पास पहुँचाता रहेगा जो उसे किसी न किसी जरिये से लंदन भिजवाने का इंतजाम करने वाला था। सारे बिल अदा करेगा और सोसाइटी चार्जेज वक्‍त पर अदा करेगा। लेकिन उसने कोई भी वायदा पूरा नहीं किया था। न डाक भिजवायी थी, न टेलिफोन बिल अदा किये थे, न ही सोसायटी चार्जेज टाइम पर दिये थे। और तो और, बीच–बीच में बिल अदा न किये जाने के कारण दो तीन बार बिजली भी कट चुकी थी।&lt;br /&gt;उससे यह भी तय हुआ था कि वह मकान का किराया नियमित रूप से महेश की तरफ से एजेंट को देता रहेगा, लेकिन किराया भी उसने छः सात महीने का ही जमा कराया था।&lt;br /&gt;महेश बता रहा है कि उसने किरायेदार को कई पत्र लिखे, संदेश भिजवाये लेकिन किसी भी तरह से वह पकड़ में नहीं आया। कई बार फोन करने पर एक आध बार जब वह पकड़ में आया भी तो गिड़गिड़ाने लगा कि छः महीने की मोहलत और दे दो। छः महीने पूरे होते ही वह मकान खाली कर देगा। सारे पेमेंट भी कर देगा और किसी भी तरह की शिकायत का मौका नहीं देगा।&lt;br /&gt;लंदन में बैठे हुए महेश के पास इसके अलावा और कोई उपाय भी नहीं था क्योंकि इस बीच उसका एजेंट भी अपनी दुकान बंद करके वहां से गायब हो चुका था और किरायेदार से कम से कम सात महीने का किराया भी ले जा चुका था। ये वही एजेंट था जो महेश के लंदन जाते समय आधी रात को अपनी वैन ले कर आया था और उसका सारा सामान लाद कर एयरपोर्ट ले गया था। महेश को विदा करते समय वह महेश के गले लग कर फूट–फूट कर रो रहा था और टेसुए बहा रहा था कि आप जैसा खरा और जिंदादिल इंसान मैंने जिंदगी में नहीं देखा। और यही एजेंट अपना बोरिया–बिस्तर समेट कर चंपत हो चुका था।&lt;br /&gt;महेश बता रहा है कि लंदन से चलने से पहले उसने किरायेदार को दसियों बार फोन करके अपने आने की सूचना दे दी थी कि वह सिर्फ मकान खाली कराने के मकसद से ही आ रहा है और उसका यहाँ और कोई काम नहीं है। इसलिए वह जैसे भी हो, मकान खाली रखे ताकि उसे यहाँ बेकार में रुकना न पड़े। किरायेदार के ही कहने पर महेश ने यहाँ आने की तारीख दो बार बदली। जब भी महेश ने उसे बताया कि मैं आ रहा हूँ, किरायेदार ने कोई न कोई बहाना बना कर थोड़ा समय और मांगा। एक बार दो महीने का और एक बार एक महीने का। दो बार किरायेदार के कारण और एक बार खुद की छुट्टी मंजूर न होने के कारण महेश का आना तीन बार टला और आखिर वह आ ही गया है।&lt;br /&gt;महेश के यहाँ पहुंचते ही हम दोनों ने सुबह–सुबह ही किरायेदार के घर पर हमला बोल दिया है। यही वक्‍त है जब उसे घर पर घेरा जा सकता है। हम दोनों को सुबह छः बजे ही अपने दरवाजे पर देख कर पहले तो किरायेदार हैरान हुआ, फिर किसी तरह संभल कर बोला – अच्छा हुआ, आप आ गये। मैंने अपने लिए दूसरे मकान का इंतजाम कर लिया है, कल बारह बजे मुझे चाबी मिल जायेगी। कल शाम तक आपका मकान आपको खाली मिल जायेगा। इससे आगे उसने संवाद की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी है।&lt;br /&gt;महेश घर में कदम रखते ही परेशान हो गया है। किरायेदार ने घर बहुत ही बुरी हालत में रख छोड़ा है। हम दोनों ही हैरान हो गये हैं कि क्या ये महेश का वही घर है जिसे वह इतनी सफाई से और इतने जतन से साफ–सुथरा रखता था। लग ही नहीं रहा है कि इस घर में कोई दो साल से लगातार रह रहा है। चारों तरफ मकड़ी के जाले लगे हुए हैं। कागजों के ढेर, कचरा और ढेरों फटे पुराने जूते ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ा रहे हैं। रसोई का तो और भी बुरा हाल है। जैसे वहां दो साल से कचरा ही न बुहारा गया हो। एक अजीब–सी बदबू पूरे घर में फैली हुई है। जैसे अरसे से कई चूहे मरे पड़े हों घर में और उन्हें बाहर निकाला ही न गया हो।&lt;br /&gt;उसने एक और बदमाशी की है उसने कि ड्राइंगरूम में ही दीवार पर एक बहुत बड़ा–सा लकड़ी का मंदिर ठोक दिया है। महेश जब यहाँ रहता था तो उसने कभी ड्राइंगरूम में एक कील तक नहीं ठोंकी थी और अब .. .. ... ।&lt;br /&gt;इस समय उससे कुछ कहने का मतलब ही नहीं है। बस एक दिन की ही तो बात है। हम खाली हाथ वापिस लौट आये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और आज सात दिन बीत जाने के बाद भी हम महेश का मकान खाली नहीं करवा पाये हैं। हर बार एक नया बहाना। हर बार थोड़ी और मोहलत के लिए गिड़गिड़ाना और नये सिरे से वायदे करना ही चलता रहा है इस दौरान।&lt;br /&gt;जब हम अगले दिन वहां गये तो पता चला, किरायेदार घर पर नहीं है, रात को देर से आयेगा। घर को देखते हुए ऐसा कोई संकेत नहीं मिल रहा था कि घर खाली करने की कोई तैयारी ही की गयी होगी। जबकि किरायेदार के मुताबिक तो हमें इस वक्‍त खाली घर की चाबी लेने आना था।&lt;br /&gt;हम अगले दिन सुबह–सुबह ही जा धमके हैं वहां। एक बार फिर निराशा हाथ लगी है। पता चला है कि रात को जनाब घर वापिस ही नहीं आये। आउटडोर शूटिंग के सिलसिले में बाहर गये हुए हैं। आज शाम तक आने की उम्मीद है।&lt;br /&gt;दरवाजा एक खूबसूरत और जवान लड़की ने खोला है। उसके पीछे एक और लड़का खड़ा है जिसके बारे में लड़की ने ही बताया है कि वह अंकल का ड्राइवर है। लड़की का परिचय पूछने पर उसने बताया है कि वह गोपालन की भतीजी है और यहाँ कुछ दिनों के लिए एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में आयी हुई है। ये बात हमारे गले से नीचे नहीं उतर रहीं क्योंकि एक तो वह लड़की किसी भी नज़रिये से मलयाली नहीं लग रही और नीचे आने पर हमें वाचमैन ने भी यही बताया कि ये लड़की तो अकसर यहाँ आती रहती है। एक और बात हमें परेशान करने लगी है कि बेशक किरायेदार ने महेश को बताया था कि वह मॉडल कोऑर्डिनेटर है लेकिन वॉचमैन और सोसायटी के दूसरे लोगों ने जो कुछ बताया है उसके अनुसार वहां रात–बेरात जिस तरह की लड़कियों का आना–जाना है, उनमें से ज्यादातर मॉडल तो क्या, सड़क किनारे खड़ी नज़र आने वाली पतुरिया से ज्यादा नहीं लगती। जैसा कोऑर्डिनेटर, वैसी ही मॉडल।&lt;br /&gt;फिलहाल ये हमारा मुद्दा नहीं है कि किरायेदार क्या करता और क्या कराता है। फिलहाल हमारी चिंता महेश का मकान वापिस पा लेने की है जो हमारे सामने होते हुए भी वापिस नहीं मिल रहा।&lt;br /&gt;लड़की ने जब दरवाजा खोला था तो हम सीधे अंदर तक चले आये थे। महेश का खून वैसे ही खौल रहा था। आज उसे आये चार दिन हो गये थे और किरायेदार था कि लुका–छिपी का खेल खेल रहा था। लड़की हमें इस तरह अंदर आते देख कर घबरा गयी लेकिन जब महेश ने उसे बताया कि वह मकान मालिक है और पिछले चार दिन से गोपालन के पीछे चक्कर काट काट कर परेशान हो गया है वो लड़की ने जैसे सरंडर ही कर दिया – आप चाहें तो अभी के अभी मकान खाली करा सकते हैं। मैं अपना सामान ले कर होटल चली जाऊंगी लेकिन क्या ये बेहतर नहीं होगा कि जहां आपने इतने दिन इंतज़ार किया, एक दिन और सही। लड़की ने जिस तरह से पूरी बात की और सहयोग देने का आश्वासन दिया, हम चाह कर भी उसे खड़े–खड़े बाहर नहीं निकाल पाये। वैसे भी किरायेदार की गैर हाजिरी में मकान खाली कराना न केवल गलत था बल्कि इससे अनधिकृत और जबरन प्रवेश का मामला भी बन सकता था। भले ही वह बेईमान था लेकिन था तो किरायेदार ही।&lt;br /&gt;अलबत्ता, हमने इतना जोखिम जरूर लिया कि वॉचमैन की मदद से ड्राइंगरूम में से मंदिर उखड़वा दिया है। मंदिर के पीछे इतने काक्रोच निकले कि वह लड़की तो डर ही गयी। हमारा मूड तो खराब हुआ ही।&lt;br /&gt;हम रात के वक्‍त के फिर वहां गये हैं और इस बार चार–पांच आदमी गये हैं और ये तय करके गये हैं कि कैसे भी आज मकान खाली करा ही लेना है। लेकिन वहां एक और ही सदमा हमारा इंतजार कर रहा है। घर पर केवल ड्राइवर है। वह लड़की वहां से शिफ्ट कर चुकी है। ड्राइवर ने जो कुछ बताया है उसे सुन कर हमें हंसी भी आ रही है और खून भी खौल रहा है। अगर ड्राइवर पर भरोसा किया जाये तो गोपालन शाम की फ्लाइट से केरल में अपने गांव गया है, शादी करने। हमें गुस्सा इस बात पर आ रहा है कि गोपालन एक बार फिर गच्चा दे गया और हँसी इस बात पर आ रही है कि बदमाश के पास रहने के लिए छत नहीं है, जो है उसे खाली कराने के लिए हम कब से उसे तलाशते फिर रहे हैं और जनाब पचपन साल की उम्र में फिर से ब्याह रचाने गांव गये हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत मुश्किल से ड्राइवर गोपालन के गांव का फोन नम्बर तलाश कर पाया है। उसे तो वह भी न मिलता। एक तरह से हमने ही उसके गांव का नम्बर तलाशा। हुआ ये कि वहां हमें पड़े ढेरों कागजों में एसटीडी बूथ से की गयी एसटीडी कॉलों की कई रसीदें मिलीं। उनमें से सबसे ज्यादा बार जिस नम्बर पर फोन किये गये थे, उन रसीदों पर दिये गये एसटीडी कोड के जरिये ही नम्बर का अंदाजा लगा पाये। इसी नम्बर के जरिये हमने उसके गांव के नाम का पता लगाया और फिर ड्राइवर से भी गांव का नाम कन्फर्म किया, संयोग से वहां कुछ पत्र हमें रखे मिल गये जिन पर गांव का नाम लिखा हुआ था। आखिर जायेगा कहां बच्चू। शादी करने गया हो या अपने धंधे के लिए नयी मॉडल तलाशने, आखिर वापिस तो यहीं आयेगा। कब तक बचता बचाता फिरेगा।&lt;br /&gt;संयोग से गोपालन घर पर मिल गया है और महेश ने इस बात की परवाह किये बिना कि गांव में शादी कराने गया हुआ है, फोन पर ही उसकी जो लानत–मलामत की है, गोपालन जिंदगी भर याद रखेगा। लगभग पन्‍द्रह मिनट तक महेश उसे फोन पर ही धोता रहा और जब उसे ये धमकी दी गयी कि आज ही उसका सारा सामान उसकी गैर–मौजूदगी में सड़क पर डाल दिया जायेगा पुलिस केस बनता है तो बने, तो उसने एक बार फिर गिड़गिड़ा कर सिर्फ तीन दिन की मोहलत मांगी है और कहा है कि वह कैसे भी करके आते ही घर खाली कर देगा।&lt;br /&gt;महेश मकान को ले कर बहुत परेशान हो रहा है। वह जानता है कि किरायेदार उसके लंदन में होने का पूरा फायदा उठा रहा है। गोपालन को पता है कि महेश हमेशा के लिए तो छुट्टी ले कर उसके पीछे चक्कर काटने से रहा इसलिए वह लगातार कोशिश करके सामने आने से ही बच रहा है।&lt;br /&gt;हम पुलिस चौकी गये हैं कि इस बारे में क्या वहां से कोई मदद मिल सकती है तो पुलिस ने साफ जवाब दे दिया है कि वे इस तरह के मामलों में कुछ नहीं कर सकते। जब महेश ने उन्हें गोपालन के हस्ताक्षर वाला बिना तारीख का मकान खाली करके देने वाला कागज दिखाया तो पुलिस का यही कहना है कि आप बेशक जोर–जबरदस्ती से मकान खाली करवा लीजिये, वे बीच में नहीं आयेंगे।&lt;br /&gt;महेश ने लंदन जाने से पहले यहीं और इसी इलाके में कम से कम पन्‍द्रह बरस गुजारे हैं और वह यहाँ के कायदे कानूनों से और काम करने के तौर तरीकों से अच्छी तरह से वाकिफ है फिर भी लगातार सबको गालियां दे रहा है कि ये सब लंदन में होता तो ये हो जाता और वो हो जाता। फिलहाल स्थिति यही है कि वह तीन बार अपने वापिस जाने की तारीख आगे खिसका चुका है। वहां उसके काम का हर्जा हो रहा है वो अलग। लेकिन किया भी क्या जाये। इस देश में मकान किराये पर देने वालों की यही नियति होती है। अपना मकान वापिस पाने के लिए क्या–क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच हम लगातार महेश के इस्टेट एजेंट की तलाश करते फिर रहे हैं। कोई बताता है कि वह मीरा रोड की तरफ चला गया है तो कोई बताता है कि अब उसने ये काम ही छोड़ दिया है और चिंचपोकली के पास कम्प्यूटर सेंटर खोल कर वहां नया धंधा कर रहा है। जितने मुंह उतनी ही बातें और सारी की सारी भ्रामक। हम कई जगह भटकते रहे उसकी तलाश में लेकिन वह किसी के भी बताये पते पर नहीं मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर गोपालन वापिस लौट आया है। हम जानते हैं कि ये गलत है कि वह आज ही गांव से शादी करके आया है और अपने साथ नयी ब्याहता दुल्हन ले कर आया है और हम इस तरह से सुबह सुबह ही तकादा करने वालों की तरह जा धमकें। आखिर उसकी शादी हुई है और हम उसे ठीक ठीक तरीके से बधाई देने जायें लेकिन महेश का कहना है कि इस तरह जाने से वह मानसिक रूप से दबाव में आयेगा। यही बात हमारे पक्ष में जायेगी। और हम सचमुच उसे बधाई देने के बजाये उसे घर खाली करने के लिए धमकाने चले आये हैं।&lt;br /&gt;लेकिन मानना पड़ेगा गोपालन को भी। इस बार भी उसके पास एक और रेडिमेड बहाना है कि जिस आदमी के घर उसे शिफ्ट करना है उसका जीजा मर गया है। कम से कम चौथे दिन के संस्कार तक के लिए इसे मोहलत दी जाये। उसके चेहरे पर एक शिकन तक नहीं है कि वह एक हफ्ते से हमें इस तरह लटकाये हुए हैं। महेश चाह कर भी इस बीच अपनी अकेली और विधवा मां से मिलने मुरादाबाद नहीं जा पाया है। इस तरफ से कुछ तय हो तो ही वह कुछ और करने की सोचे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेश का सिर एकदम गर्म हो गया है। वह कुछ सुनने के लिए तैयार नहीं है। बात ठीक भी है। ये आदमी महेश को कब से बेवकूफ बना रहा है और लगातार तनाव में रखे हुए हैं। खुद उसे अपनी जिम्मेदारी का ज़रा सा भी ख्याल नहीं है। अगर किसी ने मेहरबानी करके आपको किराये पर मकान दे दिया तो उसका ये मतलब तो नहीं कि आप उसे मकान खाली कराने के लिए रूला डालें। गोपालन यही कर रहा है पिछले कई दिनों से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेश ने उसे आखिरी चेतावनी दे दी है – मैं आपको कल शाम तक का समय दे रहा हूं और ये आखिरी वार्निंग है। अगर इसके बाद भी आप मकान खाली नहीं करते तो मैं बाहर से ताला लगा दूंगा। मैं ये भी नहीं देखूंगा कि आप घर के अंदर हैं या आपकी बीवी बाथरूम में बंद रह गयी है।&lt;br /&gt;हम ये धमकी दे कर आ तो गये हैं लेकिन नहीं जानते कि कल क्या होनेवाला है।&lt;br /&gt;इस बीच गोपालन ने दो तीन फीलर्स भिजवाये हैं कि किसी तरह से उसे थोड़ा–सा समय और मिल जाये लेकिन महेश ने किसी भी संदेश देने वाले से बात करने से ही मना कर दिया है। हम जानते हैं कि हर बार गोपालन ने मोहलत मांगी है और हर बार वह मुकर गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और गोपालन ने इस बार भी मकान खाली नहीं किया है। सोसायटी के कहने पर महेश ने दरवाजे पर ताला तो नहीं लगाया है लेकिन गोपालन को और कोई मौका न देने का फैसला कर लिया है।&lt;br /&gt;हम बहुत परेशान हो चुके हैं। वह हमारे धैर्य की इतनी परीक्षाएं ले चुका है कि अब तो पानी कब का गले से ऊपर आ चुका है। हम परेशान हाल यूं ही बाज़ार में घूम रहे हैं कि सामने एक इस्टेट एजेंट का बोर्ड नज़र आया है। हम दोनों बिना किसी खास मकसद के भीतर चले गये हैं कि शायद यहाँ से कोई मदद मिल जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- आइये साहब जी। भीतर एसी ऑफिस में बैठा आदमी हमारा स्वागत करता है।&lt;br /&gt;महेश बताता है उसे – नमस्कार जी मेरा नाम महेश है और मैं लंदन से आया हूं।&lt;br /&gt;- कहिये, आपकी क्या सेवा की जाये जी।&lt;br /&gt;– जी बात दरअसल यह है कि मैं एक अजीब सी मुसीबत में फंस गया हूं और आपकी दुकान का बोर्ड देख कर सिर्फ इस उम्मीद में भीतर आ गया हूं कि शायद आप मेरी मदद कर सकें।&lt;br /&gt;– ये तो जी आपकी पूरी बात सुनने के बाद ही पता चल पायेगा साहब जी कि हम आपके किस काम आ सकते हैं। &lt;br /&gt;ये आदमी जिस तरह से बात कर रहा है, अपने धंधे का पूरा घाघ मालूम होता है।&lt;br /&gt;महेश उसे बता रहा है – दरअसल बात ये है कि मेरा एक घर था, मेरा मतलब है कि मेरा एक घर है यारी रोड पर। मैं लगभग दो साल पहले लंदन बसने के इरादे से यहाँ से गया था तो चार बंगला के एक इस्टेट एजेंट की मार्फत अपना फ्लैट किराये पर दे गया था। वही लीव एंड लाइसेंस वाला चक्कर।&lt;br /&gt;– ठीक, तो आगे  . . .&lt;br /&gt;- आगे हुआ ये जी कि जब मैंने ग्यारह महीने बाद फ्लैट खाली कराने के लिए किरायेदार को लंदन से खत भेजने शुरू किये तो उसने एक का भी जवाब नहीं दिया और न ही किराया ही मेरे खाते में जमा ही कराया न एजेंट को ही दिया।&lt;br /&gt;       - ठीक&lt;br /&gt;-  जब मैंने उसे लंदन से फोन किये तो उसने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया कि वह कुछ तकलीफों में हैं और उसे छः महीनों के लिए और रहने की मोहलत दे दी जाये। अब मैं लंदन में बैठ कर मोहलत देने के अलावा कर भी क्या सकता था। जब मैंने उससे पिछले किराये की बात की तो उसने बताया कि वह किराया चंद्रकांत भाई को लगातार देता रहा है, पचास हजार उसने एडवांस के दिये थे।&lt;br /&gt;– ठीक&lt;br /&gt;– वो जी मैंने तब चंद्रकांत भाई को फोन किया तो उसका फोन एक बार भी नहीं मिला। बाद में मेरे दोस्तों ने बताया कि इस पते और फोन नम्बर पर कोई इस्टेट एजेंट नहीं है। तब मैंने लंदन से अपने किरायेदार को कई बार फोन करके बताया कि मैं फलां तारीख को बंबई मकान खाली कराने आ रहा हूं तो हर बार उसने यही कहा कि आपके आने से दो दिन पहले मैं मकान खाली कर दूंगा और आपके आते ही आपको चाबी थमा दूंगा।&lt;br /&gt;– फिर &lt;br /&gt;– फिर जी, आज मुझे बंबई आये हुए आठ दिन हो गये हैं। वह मकान खाली करने को तैयार ही नहीं है। मैंने कई जगह पूछ के देख लिया कि शायद कहीं से बदमाश चंद्रकांत भाई का पता चल जाये लेकिन वह कहीं नहीं मिल रहा है।&lt;br /&gt;– ठीक&lt;br /&gt;– अब मुसीबत ये है कि मैं तीन बार अपनी टिकट कैंसिल करवा चुका हूं, उधर लंदन में मेरे काम का हर्जा हो रहा है और ये कम्बख्त किरायेदार मकान खाली करने को तैयार ही नहीं है।&lt;br /&gt;– क्या कहता है।&lt;br /&gt;– पहले तो वह मेरे आने वाले दिन बड़े प्यार से मिला और कहने लगा, परसों सुबह आप चाबी लेने आ जायें। घर आपको खाली मिलेगा। जब मैं दो दिन बाद पहुंचा तो दो दिन वो घर ही नहीं आया। फिर पता चला जनाब केरल निकल गये हैं अपने होम टाउन शादी करने।&lt;br /&gt;– आपको कैसे पता चला?&lt;br /&gt;– उस घर में, मेरा मतलब है मेरे घर में एक जवान लड़की और उस किरायेदार का ड्राइवर रह रहे थे। लड़की ने बताया कि आप बेशक घर खाली करा ले लेकिन अंकल दो दिन बाद वापिस आ रहे हैं सिर्फ दो दिन रुक जायें। मैं रुक गया तो ड्राइवर से पता चला कि वो तो शादी करने गया है। किसी तरह से हमने उससे केरल का नम्बर लेकर फोन किया और उसे याद दिलाया कि उसे इस तरह से बिना घर खाली किये नहीं जाना चाहिये था। उसने फिर वायदा किया कि वह तीसरे दिन कैसे भी करके वापिस आ कर घर खाली कर देगा।&lt;br /&gt;– फिर&lt;br /&gt;– अब वह वापिस आ गया है शादी करके और अब तक उसने रहने का कोई इंतजाम नहीं किया है।&lt;br /&gt;– करता क्या है&lt;br /&gt;– उस पर विश्वास किया जाये तो वह अपने आपको मॉडल कोऑर्डिनेटर बताता है।&lt;br /&gt;– और आपको क्या लगता है कि वह क्या है&lt;br /&gt;– मुझे तो जी वह लड़कियों का दलाल ही लगता है। बिल्डिंग वाले भी बताते हैं कि उस घर में रात–बेरात तरह तरह की लड़कियों का आना जाना था।&lt;br /&gt;– उम्र कितनी होगी उसकी&lt;br /&gt;– यही कोई पचपन के आस पास&lt;br /&gt;– और आप बता रहे हैं कि वह कल ही शादी करके आया है।&lt;br /&gt;– मुझे तो जी उसकी शादी भी ड्रामा ही लग रही है।&lt;br /&gt;– बिल्डिंग की सोसायटी, मेरा मतलब सेक्रेटरी वगैरह को आपने विश्वास में लिया था क्या।&lt;br /&gt;– वैसे तो सेक्रेटरी भला आदमी है और मेरी तरफ से पूरी कोशिश भी कर रहा है कि मेरा मकान मुझे वापिस मिल जाये लेकिन दिक्कत यही है कि जो भी उसे दो पैग पिला दे और फिश फ्राइ खिला दे, वह उसी की तरफ हो जाता है।&lt;br /&gt;– और कोई बात&lt;br /&gt;– देखिये मैं अपने मकान को लेकर पिछले कई दिनों से इतना परेशान हूं कि क्या बताऊं। कुछ समझ में नहीं आ रहा कि यहाँ कब तक मैं कैंप डाले पड़ा रहूंगा और उस बदतमीज किरायेदार की लंतरानियां सुनता रहूंगा। उस कम्बख्त ने छः महीने से न बिजली का बिल जमा कराया है और न ही टेलिफोन बिल ही। और तो और उस साले ने, गाली देने को जी चाहता है, साल भर से मेरी डाक तक दबा कर रखी हुई थी। आज सुबह उसने मुझे कोई सौ चिट्ठियों का बंडल पकड़ा दिया कि ये डाक है आपकी। दिल तो किया मेरा कि उसका वहीं खड़े खड़े गला घोंट दूं।&lt;br /&gt;- देखिये महेशजी, तनाव में आने से तो बात और बिगड़ेगी। मैंने आपकी पूरी बात सुनी है। मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है। जहां तक मैं समझ पाया हूं आप हमारे पास दो उम्मीदें ले कर आये हैं। पहली कि किसी भी तरह से आपका मकान खाली कराने में आपकी मदद करूं और हो सके तो आपके उस एजेंट को ढूंढ़ने में आपकी मदद करूं।&lt;br /&gt;– सही फर्माया आपने। मैं हर तरफ से निराश हो कर आपके पास आया हूं। पुलिस  . . . &lt;br /&gt;– देखिये ऐसे मामलों में पुलिस कोई मदद नहीं कर पाती, पुलिस ने यही कहा होगा न कि आप मकान किराये पर देते समय अगर उन्हें भी फार्मली खबर कर देते तो वे शायद कुछ मदद कर भी पाते।&lt;br /&gt;– जी हां, यही कहा था।&lt;br /&gt;– और यह भी कहा होगा कि आप अपने आप किरायेदार से कैसे भी निपटें, वे बीच में दखल नहीं देंगे।&lt;br /&gt;– जी हां मुझे नहीं पता था कि यहां की पुलिस इतनी गैर जिम्मेदार है और इतनी बेरुखी से पेश आती है।&lt;br /&gt;– अब क्या किया जाये। फिलहाल हम देखें कि आपकी कैसे मदद की जाये।&lt;br /&gt;– जी&lt;br /&gt;– देखिये, जहां तक चंद्रकांत की बात है, हमें भी पता चला है कि वह कई लोगों को धोखा दे कर भागा हुआ है। हमारा भी एकाध पार्टी का लेनदेन अटका हुआ है उसके साथ। खैर, फिलहाल आपके मकान खाली कराने की बात है तो उसका एक ही तरीका बचता है जो कई बार हमें भी अपनाना पड़ता है और वो है मसल पावर।&lt;br /&gt;– जी मैं समझा नहीं।&lt;br /&gt;– देखिये ये इस शहर की खासियत है कि यहां आपको एक से बढ़ कर एक टेढ़ा आदमी मिलेगा और दूसरी तरफ आपके जैसे शरीफ आदमी भी हैं जो अपना खुद का मकान वापिस पाने के लिए भटक रहे हैं। तो ऐसे में हमारी जो ये नेचर है ना, कुदरत, सही बेलेंस करती है, टेढ़े आदमियों को सीधा करने के लिए यहां कुछ मसल मैन भी हैं। वे लोग पैसे तो लेते हैं लेकिन सिर्फ टेढ़ी उंगली से ही घी निकालना जानते हैं। निकाल कर दिखा भी देते हैं। तो जनाब अगर आप चाहते हैं कि किसी ऐसी एजेंसी की सेवाएं ली जायें तो आगे बात की जाये।&lt;br /&gt;– आप क्या सजेस्ट करते हैं सर?&lt;br /&gt;– देखिये महेशजी, वह आदमी आपके लंदन में होने का पूरा फायदा उठायेगा। उसे पता है, आप शरीफ आदमी है। यहां हमेशा के लिए नहीं ठहर सकते। न उसका सामान बाहर फिकवायेंगे। ज्यादा से ज्यादा ग्यारह महीने का लीव और लाइसेंस दोबारा करवा लेंगे, लेकिन वह आपको मकान तो तुरंत खाली करके देने के मूड में नहीं लगता। और फिर आप बता रहे हैं कि उसका धंधा भी कुछ इस तरह का है।&lt;br /&gt;– ये देखिये, मैंने उसे फ्लैट देते समय ही लिखवा लिया था कि वह मुझे फ्लैट का खाली पोजेशन दे रहा है।&lt;br /&gt;– लेकिन सर, आप कागज के बलबूते पर भी फ्लैट कहां खाली करवा पाये। वह जब तक हो सके टालेगा। एक एक दिन, एक एक घंटा। ताकि एक बार फिर आपके लौट जाने का टाइम आ जाये।&lt;br /&gt;– तो इसका मतलब  . . &lt;br /&gt;– घबराइये नहीं, हम आपकी मदद करेंगे। फीस लगेगी 25,000 रुपये और 24 घंटे में मकान खाली कराने की गारंटी।&lt;br /&gt;– रेट कुछ ज्यादा लग रहे हैं।&lt;br /&gt;– आप जितनी टेंशन में हैं और अपना ब्लड प्रेशर बढ़ा रहे हैं, उसके मुकाबले कम। और फिर दस बारह आदमियों की टीम होती है, कहीं कुछ मारपीट हो जाये तो उस सबका इंतजाम करके चलता पड़ता है। इस बात का भी ख्याल रखना पड़ता है कि पुलिस केस न बने। तो समझें फाइनल?&lt;br /&gt;– आप तो मुझे इस्टेट एजेंट कम और साइक्रियाटिस्ट ज्यादा नज़र आ रहे हैं। अब जा कर इतने दिनों के बाद महेश के चेहरे पर हंसी आयी है। मुझे भी लगने लगा है कि ये आदमी काम करवा सकता है।&lt;br /&gt;– आपकी जानकारी के लिए मैं रूड़की युनिवर्सिटी का बी ई हूं और मैं इस लाइन में आने से पहले इंजीनियरिंग पढ़ाता रहा हूं।&lt;br /&gt;– तो इस लाइन में कैसे आ गये&lt;br /&gt;– आप जैसे लोगों की सेवा करने के लिए। तो जनाब हम फाइनल समझें?&lt;br /&gt;– ठीक है। तो यही सही। जहां मकान ने सवा लाख का घाटा दिया है वहां डेढ़ लाख का सही।&lt;br /&gt;– तो कब? कितने बजे?&lt;br /&gt;– तीन बजे ठीक रहेगा।&lt;br /&gt;– ठीक है तीन बजे आपके पास राजू अपनी टीम ले कर पहुंच जायेगा। अपना पता और फोन नम्बर दे दीजिये। वैसे उसकी दुल्हन कहां है?&lt;br /&gt;– क्यों, वहीं पर ही है।&lt;br /&gt;– तो आप एक और काम कीजिये, अपने किसी दोस्त की बीबी को भी बुलवा लीजिये, पूरे परिवार से घर खाली कराने के मामले में जरा संभल कर रहना पड़ता है। जस्ट फार सेफर साइड।&lt;br /&gt;– हो जायेगा।&lt;br /&gt;– पेमेंट अभी कर रहे हैं या राजू के हाथ भिजवा देंगे।&lt;br /&gt;– पेमेंट की चिंता न करें। आप तक पहुंच जायेगी। तो मैं चलता हूं। - - ओके।&lt;br /&gt;– ओके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और हम बाहर आ गये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेश पूछ रहा है मुझसे – क्या ख्याल है ये आदमी काम करवा देगा।&lt;br /&gt;– यार लग तो मुझे भी रहा है कि इस आदमी की बात में दम है और ये काम करवा भी देगा।&lt;br /&gt;– चलो एक कोशिश और सही।&lt;br /&gt;और हम लौट आये हैं महेश के मकान के नीचे। हमने पास ही रहने वाले एक दोस्त और उसकी बीवी को भी बुलवा लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय बिल्डिंग के नीचे महेश, दो–तीन लड़के, हमारे दो तीन दोस्त, एक की बीवी वगैरह खड़े हैं। बिल्डिंग का बूढ़ा सा सेक्रेटरी और कुछ तमाशबीन भी आ जुटे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेश सेक्रेटरी से पूछ रहा है – अब क्या कहता है पुरी साहब वो सेक्रेटरी – देखिये महेशजी, मैं अभी अभी उससे बात करके आया हूं और वह अब कल सुबह तक की मोहलत मांग रहा है। अभी भी दोस्त के रिश्तेदार के मरने वाला किस्सा दोहरा रहा है कि इसीलिए चाबी नहीं ला पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीच में किसी ने टांग अड़ायी है – मतलब ही नहीं है जी मोहलत देने की। साले ने बिल्डिंग में कब से गंद मचा रखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दूसरे को भी हिम्मत आ गयी है। सबको लग रहा है आज जो ड्रामा यहां होगा, उसे देखे बिना कैसे चलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब दूसरा बोल रहा है – मैंने भी उसे एक मकान दिखाया था, सिर्फ आठ हजार भाड़े पर और डिपाजिट भी सिर्फ बीस हजार। ये बंदा उसके लिए भी राजी नहीं।&lt;br /&gt;– अरे जब मुफ्त में हनीमून मनाने के लिए इतना बड़ा फ्लैट मिला हुआ है तो वह क्यों जायेगा कहीं और।&lt;br /&gt;– साले ने बिल्डिंग में रंडीखाना खोल रखा है। पता नहीं ये भी बीवी है या नहीं, बेचने के लिए लाया होगा। देखा नहीं कितनी छोटी है इससे और डरी हुई भी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बातें हो ही रही हैं कि तभी मोटरसाइकिल पर छः फुट तीन इंच का जवान आया है। पूछ रहा है&lt;br /&gt;– यहां आप में से महेशजी कौन हैं?&lt;br /&gt;महेश आगे बढ़ कर बता रहा है&lt;br /&gt;– मैं ही हूं जी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह गर्मजोशी से हाथ मिलाता है&lt;br /&gt;– मेरा नाम राजू है। कहां है वो आपका किरायेदार?&lt;br /&gt;– लेकिन आपकी टीम राजू &lt;br /&gt;– कौन सी टीम, अरे हम वन मैन आर्मी हैं। हमारे साथ सिर्फ मां भवानी चलती है। दिखाइये कहां है वो चूहा, बस मुझे सिर्फ दो–तीन आदमी दे दीजिये सामान बाहर निकालने के लिए और मुझे बिलकुल भी भीड़ नहीं चाहिये। ओके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सब लोग हैरानी से इस देवदूत सरीखे आदमी को देख रहे हैं और उसे लिए रास्ता छोड़ दिया है। हम भी हैरान है कि ये कैसा आदमी है जो अकेले के बलबूते पर घर खाली कराने चला है। आज तो न देखा न सुना। अगर घर खाली कराना इसके लिए इतना आसान है तो शहर में इसकी कितनी मांग रहती होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह हमारे साथ सीधे ही ऊपर चला आया है और उसी ने फ्लैट की घंटी बजायी है। दरवाजा गोपालन ने ही खोला है। इससे पहले कि वह कुछ कह सके, राजू ने दरवाजा पूरा खोल दिया है और सोफा बाहर की तरफ खिसकाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोपालन को इसकी उम्मीद नहीं है कि ऐसा भी हो सकता है&lt;br /&gt;– ये क्या करता है आप साब, आप कौन है, हम महेशजी से बात करेंगे। - महेशजी इसे रोको। मैं आपसे बोला ना हमको कल सुब्बू तक का टाइम मांगता है। हम कल सुबे ही मकान खाली कर देंगी।&lt;br /&gt;– वो तो आप पिछले चार महीने से बोल रहे हैं गोपालन जी, मैं थक गया हूं आपके वायदे सुनते सुनते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोपालन गुस्से में राजू को रोकने की कोशिश कर रहा है – आप इस तरह से मेरे घर में घुस के मेरे सामान को हाथ नहीं लगा सकता। मैं तुमको बोला ना ये शरीफ आदमी का घर है। हमारा वाइफ क्या सोचेंगा, उसको अभी यहां आया एक दिन भी नहीं हुआ है और आप  . . . &lt;br /&gt;हम सब तमाशबीन बने देख रहे हैं।&lt;br /&gt;राजू ने उसे परे हटा दिया है – ओये हट पीछे  . . . बड़ा आया शरीफ का चाचा। क्या कर लेगा तू ओये ओये। राजू एकदम गोपालन के सीने पर सवार होने लगा है और उसने अपनी कमीज की बाहें ऊपर कर ली हैं – बोल। तब तेरी शराफत कहां गयी थी जब मकान दबा कर बैठ गया है।&lt;br /&gt;गोपालन अब वाकई घबरा गया है और महेश की तरफ मुड़ा है – महेशजी, महेशजी इस आदमी को हटाओ, ये मुझे मार डालेंगा। ये गुंडा मवाली . . .  &lt;br /&gt;ये सुनते ही राजू ने उसका गला पकड़ लिया है – ओये, मवाली किसे बोला ओये, किसे बोला तू मवाली, मां भवानी की कसम। मैं तेरा खून पी जाऊंगा।&lt;br /&gt;अब गोपालन को भी गुस्सा आ रहा है – तुम .  . . तुम मेरे घर में घुस कर मुझे नहीं मार सकता। मैं मर जायेंगा तो तुमको पुलिस पकड़ कर ले जायेंगी। मैं मैं  . . .&lt;br /&gt;अब सेक्रेटरी वगैरह राजू को पकड़ कर पीछे कर रहे हैं कि कहीं वाकई कुछ हो न जाये लेकिन राजू पर जैसे खून सवार है। वह बार बार आगे आ रहा है।&lt;br /&gt;दोनों में अभी भी गाली गलौज हो रहा है – देख लूंगा। देख लूंगा कर रहे हैं दोनों।&lt;br /&gt;गोपालन ने आखरी कोशिश की है – महेशजी, यू गिव मी सम टाइम टू थिंक। जस्ट टेन मिनट्स। ऐ जैंटलमन रिक्वेस्ट। प्लीज। रिक्वेस्ट।&lt;br /&gt;महेश – ठीक है। आपको हम दस मिनट दे रहे हैं। उसके बाद आपको कोई भी नहीं बचा पायेगा।&lt;br /&gt;गोपालन मान गया है। शायद अपना आखरी दांव चलना चाहता होगा। हम सब वहीं ड्राइंगरूम में ही घेरा डाल कर बैठ गये हैं। पता नहीं कौन सबके लिए कोल्ड ड्रिंक ले कर आ गया है। वैसे इसकी जरूरत भी थी। सभी का तो खून खौल रहा है।&lt;br /&gt;गोपालन कह रहा है – ओ के। प्लीज। प्लीज  . . . &lt;br /&gt;तभी हमारी निगाह सामने बेडरूम के दरवाजे के पीछे से सहमी हुई सी उसकी बीवी पर पड़ती है। उसके चेहरे पर भयातुर हिरणी जैसे भाव हैं। उसने अपने सीने से एक छोटा सा कुत्ता दबा रखा है। औरत बेहद डरी हुई है। वह जिस तरह से सारा नज़ारा देख रही है उससे मैं अचानक सकपका गया हूं। मैंने अपनी पूरी जिंदगी में किसी औरत की आंखों में इतना डर नहीं देखा होगा। उफ् . . . मैं उसकी तरफ देखने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता।&lt;br /&gt;मैं अपने हाथ की कोल्ड ड्रिंक की बोतल वहीं एक कोने में रख कर बाहर आ गया हूं। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था आंखों में इतने डर की।&lt;br /&gt;हमारे साथ आयी कपूर की बीवी ने भी शायद उसकी आंखों में तैर रहे डर को पढ़ लिया है। उसने गोपालन की बीवी के पास जा कर उसके कंधे पर हाथ रखा है&lt;br /&gt;– डोंट वरी। घबराओ नहीं, कुछ नहीं होगा। वह उसका कंधा थपथपा रही है। मुझे राहत मिली है कि मैं अकेला नहीं हूं जिस तरह उन डरी हुई आंखों का संदेश पहुंचा है।&lt;br /&gt;इस बीच गोपालन ने तीन चार जगह फोन किये हैं। कहीं मलयालम में तो कहीं टूटी फूटी हिन्दी अंग्रेजी और मलयालम में। बता रहा है कि उसे अभी घर खाली करना है। वह सब जगह से आखरी मदद मांग रहा है लेकिन उसके चेहरे से लगता नहीं कि कहीं से भी उसे सही जवाब मिला होगा। उसने फोन रख दिया है और सिर झुकाकर बैठ गया है और अपने बालों को पकड़ कर खींच रहा है। सब लोग इंतजार कर रहे हैं कि अब क्या होगा।&lt;br /&gt;महेश ने उसके पास जा कर बहुत ही ठंडे और ठहरे हुए लहजे में कहा है – अब आपके दस मिनट पूरे हो गये हैं मिस्टर गोपालन।&lt;br /&gt;गोपालन कह रहा है – प्लीज, ट्राइ टू अंडरस्टैंड।&lt;br /&gt;– मिस्टर गोपालन आपके पास और कोई बात हो तो बताओ। आपका टाइम पूरा हो चुका है।&lt;br /&gt;गोपालन – मुझे कल सुबह तक का टाइम चाहिये। मैं जिदर सामान  . .. &lt;br /&gt;– दैट इज नॉट माइ प्राब्लम। ओके&lt;br /&gt;– आप सुनेगा नहीं तो हम बात कैसे करेंगे। जस्ट वन डे।&lt;br /&gt;राजू बीच में टपक पड़ा है – नहीं मिलेगा। और कुछ?&lt;br /&gt;गोपालन – देखिये मिस्टर मैं महेशजी से बात कर रहा हूं। मुझे बात करने दें आप। महेशजी आप आप इसे बोलो, हम हार्ट पेशेंट हैं। हमको कुछ हो गया तो हमारा  . . . &lt;br /&gt;राजू अब गुस्से में आ गया है – मैं तेरे किसी नाटक में आने वाला नहीं । हटो जी, उतारो सामान। बहुत हो गया साले का ड्रामा।&lt;br /&gt;गोपालन अब रुआंसा हो गया है – हम ड्रामा करता है? हैं हैं हम ड्रामा करता है। आप क्या बोल रहा है कि हम ड्रामा करता है।&lt;br /&gt;राजू ने उसकी नकल उतारी है – हां ड्रामा करता है। और इतना कहते ही उसने सामान उठा कर दरवाजे के बाहर ले जाना शुरू कर दिया है।&lt;br /&gt;हम सब तमाशबीनों की तरह खड़े देख रहे हैं। अब कोई भी बीच में नहीं आ रहा। सबको पता है, बीच बचाव कराने की घड़ी जा चुकी। इस बीच काफी चीजें बाहर ले जायी जा चुकी हैं। अब सबने मिल कर सामान निकालने में मदद करनी शुरू कर दी है। मैं अभी भी गोपालन की बीवी की सहमी सहमी आंखों पर के बारे में सोच रहा हूं। मुझे लग रहा है उस बेचारी के साथ गलत हो रहा है। उसे तो बंबई आये चौबीस घंटे भी नहीं हुए। शादी भी दो तीन दिन पहले ही हुई होगी। पता नहीं क्या–क्या सपने ले कर आयी होगी और क्या–क्या सब्ज बाज दिखाये गये होंगे उसे। लेकिन सच्चाई तो वही है जो वह अपनी डरी डरी आंखों से देख रही है।&lt;br /&gt;वह अब रसोई के दरवाजे पर आ गयी है। मैं कनखियों से देखता हूं, उसकी आंखों से धारोधार आंसू बह रहे हैं&lt;br /&gt;गोपालन कह रहा है – वन मोर चांस प्लीज। जस्ट वन फोन प्लीज।&lt;br /&gt;महेश ने इजाजत दे दी है – ओके एक और फोन कर ले।&lt;br /&gt;गोपालन एक और फोन कर रहा है। वह फोन पर गिड़गिड़ा रहा है। इस बीच राजू ओर दूसरे लड़कों ने रसोई में जा कर सामान समेटना शुरू कर दिया है।&lt;br /&gt;गोपालन ने फोन नीचे रख दिया है और फिर सिर पकड़ कर बैठ गया है। वह अब अपने आप से बोल रहा है। वह अपने आप से बातें कर रहा है – माय बैड लक। क्या क्या ड्रीम्स ले कर आया था। वाइफ को बोला तुम्हें अक्खा मुंबई घुमायेगा। एन्जाय करायेगा। अभी जर्नी का थकान भी नहीं उतरा और ये लोक मेरा सारा सामान सड़क पर डाल दिया है। इन्सानियत मर गया है। इन्सान का अब कोई भरोसा नहीं रहा। मैं कितना रिक्वस्ट किया लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है। ये शहर डैड लोगों का शहर है। आदमी मर जायेंगा तो भी कोई पूछने के वास्ते नहीं आयेंगा। हम अपनी लाइफ का क्रीम इस शहर को दिया। आज हमारा ये हालत है कि हमारा सारा सामान सड़क पर है। हमारा वाइफ क्या सोचता होयेंगा कि हमारा अक्‍खा इस शहर में एक भी फ्रेंड नहीं है। लोक हमारा कितना रिस्पेक्ट करता था। हम किस किस का मदत नहीं किया। आज जब हमको मदत का जरूरत है वो कोई नहीं हैं। कोई नहीं, ओह गॉड आइ एम अलोन। हेल्प मी गॉड। माइ लाइफ माई ड्रीम्स . . . माई कैरियर गॉन। माइ गॉड। उसने अचानक रोना शुरू कर दिया है। तय है उसका कोई इंतजाम नहीं हो पाया है।&lt;br /&gt;मैं एक किनारे खड़ा देख रहा हूं कि इस बीच सारा सामान नीचे उतार दिया गया है। गोपालन अपनी वाइफ का हाथ पकड़ कर नीचे आ रहा है और धीरे धीरे चलते हुए सामान के ढेर पर बैठ गया है। उसकी वाइफ अभी भी बहुत डरी हुई है और सहमी हुई निगाह से चारों तरफ देख रही है।&lt;br /&gt;मैं अपने आप से पूछता हूं – ये सब क्या हो रहा है। हमने ये सब तो नहीं चाहा था। मैं सोच भी नहीं पा रहा कि इस सब में मेरी क्या भूमिका है। मैं नीचे आ गया हूं और मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा। गोपालन की बीवी की आंखों में पसरे डर ने पता नहीं मुझ पर क्या असर कर दिया है। बाकी सब लोग अभी भी ऊपर ही हैं।&lt;br /&gt;धीरे धीरे अंधेरा घिर रहा है। गोपालन सड़क पर रखे अपने सामान पर बैठा हुआ है। अचानक उसने अपना सीना दबाना शुरू कर दिया है। उसे शायद सीने में दर्द महसूस हो रहा है। उसने अपने ड्राइवर को इशारा किया है। वह दौड़ कर पास की दुकान से उसके लिए सोडा ले कर आया है। वह सीना दबाये सोडा पी रहा है। उसकी बीवी और ज्यादा डर गयी है। उसने कुत्ते को नीचे उतार दिया है और पति के पास आ कर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ी हो गयी है।&lt;br /&gt;मेरी निगाह ऊपर की तरफ जाती है। वहां बालकनी में खड़े राजू, महेश और उनके दोस्त खुशियां मनाते हुए बीयर पी रहे हैं।&lt;br /&gt;मैं समझ नहीं पा रहा कि मुझे महेश का मकान खाली होने के लिए खुश होना चाहिये या गोपालन और उसकी नयी ब्याहता बीवी के इस तरह सड़क पर आ जाने के कारण उसके कंधे पर हाथ रख कर उससे सहानुभूति के दो बोल बोलने चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी बीवी अभी भी डरी सहमी खड़ी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-274944790077652907?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/274944790077652907/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=274944790077652907&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/274944790077652907'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/274944790077652907'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/08/blog-post_21.html' title='इक्‍कीसवीं कहानी - घर बेघर'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-5626970240791730612</id><published>2008-08-11T11:48:00.001+05:30</published><updated>2008-08-11T11:50:58.284+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>बीसवीं कहानी - करोड़पति</title><content type='html'>इस समय भी वह लिफ्ट के पास खड़ा इशारे से किसी न किसी को अपनी तरफ बुला रहा होगा या फिर कैंटीन में बैठा अपनी ताजा रचना जोर - जोर से पढ़ रहा होगा। जिसने भी उससे आंख मिलायी, उसी की तरफ उंगली से इशारा करके अपनी तरफ बुलायेगा और भर्राई हुई आवाज़ में कहेगा, '' मैं आपको एक शब्द दूंगा। आप उसका मतलब किताबों में ढूंढना। किसी पढ़े लिखे आदमी से पूछना। मैं आपसे सच कहता हूं, उस शब्द से यह ऑफिस, यह शहर, यह दुनिया सब बदल जायेंगे, बेहतर हो जायेंगे। आप मुझे मिलना। अगर आपके पास वक्त न हो।'' यहां आते - आते उसकी सांस बुरी तरह फूल चुकी होगी और वह हांफने लगेगा। वहीं बैठ जायेगा। सांस ठीक होते ही फिर से उसका यह रिकॉर्ड चालू हो जायेगा। सामने कोई हो, न हो। तब तक बोलता रहेगा जब तक दरबान उसे खदेड क़र बाहर न कर दे, या भीतर न धकेल दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह करोडपति है। असली नाम पुरुषोत्तम लाल। चपरासी है। आज कल सनक गया है। कभी खूब पैसे वाल हुआ करता था। खेती - बाड़ी थी। दो - तीन घर थे। शहर के कई चौराहों पर पान के खोखे थे। आजकल खाने तक को मोहताज है। अपने अच्छे दिनों में उसने सबकी मदद की। बेरोजगार रिश्तेदारों को काम धन्धे से लगाया। इसी चक्कर में सब कुछ लुटता चला गया। कुछ रिश्तेदारों ने लूटा और कुछ ऑफिस के साथियों ने निचोड़ा। अपने पैसों को वसूलने के लिये करोड़पति सबके आगे गिड़ग़िडाता फिरा। नतीजा यह हुआ कि वह सनक गया। बहकी - बहकी बातें करने लगा। जब पी लेता है तो और भी बुरी हालत हो जाती है। कभी गाने लगता है तो कभी जोर - जोर से बोलने लगता है।&lt;br /&gt;भगवान जाने कितना सच है या न जाने लोगों की उडाई हुई है। एक दिन इसी सनक के चलते एक दिन ऑफिस के बाद घर जाते समय एक थैले में ढेर सारी चीजें, पेपरवेट, पंचिंग मशीन, कागज़, पैन - पैन्सिल जो भी मेजों पर पड़ा नजर आया, थैले में ठूंस लिया। शायद दिन में किसी से कहा - सुनी हो गयी होगी। उसी को जोर - जोर से कोसता हुआ बाहर निकला तो दरबान ने यूं ही पूछ लिया - थैले में क्या ले जा रहे हो करोड़पति? तो उसी से उलझ गया। ऊंच - नीच बोलने लगा। दरबान ने उसे वहीं रोक लिया और रिपोर्ट कर दी। करोड़पति सामान चोरी करके ले जा रहा है।&lt;br /&gt;करोड़पति पकडा गया। सुरक्षा अधिकारी ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि उसके खिलाफ मामला न बने, बेचारा पहले ही दुनिया भर का सताया हुआ है। लेकिन पता चला कि करोड़पति अव्वल तो पिये हुए है और दूसरे, ढंग से बात करने को तैयार नहीं है। कभी कहे कि ये सामान फलां साहब ने अपने घर पर मंगवाया है, तो कभी कहे कि - वह ऑफिस की नौकरी छोड़ रहा है। अब इसी सामान की दुकान खोलेगा। उसने अपने आप को यह कह कर और भी फंसा लिया कि - यह तो कुछ भी नहीं है, वह तो अरसे से थैले भर - भर कर सामान ले जाता रहा है।&lt;br /&gt;उसके खिलाफ मामला बना और उसे सस्पैण्ड कर दिया गया। तबसे और सनक गया है।&lt;br /&gt;मैले कुचैले कपडे, एकदम लाल आंखें, नंगे पैर, हाथ में पांच सात कागज़, दाढ़ी बढ़ी हुई। तब से रोज सुबह लिफ्ट के पास खड़ा सबको पुकारता रहता है। कोई उसके सामने नहीं पड़ना चाहता। वे तो बिलकुल भी नहीं जिन्होंने उसकी सारी पूंजी लूट कर उसकी यह हालत बना दी है।&lt;br /&gt;उसकी सबसे बड़ी तकलीफ यह है कि वह घर और बाहर दोनों ही जगह से फालतू हो गया है। घरवालों की बला से वह कल मरता है तो आज मरे। कम से कम उसकी जगह परिवार में किसी को तो नौकरी मिलेगी। उनके लिये तो वह अब बोझ ही है। ऑफिस में उसकी परवाह किसे है? वहां वह अकेला पागल ही तो नहीं। एक से एक पागल भरे पड़े हैं। कुछ हैं और कुछ बने हुए हैं। जो नहीं भी हैं वो सबको पागल बनाये हुए हैं।&lt;br /&gt;कोई भी करोड़पति से बात नहीं करना चाहता। उसे देखते ही सब दायें - बायें होने लगते हैं। दुर - दुर करते हैं। कौन इस पागल के मुंह लगे। अगर कोई धैर्यपूर्वक उसकी बात सुने, उससे सहानुभूति जताये तो शायद उसके सीने का बोझ कुछ तो उतरे। लेकिन किसे फुर्सत? &lt;br /&gt;जब उसकी इन्‍क्वायरी के लिये तारीख तय हुई तो यूनियन से उसका डिफेन्स तय करने के लिये कहा गया। यूनियन को भला ऐसे कंगले में क्या दिलचस्पी हो सकती थी। उन्होंने भी टालमटोल करना शुरु कर दिया। जब करोड़पति को उनके रुख का पता चला तो वह वहां भी गाली - गलौज कर आया - मुझे आपकी मदद की कोई जरूरत नहीं। मैं अपना केस खुद लड़ लूंगा। गुस्से में आकर उसने यूनियन से ही इस्तीफा दे दिया - चूंकि पुरषोत्तम लाल यूनियन का मेम्बर नहीं है, अत: यूनियन की तरफ से डिफेन्स उपलब्ध कराना संभव नहीं है।&lt;br /&gt;मजबूरन ऑफिस ने ही उसके लिये डिफेन्स जुटाया और केस आगे बढ़ाना शुरु किया। लेकिन करोड़पति अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने को तैयार हो तो कोई क्या करे! कभी इनक्वायरी में नहीं आयेगा। आयेगा भी तो बात करने लायक हालत में नहीं रहेगा। अगर सारी स्थितियां उसके पक्ष में हों, वह आये, बात करने लायक हो, तो भी वह वहां कुछ ऐसा उलटा सीधा बोल आयेगा कि बात आगे बढ़ने के बजाय पीछे चली जाये - मैं एक - एक को देख लूंगा। सब मेरे दुश्मन हैं। मेरी बात ध्यान से नोट कर लो। मैं बाद में फिर आऊंगा। इस तरह की ऊटपटांग बातें करके लौट आयेगा।&lt;br /&gt;इसी तरह ही चल रहा है करोड़पति। पता नहीं, खाना कहां से खाता है, पीना कहां से जुटाता है। इन दिनों उसे आधी पगार मिलती है जो पगार वाले दिन उसकी बीवी ले जाती है। कम से कम बच्चे तो भूखे न मरें। इस पागल का क्या!&lt;br /&gt;संस्थान ने उसकी हालत पर तरस खा कर फिर से बहाल कर दिया है, अलबत्ता उसकी चार वेतन वृध्दियां कम कर दी हैं। उसे नौकरी में वापिस लिये जाने की एक वजह यह भी रही कि उसका ढंग से इलाज हो सके और एक परिवार बेवक्त उजड़ने से बच जाये। लेकिन हुआ इसका उलटा ही है। करोड़पति की हालत पहले से भी ज्यादा खराब हो गयी है। काम करने लायक तो वह पहले कभी नहीं था, इधर उसने दो तीन नये रोग पाल लिये हैं। आजकल वह बात - बात पर इस्तीफा दे देता है। कभी उसे गाने का शौक रहा होगा, कुछेक फिल्मी गीत याद भी रहे होंगे। उन्हीं में से कुछ शब्द आगे पीछे करके ले आता है। टाइपिस्ट सीट पर बैठे भी नहीं होते हैं कि सिर पर आ धमकता है - '' इसे टाइप कर दो। अभी किशोर कुमार इसे गाने वाले हैं। वे स्टूडियो में इसकी राह देख रहे हैं। वे नहीं गायेंगे तो मैं खुद गाऊंगा।'' और वह वहीं शुरु हो जाता है। भर्राये हुए गले से करोड़पति गा रहा होता है और सब खी - खी हंस रहे होते हैं। पिछले हफ्ते उसे सस्‍पैन्शन की अवधि की बकाया रकम मिली है। उसी पैसे से पी जा रही दारू का नतीजा है यह।&lt;br /&gt;अगर टाइपिस्ट यह तुकबन्दी टाइप करने से मना कर दे, कैन्टीन से चाय मिलने में तीन मिनट से ज्यादा लग जायें, कोई बिल एक ही दिन में पास न किया जाय तो वह तुरन्त इस्तीफा दे देता है। बेशक अगले दिन उसके बारे में भूल जाये और किसी और बात पर कोई नया इस्तीफा दे दे। कई बार उसके पांच - सात इस्तीफे जमा हो जाते हैं जिन्हें डायरी क्लर्क एक किनारे जमा करती रहती है। जहां तक उसके इलाज का सवाल है, करोड़पति को डॉक्टर के पास ले जाया जाता है, उसकी तकलीफ बतायी जाती है, दवा भी मिलती है, लेकिन खाने के लिये तो करोड़पति को एक और जनम लेना पडेग़ा।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;करोड़पति लापता है। पिछले कई दिनों से न घर पहुंचा है और न ऑफिस ही। वैसे तो पहले भी वह कई बार दो - दो, चार - चार दिनों के लिये गायब हो जाता था, लेकिन जल्द ही मैले - कुचैले कपड़ों में लौट आता था। इस बार उसे गायब हुए महीना भर होने को आया है। उसका कहीं पता नहीं चल पाया है। इस बार पगार वाले दिन उसकी बीवी उसे ढूंढते हुए ऑफिस आई, तभी सबको याद आया कि कई दिन से करोड़पति को नहीं देखा। कई दिन से वह घर भी नहीं पहुंचा था। वैसे तो कभी भी किसी ने उसकी परवाह नहीं की थी, न घर पर न दफ्तर में। अब अचानक सबको करोड़पति याद आ गया था। बीवी को पगार वाले दिन उसकी याद आई थी, बल्कि जरूरत पड़ी थी कि आधी - अधूरी जितनी भी पगार है, करोड़पति से हस्ताक्षर करवा कर ले जाये। अगली पगार तक करोड़पति अपने दिन कैसे काटता था, क्या करता था यह उसकी सिरदर्दी नहीं थी। बेशक कर्जे वसूलने वाले भी पगार के आस - पास मंडराते रहते थे कि उसके हाथ में लिफाफा आते ही अपना हिस्सा छीन लें। लेकिन उसकी बीवी की मौजूदगी में कुछ भी वसूल नहीं कर पाते थे। अलबत्ता बीवी को ही डरा धमका कर सौ - पचास निकलवा पायें यही बहुत होता था। वे भी अब परेशान दिखने लगे थे। करोड़पति नहीं है अब क्या वसूलें और किससे वसूलें।&lt;br /&gt;अब अचानक सबको याद आने लगा है कि - किसने करोड़पति को आखिरी बार कहां देखा था! किसी को हफ्ता भर पहले स्टेशन पर पूरी - भाजी खाते नजर आया था तो किसी ने उसे सब्जी मण्डी में मैले कुचैले कपड़े पहने भटकते देखा था। किसी का ख्याल था कि वह या बिलकुल वैसा ही एक आदमी थैला लिये शहर से बाहर जाने वाली एक बस में चढ़ रहा था। जितने भी लोग थे करोड़पति के बारे में अपने कयास भिड़ा रहे थे, कोई भी यकीन के साथ बताने को तैयार नहीं था। बल्कि कुछ लोग तो इतनी दूर की कौड़ी ख़ोज कर लाये थे कि तय करना मुश्किल था कि किसके कयास में ज्यादा वजन है। एक चपरासी को तो पूरा यकीन था कि पिछले हफ्ते रेलवे पुल के पास भिखारी जैसे किसी आदमी की जो लाश मिली थी, हो न हो वह करोड़पति की ही रही होगी। अलबत्ता यह खबर देने वाले के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि अगर वह करोड़पति की ही लाश थी तो उसने पहले खबर क्यों नहीं दी? ये और इस तरह की कई अफवाहें अचानक हवा में उठीं और गायब भी हो गयीं।&lt;br /&gt;ऑफिस में तो उसकी मौजूदगी - गैर मौजूदगी महसूस ही नहीं की गई थी, लेकिन उसकी बीवी वाकई चिन्ता में पड़ गयी है। उसकी चिन्ता करोड़पति की पगार को लेकर है, जो उसे बिना करोड़पति के हस्ताक्षर के नहीं मिल सकती है। उसने ऑफिस से करोड़पति की गैर हाजिरी का प्रमाणपत्र ले लिया है और थाने में उसके गुमशुदा होने के बारे में रिपोर्ट लिखवा दी है। किसी तरह रोते - पीटते अपनी गरीबी की दुहाई देते हुए उसके गुमशुदा होने का प्रसारण भी दूरदर्शन पर करवा दिया है। लेकिन इस बीच न करोड़पति लौटा है न उसके बारे में कोई खबर ही मिली है।&lt;br /&gt;तीन महीने तक इंतजार करने के बाद ऑफिस ने हर तरह की कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद संस्थान का मकान खाली करने का आदेश उसकी बीवी को दे दिया है। उसकी बीवी की सारी कोशिशों और अनुरोधों के बावजूद ऑफिस से करोड़पति का एक पैसा भी उसे नहीं मिल पाया है। इस बीच उसने करोड़पति की जगह नौकरी के लिये भी एप्लाई कर दिया है जिसे ऑफिस ने ठण्डे बस्ते में डाल दिया है।&lt;br /&gt;करोड़पति की जगह नौकरी पाने के लिये उसे या तो करोड़पति का मृत्यु प्रमाणपत्र लाना पड़ेगा या उसके गुमशुदा होने की तारीख से कम से कम सात साल तक इंतजार करना पड़ेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-5626970240791730612?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/5626970240791730612/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=5626970240791730612&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/5626970240791730612'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/5626970240791730612'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='बीसवीं कहानी - करोड़पति'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-3879062012071300621</id><published>2008-08-04T10:45:00.000+05:30</published><updated>2008-08-04T10:47:01.289+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>19वीं कहानी - मातमपुर्सी</title><content type='html'>इस बार भी घर पहुंचने से पहले ही बाउजी ने मेरे लिए मिलने जुलने वालों की एक लम्बी  फेहरिस्त बना रखी है। इस सूची में कुछ नामों के आगे उन्होंने ख़ास निशान लगा रखे हैं, जिसका मतलब है, मुझे उनसे तो ज़रूर ही मिलना है। &lt;br /&gt;इस शहर को हमेशा के लिए छोड़ने के बाद अब  यहां से मेरा नाता सिर्फ़ इतना ही रहा है कि साल छ: महीने में हफ्ते दस दिन की छुट्टी पर  मेहमानों की तरह आता हूं और अपने खास खास दोस्तों से मिल कर या फिर मां बाप के साथ भरपूर वक्त गुज़ार कर लौट जाता हूं। रिश्तेदारों के यहां जाना कभी कभार ही हो पाता है। हर बार यही सोच कर आता हूं कि इस बार सब से मिलूंगा, सब की नाराज़गी दूर करूंगा,  लेकिन यह कभी भी संभव नहीं हो पाया  है। हर बार मुझसे नाराज़ होने वाले मित्रों की संख्या बढ़ती रहती  है और मैं हर बार  समय की कमी का रोना रोते हुए लौट जाता हूं। &lt;br /&gt;लेकिन बाउजी की इस फेहरिस्त में सबसे पहला नाम देखते ही मैं चौंका हूं। उस पर उन्होंने दोहरा निशान लगा रखा है। मैंने उनकी तरफ सवालिया निगाह से देखा है। उन्होंने हौले से कहा है -  मैंने तुझे लिखा भी था कि मेहता  की वाइफ  गुज़र गयी है। मैंने तुझे अफ़सोस की चिट्ठी लिखने के लिए भी लिखा था। अभी बेचारा बीवी के सदमे से उबरा भी  नहीं था कि अब महीना भर पहले संदीप भी नहीं रहा। मैं अवाक रह गया - अरे .. संदीप.. क्या  हुआ  था  उसे? वह तो भला चंगा था, बल्कि उसकी शादी तो साल भी पहले. ही हुई थी। मैंने उसे कार्ड भी भेजा था।&lt;br /&gt;आगे की बात मां ने पूरी की  है - शांति बेचारी ज़िदगी भर खटती रही और अकेले बच्चों को पढ़ाती लिखाती रही। तेरे अंकल तो नौकरी के चक्कर में हमेशा दौरों पर रहे और उसी ने बच्चों को पढ़ाया लिखाया। जब आराम करने का वक्त आया तो कैंसर उसे खा गया। मां का गला भर आया  है।&lt;br /&gt;मां बता रही  है  कि संदीप कानपुर से एक मैच खेल कर लौट रहा था। रास्ते में  किसी बस अड्डे पर  कुछ खा लिया होगा  उसने जिससे फूड पाइज़निंग हो गयी और यहां तक तो पहुंचते पहुंचते तो उसकी यह हालत हो गयी थी कि वहीं बस अड्डे से दो एक लोग उसे अस्पताल ले गये। जब तक घर में खबर पहुंचती, वह तो खतम हो चुका था। पता भी नहीं चल पाया कि उसने किस शहर के बस अड्डे पर क्या खाया था। अभी बेचारी शांति की राख भी ठण्डी नहीं हुई थी कि .. .. ..&lt;br /&gt;मेरे सामने दोहरी दुविधा है। मैं संदीप की बीवी से पहली  ही बार और वह भी कैसे दुखद मौके पर मिल  रहा हूं। पता चला था संदीप की पत्नी बहुत ही खूबसूरत और साथ ही स्मार्ट भी है।  शांति आंटी और अंकल भी हमेशा उसकी तारीफ करते रहते थे। मैं कल्पना भी नहीं कर पा रहा हूं कि इतनी अच्छी लड़की को शादी के सिर्फ़ साल भर के भीतर विधवा हो जाना पड़ा। क्‍या सोचती होगी वह भी कि पहले सास गयी और अब खुद का सुहाग ही  उजड़ गया।&lt;br /&gt;मेरा संकट  है, मैं ऐसे मौकों पर बहुत ज्यादा नर्वस हो जाता हूं। मातमपुर्सी के लिए मेरे मुंह से लफ्ज़ ही नहीं निकलते। मुझे समझ ही नहीं आता कि क्या कहा जाये और कैसे कहा जाये। घबरा रहा हूं कि मैं उन लोगों का सामना कैसे करूंगा। एक तरफ अंकल हैं जो मुझे बहुत मानते हैं और इन दो महीनों में ही पत्नी और जवान बेटा खो चुके हैं और दूसरी तरफ़ संदीप की पत्नी  है  जिससे मैं पहली बार मिल रहा हूं। &lt;br /&gt;इससे पहले कि मैं झुक कर अंकल के पैर छूता, अंकल ने बीच में ही रोक कर  मुझे गले से लगा लिया है। शिकवा कर रहे हें कि मैं कितनी बार यहां आया और घर पर एक बार भी नहीं आया। मेरे पास कोई जवाब नहीं है और मैं झेंपी हुई हसीं हंस कर रह जाता हूं। देखता हूं इस बीच वे पहले की तुलना में बहुत कमज़ोर लग रहे हैं। आखिर दो मौतों का ग़म झेलना कोई  हंसीं खेल नहीं। मैं संदीप या आंटी के बारे में कुछ कहने को होता हूं कि  वे मुझसे पूछ रहे हैं  बंबई के हालचाल और बाल बच्चों के बारे में। मैंने एक सवाल का जवाब दिया नहीं होता कि वे दूसरा सवाल दाग देते हैं। मैं खुद किसी तरह से बातचीत का सिरा उस तरफ मोड़ना चाहता हूं ताकि अफसोस के दो शब्द तो कह सकूं। बाउजी ने एकाध बार बात घुमाने की कोशिश भी की लेकिन मेहता अंकल हैं कि हंस-हंस कर इधर उधर की बातें कर रहे हैं। ठहाके लगा रहे हैं। तभी  पारूल पानी की ट्रे ले कर आयी है। मैं उठ कर उसे हेलो कहता हूं। वह हौले से जवाब देती है।  बेहद सौम्य और खूबसूरत लड़की। चेहरे पर ग़ज़ब का आत्मविश्वास। लेकिन हाल ही के दोहरे सदमे ने उसके चेहरे का सारा रस और नूर छीन लिया है। शादी के साल भर के भीतर उसकी जिंदगी क्या से क्या हो गयी। इतने अरसे में तो  पति पत्नी एक दूजे को ढंग से पहचान भी नहीं पाते और .. .. ..। &lt;br /&gt;तय नहीं कर पा रहा हूं  बातचीत किस तरह से शुरू करूं। और कोई मौका होता तो कोई भी हलकी फुलकी बात कही जा सकती थी लेकिन इस मौके पर.. ..। तभी अंकल ने उसे फरमान सुना दिया  है  - अरे भई, दीपक को कुछ चाय नाश्ता कराओ। बरसों बाद हमारे घर आया है। और वे गाने लगे हैं - बंबई से आया मेरा दोस्त। &lt;br /&gt;पारूल चाय का इंतज़ाम करने चली गयी है। अंकल ने बातचीत को अलग ही दिशा में मोड़ दिया है। वे कोई पुराना किस्सा सुनाने लगे हैं। मैं फिर संदीप के बारे में बात करना ही चाहता हूं कि पारुल चाय ले कर आ गयी और मेरा वाक्य अनकहा ही रह गया।&lt;br /&gt;चाय पारुल ने खुद बना कर सबको दी  है। अचानक सब खामोश हो गये हैं और कुछ देर तक सिर्फ़ चाय की चुस्कियों की ही आवाज़ आती  रही। चाय खत्म हुई ही  है  कि  पारुल ने  अगला फरमान सुना दिया  है - आप लोग खाना खा कर ही जायेंगे। पारुल ने जिस अपनेपन और  अधिकार के साथ कहा  है, उसमें मना करने की गुंजाइश ही नहीं  है।&lt;br /&gt;पारुल के चले जाने के बाद भी मैं देर तक बातचीत के ऐसे सूत्र तलाशता रहा कि किसी भी बहाने से सही, कम से कम दो शब्द अफसोस के कह ही दूं। दो एक बार आंटी और संदीप का ज़िक्र भी आया लेधिक बातचीत आये-गये तरीके  से आये बढ़ गयी। में हैरान हो रहा हूं कि अभी तो आंटी और संदीप को गुज़रे महीना भर ही  हुआ है, और  अंकल ने उन्हें  अपनी यादों तक से उतार दिया है।&lt;br /&gt;अब बाउजी और मेहता अंकल की बातचीत अपनी निर्धारित गति से अपनी  पुरानी लकीर पर चल पड़ी  है और मैं उसमें कहीं नहीं हूं। &lt;br /&gt;मैं मौका देख कर कमरे से बाहर आ गया हूं और कुछ सोच कर  रसोई में चला गया हूं जहां पारुल खाना बनाने  की तैयारी कर रही है। मुझे देखते ही पारुल ने उदासी भरी मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया है। मैं यहां भी बातचीत शुरू करने के लिए सूत्र तलाश रहा हूं। हम दोनों ही चुप हैं। &lt;br /&gt;पारूल ने ही उबारा है मुझे -  बंबई से कब आये आप?&lt;br /&gt;आज सुबह ही। आते ही संदीप का पता चला तो.. .. .. ..।&lt;br /&gt;मैंने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया है। पारूल भी चुप है। मैं ही बात का सिलसिला आगे बढ़ाता हूं - दरअसल, मैं आप लोगों की शादी में नहीं आ पाया था इसलिए आपसे नहीं मिल पाया था लेकिन संदीप के साथ मेरी खूब जमती थी। मैं आपसे मिल भी रहा हूं तो इस हाल में। मेरी आवाज भर्रा गयी है।&lt;br /&gt;पारुल की आंखें भर आयी हैं। थोड़ी  देर बाद उसी ने बातचीत का सिरा थामा है -  मैं  आपसे पहली बार मिल रही हूं  लेकिन  आप के बारे में काफी कुछ जानती हूं। पापा और संदीप अक्सर आपकी बातें करते रहते थे।&lt;br /&gt;पारूल ने शायद जानबूझ कर बात का विषय  बदला है।&lt;br /&gt;मैंने भी बात को मोड़ देने की नीयत से कहा - मैं कुछ मदद करुं क्या? &lt;br /&gt;मुझे लगा, यहां उसके साथ कुछ और वक्त बिताया जाना चाहिये।&lt;br /&gt;-नहीं, बस सब कुछ तैयार ही है।&lt;br /&gt;-आपने बेकार में तकलीफ़ की।&lt;br /&gt;-इसमें तकलीफ़ की क्या बात, मुझे खाना तो बनाना ही था। और फिर मेरे घर तो आप पहली ही बार आये हैं। संदीप होते तो भी आप  खाना खाते ही। उसकी आवाज़ भर्रा गयी है।&lt;br /&gt;-नहीं यह बात नहीं है। दरअसल.. .... .. .. ।&lt;br /&gt;उसने कोई जवाब नहीं दिया है।&lt;br /&gt;-अब क्या करने का इरादा है। मैंने बातचीत को भविष्य की तरफ मोड़ दिया है।&lt;br /&gt;-सोच रही हूं घर पर ही रह कर कमर्शियल आर्ट का अपना पुराना काम शुरू करूं। संदीप कब से पीछे पड़े थे कि  सारा दिन घर पर बैठी रहती हो, कुछ काम ही कर लो। पहले मम्मी जी की बीमारी थी फिर ये दोहरे हादसे। मैं तो एकदम अकेली पड़ गयी हूं। मुझे क्या पता था कि जब संदीप की बात मानने का वक्त आयेगा, तब वही नहीं होगा .. .. .. ..।&lt;br /&gt;-मेरी मदद की जरूरत हो तो बताना।&lt;br /&gt;-बताऊंगी, अभी कब तक रहेंगे यहां?&lt;br /&gt;-दसेक दिन तो हूं ही। आऊंगा फिर मिलने। बल्कि आप का उस तरफ आना हो तो..।&lt;br /&gt;-घर से निकलना नहीं हो पाता। फिर भी आऊंगी किसी दिन।&lt;br /&gt;तभी अंकल की आवाज आयी है - अरे भई, यहां भी कोई आपका इंतज़ार कर रहा है। थोड़ी सी कम्पनी हमें भी दे दो। मैं पारुल को वहीं छोड़ कर  ड्राइंग रूम में  वापिस आता हूं। &lt;br /&gt;देखता हूं - अंकल ने बोतल और तीन गिलास सजा रखे हैं।&lt;br /&gt;मुझे देखते ही उन्होंने पूछा है- अभी भी अपने बाप से छुप कर पीते हो या उसके साथ भी पीनी शुरू कर दी है ?  &lt;br /&gt;और उन्होंने एक  ज़ोरदार ठहाका लगाया है। &lt;br /&gt;-आओ बरखुरदार. तुम्हारी इस विजिट को सेलिब्रेट करें।&lt;br /&gt;मुझे समझ में नहीं आ रहा, पैंसठ साल का यह बूढ़ा और कमज़ोर आदमी  दोहरी मौतों के दुख से सचमुच उबर चुका है या इन ठहाकों, हंसी मज़ाक और शराब के गिलासों के पीछे अपना दुख जबरन हमसे छुपा रहा है। बाउजी इस वक्त  खिड़की के बाहर देख रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-3879062012071300621?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/3879062012071300621/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=3879062012071300621&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/3879062012071300621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/3879062012071300621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://soorajprakash.blogspot.com/2008/08/19.html' title='19वीं कहानी - मातमपुर्सी'/><author><name>सूरज प्रकाश का रचना संसार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03298796278677102563</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp2.blogger.com/_DdFT6VwMJVY/R6wzfXKTO_I/AAAAAAAAAAU/kD1J0_aaUw8/S220/charly+function+suraj+reading+thebook.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5913688233422255937.post-5794170794885376332</id><published>2008-07-28T09:40:00.000+05:30</published><updated>2008-07-28T09:42:49.800+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>18वीं कहानी - दिव्या, तुम कहाँ हो?</title><content type='html'>सपना देख रहा हूं क्या? या सब कुछ मेरे सामने घट रहा है। मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। न मैं पूरी तरह होश में हूं न बेहोशी में। मैं जागने और नींद के बीच इधर से उधर झूल रहा हूं। हिचकोले खा रहा हूं। सरकस के एक्रोबैट्स की तरह। ऊपर से हवा में लटके एक तरफ के डण्डे से झूलते हुए दूसरी तरफ के डण्डे को थाम लेना। इधर होता हूं तो सब कुछ साफ होता है। रोशनी, कमरा... बिस्तर पर लेटा हुआ मैं, लेकिन उधर की तरफ का डण्डा थामते ही जैसे नींद की गहरी अंधेरी सुंग में उतर जाता हूं। सब कुछ गायब हो जाता है। एकदम अंधेरा। सन्नाटा। कई बार खुद को बीच अधर में पाता हूं। कुछ भी थामे बिना। रोशनी और अंधेरे की झिलमिल में वहां से तेजी से गिरने को होता हूं कि एकदम आंख खुल जाती है। थोड़ी देर बाद फिर वही कलाबाजियां। पता नहीं कितनी देर से चल रहा है यह सब। नींद की लहरों पर डूबना-उतराना।&lt;br /&gt; तेज प्यास लगी है। आसपास देखता हूं। कोई भी नहीं है। किसी को पुकारना चाहता हूं। आवाज ही नहीं निकलती। कौन-सी जगह है यह? यह मेरा कमरा तो नहीं? हवा में दवाओं की गंध है। यानी अस्पताल में हूं। यहां कैसे आ गया मैं? क्या हुआ है मुझे? याद करने के लिए दिमाग पर ज़ोर डालता हूं। दर्द की एक तेज लहर से माथे की नसें तड़कने लगती हैं। याद आता है - आधी रात को सिर दर्द उठा था। भयंकर। जैसे पूरा कपाल भीतर तक खदबदा रहा हो। उलटी-सी भी आने को हो रही थी। पेनकिलर, बाम, नींद की गोलियां, सभी तो आजमाये थे। पता नहीं कितनी देर छटपटाता रहा था। दर्द की सुइयां और बारीक होती चली गयी थीं। अजीब तरीके से दिमाग चुनचुना रहा था। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। याद नहीं आ रहा, फिर क्या हुआ होगा? हो सकता है उठकर किसी पड़ोसी की जगाया हो, वही मुझे यहां छोड़ गया हो। अकेले तो नहीं आया होऊंगा। क्या कहा होगा डॉक्टर ने? इलाज शुरू हो गया क्या? कोई सीरियस बात होगी तभी तो अस्पताल में हूं। सिर अभी भी भारी लग रहा है। ऊपर से यह नींद आने उचटने की हालत।&lt;br /&gt; उठकर बैठने की कोशिश करता हूं। दर्द की एक धारदार छुरी पूरे कपाल को चीरती चली जाती है। फिर लेट जाता हूँ। साइड टेबल की तरफ निगाह जाती है। ढेर सारी दवाएं। मेडिकल रिपोर्ट। तो इसका मतलब... इलाज शुरू हो चुका है। टेस्ट भी हो चुके। कब से हूं यहाँ? दर्द तो... याद नहीं आता... कब उठा था...। आज कितनी तारीख है? कैलेण्डर तो सामने लगा है। सितम्बर 1992। लेकिन इसमें दिखाई दे रही तीस तारीखों में से आज कौन-सी है? उस दिन कौन-सी तारीख थी... नहीं याद आता। आंखें बंद कर लेता हूं। क्या हुआ है मुझे? कहीं... कोई... खतरनाक...बी... मा... री...। मेडिकल रिपोर्ट तो यहीं रखी है। देखूँ, क्या कहती है। फाइल उठाता हूं। कई रिपोर्टें हैं इसमें तो। इसका मतलब कई टेस्ट हुए हैं। हर रिपोर्ट के नीचे लाल स्याही में टाइप की हुई इबारतें पढ़ने की कोशिश करता हूं।&lt;br /&gt; ओह गॉड! यह... क्या... हो... गया...। फाइल मेरे हाथ से छूट कर नीचे गिर गयी है। निढाल-सा पड़ गया हूं। सांस सकदम तेज हो गयी है। जैसे मीलों दौड़कर आया हूं। गले में कांटे उग आये हैं। पानी रखा है, पर उठकर पीने को हिम्मत नहीं है। पथराई आंखों से खिड़की के बाहर का अंधेरा देखता हूं। यह अंधेरा धीरे-धीरे कमरे के भीतर आ रहा है। मेरे चारों तरफ इस अंधेरे ने एक घेरा बना लिया है। अब यह मेरे भीतर उतरेगा और फिर... सब कुछ... खत्म...।&lt;br /&gt; मैं... मुझे... मुझे... ब्रेन ट्यूमर हो गया है। कैंसर के जीवाणु लिये। कोई इलाज नहीं। निश्चित मौत। छ: महीने से दो साल के बीच। कभी भी। जब आखिरी बाद दर्द उठेगा तो चौबीस घंटे की मोहलत भी नहीं मिलेगी। उससे पहले कष्टदायक बीमारी झेलते हुए जीना। खर्चीला इलाज... ऑपरेशन... तकलीफ... तकलीफ... तकलीफ... इलाज से मौत थोड़ा पीछे खिसक सकती है। टलेगी नहीं। आंखों के आगे अंधेरा छा रहा है... अरे कोई है... मुझे बचाओ... किसी को बुलाने के लिए आवाज देना चाहता हूं। आवाज ही नहीं गले में... पानी... पा... नी... कोई है... पानी।&lt;br /&gt; तो... ? खत्म हो गया मैं। सिर्फ़ चौंतीस साल की उम्र... आधी... अधूरी ज़िंदगी... सब कुछ यहीं छूट जायेगा। पैक अप कर लूं? खाली हाथ जाने के लिए पैक अप! यह घर-बार... दिव्या, मां-पिताजी, भाई-बहन, ऑफिस, सुख-दुख, दोस्त, खुशियां सब यहीं... रह जायेंगे... । सब कुछ चलता रहेगा। मैं ही नहीं रहूंगा। कहीं मज़ाक तो नहीं है? डॉक्टरों ने मुझे डराने के लिए, मुझसे पैसा ऐंठने के लिए यह सब लिख दिया हो। आजकल खूब चल रहा है इस लाइन में। कब हुए थे सब टेस्ट? मुझे होश में क्यों नही लाया गया? मुझसे पूछा क्यों नहीं गया?&lt;br /&gt; दिमाग सुन्न हो रहा है। एकदम अंधेरा। बाहर-भीतर, दोनों जगह। मुझे मरना होगा... उससे पहले तिल-तिल कर जीना। हर सांस अनिश्चित। मेरी रुलाई फूट पड़ी है। मैंने क्या कसूर किया था, अधबीच ऊपर बुला लिया जाऊंगा। वह भी इतनी घातक बीमारी से? दिव्या, तुम कहां हो? देखो मैं कितना लाचार पड़ा हूं यहां। अपनी मौत का परवाना लिये! अपना ख्याल रखना दिव्या! ओ मेरी मां, मुझे बचाओ। मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता। बहुत डर लग रहा है मां, मैं क्या करूं।&lt;br /&gt; एक चीख निकलती है, लेकिन उसकी आवाज भीतर ही भीतर घुटी रह गई है। किसी तरह उठ कर पानी पीता हूं। थकान होने लगी है। फिर लेटता हूं। कौन है यहाँ? यह कैसा अस्पताल है? कोई पूछने क्यों नहीं आता? इतने सीरियस मरीज को भी ये लोग अकेला छोड़ देते हैं। मुझे अभी कुछ हो जाये तो? सिर में अभी भी करेंट उठ रहे हैं। कया करूं? पता तो चले कौन लाया मुझे? डॉक्टर कया कहते हैं? दवाएं? इलाज? क्या यहां इलाज हो पायेगा? या मुम्बई जाना होगा? वहां बेहतर सुविधाएं हैं? मौत को पीछे सरकाने की। अमेरिका में और बेहतर हैं। लेकिन पैसे?&lt;br /&gt; पता नहीं ऑफिस वालों को खबर है या नहीं? अस्पताल का खर्च कौन देगा? दवाएं, ऑपरेशन? कहां से करूंगा इतना इंतज़ाम? पता नहीं कितनी तारीख है? घर पर तो दो-चार सौ भी नहीं होंगे। बैंक में जितने पैसे थे, दिव्या पहले ही ले जा चुकी है। कोई एडवांस बाकी नहीं है। कौन करेगा देखभाल मेरी। उधर दिव्या एक नये प्राणी के स्वागत में व्यस्त है और इधर मैं अपनी बची-खुची ज़िंदगी का लेखा-जोखा तैयार कर रहा हूं। वह तो पता चलते ही रो-रो कर जान दे देगी। मेरे बच्चे का आना और मेरा जाना। कैसा अभागा जन्मेगा! कहीं मैं ही तो अपने बच्चे का रूप धर कर नहीं लौट रहा! सोच... सोचकर कलेजा मुंह को आ रहा है।&lt;br /&gt;कभी सोचा भी नहीं था, अपनी मौत को खबर बरस-दो बरस पहले मिल जायेगी मुझे। और फिर मरने के पल तक लगातार इस अहसास को जीते रहना - कोई भी पल मेरे लिए आखिरी हो सकता है। वैसे तो मौत किसी को भी कभी भी आ सकती है, रोज सैकड़ों-हजारों दुर्घटनाओं में, भूकंप से, दंगों, लड़ाइयों में मरते ही हैं, लेकिन वह मौत तो एकदम अचानक होती है। पल भर पहले भी पता नहीं होता, पिछली सांस, पिछला बोला गया संवाद, मिलाया गया हाथ, लिया गया चुम्बन आखिरी था। अगली सांस गायब। बल्ब फ्जूज हो जाने की तरह। एकदम अंधेरा। मेरे साथ भी वही होता। मरने से पहले की यह पीड़ा, ये चिंताएं तो न होतीं। एकदम मुक्त हो जाता। जो जहां है, जैसा है, वैसा ही छोड़कर। लेकिन मुझे तो खराब चोक वाली ट्यूब लाइट की तरह न जाने कब तक भक...भक... जलना-बुझना है। सबकी आंखों में चुभते हुए। मरना सिर्फ मुझे होगा, लेकिन झेलना सबको पड़ेगा।&lt;br /&gt; आंखें बंद करता हूं। अपनी मौत को हर वक्त पास आते महसूस कर रहा हूं। क़ॉरीडोर में उसके कदमों की आहट आ रही है। दरवाजे पर आकर ठिठक गयी है। नॉक किया है उसने। मैं दम साधे पड़ा हूं। उसकी आवाज न सुनने का नाटक करता हूं। मौत मुस्कुराती है-घबरा रहे हो? पहले से पता हो तो सबके साथ ऐसा ही होता है। चलो। थोड़ा और जी लो। लेकिन ज्यादा नहीं। मैं यहीं बाहर इंतज़ार कर रही हूं।&lt;br /&gt; देख रहा हूं - सब लगे हैं मेरी सेवा में। खुद को और मुझे झूठी तसल्ली देते हुए। मेरे सामने कोई नहीं रोता। सब आंसू पोंछकर आते हैं। जबरदस्ती रुलाई रोके हुए। लेकिन मेरे सामने से जाते ही इतनी देर से रोकी गयी रुलाई और नहीं रोक पाते। संवाद खत्म हो गये हैं। हर आदमी सूनी-सूनी आंखों से मेरी तरफ बैठा देखता रहता है। फिर हाथ दबाकर, सिर पर हाथ फेर कर चला जाता है। हिन्दी फिल्मों के नायक की तरह `सब ठीक हो जाएगा' का मंत्र दोहराता हुआ। सब परिचितों की दिनचर्या में एक और काम जुड़ जायेगा। मुझे देखने आना। मुझे और मेरे परिवार को लगातार याद दिलाया जायेगा कि मैं बस चंद दिनों का मेहमान हूं। यह अवधि जितनी कम होती चली जायेगी, सबकी चिंता का ग्राफ ऊपर उठता रहेगा। इतना ऊपर कि एक दिन मैं ही उस ग्राफ की सीमा से बाहर निकल जाऊंगा।&lt;br /&gt; मेरी सांस फिर फूल गयी है। क्या है यह सब? कोई है क्यों नहीं मेरे पास? किसे बुलाऊं? किसका हाथ थामूं? दिव्या? कब आओगी दिव्या? लेकिन वह तो मायके में है? नन्हें-नन्हें स्वेटर, मोजे बुन रही होगी! खूबसूरत सपनों में जी रही होगी। और मैं?&lt;br /&gt; लेकिन मुझे इतना घबराना नहीं चाहिए। हो सकता है, इनीशियल स्टेज ही हो। या डॉक्टरों की गलती भी तो हो सकती है। फिर से टेस्ट कराये जा सकते हैं। इतनी जल्दी तो नहीं मरा जा रहा। अस्पताल में तो हूं ही। देखभाल हो ही रही होगी। घबराने से क्या होगा? आखिर ऊपर वाले से छीना-झपटी तो नहीं की जा सकती। हिस्से में होगा तो बेहतर इलाज से ठीक भी तो हो सकता हूं। मुझे हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। ठण्डे दिमाग से सोचना चाहिए। अभी तो मेरे पास वक्त है। इसे जीना चाहिए।&lt;br /&gt; कौन था वह? हां, आनन्द फिल्म का नायक। राजेश खन्ना। उसे भी तो कोई ऐसा ही रोग था। कितना हंसता-हंसाता था। लेकिन वह तो एक्टिंग कर रहा था। जब मरने का वक्त आया तो कितना चिल्लाता था, `बचा लो मुझे। मैं मरना नहीं चाहता। ज़िंदगी के नाटक का अंतिम सीन करते-करते कितना रोता था। लेकिन वह भी तो एक्टिंग ही थी। यहां तो सचमुच का रोल है। जीवन्त मंच। जीवंत अभिनय। मैं अकेला पात्र, कोई संवाद नहीं। बस दम साधे पड़े रहो। एक पूरा नाटक समाप्त। इस अभिनय के लिए तालियां, आंसू, शाबाशी, रोना-धोना कुछ नहीं पहुंचेगा मुझ तक।&lt;br /&gt; फीकी हंसी आती है। राजेश खन्ना को अगर सचमुच ब्रेन ट्यूमर हो जाये तो कर पायेगा आनन्द फिल्म की तरह हंसना-हंसाना। कहीं रोता-छटपटाता पड़ा रहेगा। कर पाऊंगा मैं भी उसी की तरह मौत का सामना! या बाकी सारा समय रोते-कलपते बीतेगा? अपनी ज़िंदगी का नायक बनकर जीना। जीना-मरना ऊपर वाले के हाथ... हम तो सिर्फ कठपुतलियां...।&lt;br /&gt; खुद पर काबू पाने की कोशिश करता हूं। अभी तो नहीं मर रहा हूं। जब तक वक्त है मेरे पास, हाथ-पांव और दिमाग चलते हैं, चीजें व्यवस्थित कर लूं। अपनी अधूरी हसरतें पूरी कर लूं। जितना है जी लूं। यह सोचकर तनाव थोड़ा कम हो गया है। उठता हूं। पानी पीता हूं।&lt;br /&gt; अभी भी याद नहीं आ रहा, यहां कैसे पहुंचा? कब आया अस्पताल! नर्स आयेगी तो पूछूंगा। सारे टेस्ट हो गये हैं या नहीं! मुझे पता क्यों नहीं चला। आंखें बंद कर लेता हूं। अब क्या फर्क पड़ता है। अस्पताल तो पहुंच ही गया हूं। सुबह कोई तो आयेगा। ऑफिस या कॉलोनी से। हो सकता है, किसी ने पता ढूंढ़कर दिव्या या पिताजी को भी खबर भेज दी हो।&lt;br /&gt; किसी को तो बुलवाना ही होगा। डॉक्टर भी अकेले रहने की सलाह नहीं देंगे। दिव्या तो डिलीवरी के बाद ही आयेगी। उसका अभी आना ठीक नहीं होगा। उसे खुद देखभाल की ज़रूरत है। लेकिन एक बार पता चल जाये तो रुक पायेगी क्या... रो...रोकर बुरा हाल कर लेगी। कौन करेगा उसकी देखभाल यहां?&lt;br /&gt; मेरी तो पुकार हो गयी। वह कैसे निभायेगी? छोटा बच्चा? अकेली कहां रहेगी? फ्लैट भी तो छोड़ना पड़ेगा। अपना मकान अभी अधूरा खड़ा है। पता नहीं कब पैसे होंगे और कब पूरा होगा। कब तक भागदौड़ करेगी बेचारी। कैसे कर पायेगी। किस-किस के आगे हाथ जोड़े जायेंगे? वैसे भी खुद्दार है, आसानी से उसके हाथ नहीं जुड़ते।&lt;br /&gt; इलाज...ऑपरेशन... कहां से आयेगा खर्च। कहां कहां भटकना होगा दिमाग का यह रोग लिये? रोज़-रोज़ नयी दवाएं, टेस्ट... मोटे-मोटे मेडिकल बिल... लम्बी मेडिकल लीव... फिर हाफ पे... फिर विदआउट पे और आखिर में... एक्सपायर्ड... इस घर, परिवार, ऑफिस से, इस दुनिया से एक और आदमी चला जायेगा। बिना कुछ हासिल किये। कुछ दिन अल्बम में, लोगों की याद में बना रहूंगा। फिर धीरे-धीरे पूरी तरह भुला दिया जाऊंगा। कहां याद करते हैं हम अपने पूर्वजों को। अपने गुजरे साथियों को। एक आदमी से एक याद और उस याद के भी धुंधला जाने के दौर से मुझे भी गुजरना होगा। मेरा सब कुछ मेरे साथ खत्म हो जायेगा।&lt;br /&gt; लेकिन इस तरह खत्म होने से पहले की ज़िंदगी मैं कैसे गुज़ारूंगा? अकेले तो कत्तई नहीं रह पाऊंगा। किसी को तो घर से बुलाना पड़ेगा। दौड़-धूप... डॉक्टरों, अस्पतालों के चक्कर। हो सकता है, डॉक्टर बंबई जाने के लिए कहें। किसे बुलाऊं। सुनील भाई साहब, परेश भाई साहब या फिर छोटा सुदीप। लेकिन जो भी आयेगा, काम-धंधा छोड़कर आयेगा। काम का हर्जा होगा। पता नहीं कितने दिन रहना पड़े। और फिर सभी को तो पचीसों तकलीफें हैं। सुनील भाई साहब खुद ढीले रहते हैं। आये दिन चारपाई पकड़े रहते हैं। परेश जी तो पैसों की तंगी की वजह से छुट़टी तक नहीं ले पाते। प्राइवेट नौकरी। जो भी आयेगा, मेरी इस महंगी बीमारी में न चाहते हुए भी उस पर बोझ पड़ेगा। न भी खर्च करने दूं मैं, बीसियों बार डॉक्टरों, कैमिस्टों के चक्कर लगेंगे। पता नहीं कितने दिन अस्पताल में रहना पड़े।&lt;br /&gt; पिताजी को बुलवाऊं। लेकिन कहां कर पायेंगे इतनी भागदौड़। बेशक पता चलते ही तुंत चल पड़ेंगे। इस उम्र में भी सबसे ज्यादा मददगार और सहारा देने वाले साबित होंगे। सब कुछ छोड़कर आ जायेंगे। मां की भी परवाह नहीं करेंगे, जो अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। उसे तो हर वक्त किसी के सहारे की ज़रूरत होती है। मां को किसके भरोसे छोड़ेंगे। पिताजी को बुलवाऊं भी किस मुंह से। कई-कई महीने बीत जाते हैं उन्हें मनीऑर्डर भेजे हुए। हर बार उन्हीं का मनीऑर्डर टल जाता है। उनकी मामूली-सी पेंशन। मां का इलाज। बीसियों दूसरे खर्चे। पूरी रिश्तेदारी। पैंसठ साल की उम्र में भी वे अपनी बूढ़ी हड्डियों को आराम नहीं देना चाहते। कहीं न कहीं खटते रहते हैं। न किसी से कुछ मांगते हैं, न हममें से कोई आगे बढ़कर उनकी बूढ़ी हथेली पर कुछ रखने की सोचता है। हर बार यही होता है। हम सब भाई यही मान लेते हैं, इस बार दूसरे ने भेज दिया होगा। सामने कोई नहीं आता।&lt;br /&gt; आये भी कैसे? सबके पीछे बीवियां हैं, जो दरवाजे की ओट में खड़ी देखती रहती हैं। कहीं उनका पति आगे बढ़कर कोई फालतू जिम्मेवारी तो नहीं उठा रहा। ताने मारती रहती हैं। उनकी तेज आंखें पति की पीठ पर चिपकी उन्हें कोंचती रहती हैं। बहुत कर लिया है इस घर के लिए। सारी उम्र का ठेका थोड़े ले रखा है।&lt;br /&gt; अगर पिताजी आते भी हैं तो भी मां की ही पोटलियां खुलवायेंगे। गनीमत होगी उनमें भी अगर किराये भर के पैसे निकल आयें। वैसे भी मेरी बीमारी का सुनकर एकदम टूट जायेंगे। उन्हें ही कुछ हो गया तो...? मां के एक्सीडेंट के समय इस बुढ़ाने में भी ज़ार-ज़ार रोते थे। इस उम्र में अकेले रह जाने का डर उनकी जान खाये जा रहा था। उन्हें पता था, हम सब बच्चों के होते हुए भी वे एकदम अकेले और अलग-थलग पड़ जायेंगे। नहीं, उन्हें तकलीफ होगी यहां आकर। फिर मां भी तो है। उनकी कौन करेगा?&lt;br /&gt; मैं भी कैसा पागल हूं। लगता है दिमागी फोड़े ने अपना असर दिखाना खुरू कर दिया है। यह कैसे हो सकता है कि मैं किसी एक को बुलवाऊं और उसे जब यहां आकर असलियत का पता चले और वह औरों को न बताये। दो-तीन दिन में ही पूरा कुनबा यहां आ पहुंचेगा। कैसे भी करके। आयेंगे सब। बिना बुलाये ही। बस पता लगने भर की देर होगी। मुझे एक दिन भी यहां अकेले नहीं रहने दिया जायेगा। कहीं भी शिफ्ट कर दिया जायेगा। हर तरह का संभव, असंभव इलाज आजमाया जायेगा।&lt;br /&gt; मां के एक्सीडेंट के समय देख चुका हूं। पता लगते ही पास-दूर के सब रिश्तेदार आ जुटे थे। हर आदमी अपनी मौजूदगी दर्ज़ कराना चाहता था। हर तरह की मदद के लिए तैयार था। मां को चौथे दिन होश आया था, वह याददाश्त खो बैठी थी। फिर भी सबकी चाह रहती, मां उन्हें कम-से-कम एक बार तो पहचान ले। मां कोशिश करती। कुछ बुदबुदाती। दिमाग पर ज़ोर पड़ता। वह दर्द से कराहती। लेकिन कोई भी मां की आंखों में पहचान दर्ज करवाये बिना जाना नहीं चाहता था।&lt;br /&gt; तो... तो... इसका यही मतलब हुआ, किसी को भी बुलवाया जाये, आयेंगे सब। जो भी पहले आयेगा, पहला काम यही करेगा सबको फोन, तार, चिट्ठी से खबर करेगा। यहां अकेला हूं। अस्पताल में पड़ा हूं। दिव्या मायके में। सब आ गये तो कैसे होगा? कौन करेगा सबके लिए? दिव्या लौट भी आये तो मेरी देखभाल करेगी, खुद को संभालेगी या आया-गया देखेगी। मेरे बीमार होने से सब पेट पर पट़टी बांधकर नहीं आयेंगे। फिर इलाज? खर्च?&lt;br /&gt; कहां से आयेगा यह रुपया। इलाज के लिए? घर खर्च के लिए। इधर-उधर से कर्ज उठाये जायेंगे। कौन लेगा? मेरे बाद चुकाना भी तो होगा। तय है जो लेगा उसी को चुकाना पड़ेगा। कौन आयेगा सामने। बात पांच-सात हजार की हो तो कोई सोचे भी। अंधे कुएं में पता नहीं कितना डालना पड़े। न वापसी की गारंटी, न मेरे ठीक होने की।&lt;br /&gt; याद करने की कोशिश करता हूं, क्या लेना-देना है। कहां से लिया जा सकता है लोन? उस दिन इन्कम टैक्स के लिए हिसाब लगाया तो था। नकद बचत तो दिव्या ले गयी है। थोड़े-बहुत सेविंग सर्टिफिकेट्स हैं। दो पॉलिसियां। और कर्ज़-डेढ़ लाख हाउसिंग लोन के, सात हजार स्कूटर लोन के। चार हजार कन्ज्यूमर लोन के, सत्रह हजार क्रेडिट सोसाइटी के। क्रेडिट सोसाइटी से लोन रिन्यू करा के तीन हजार मिलेंगे और एमरजेंसी लोन पांच हजार। ये आठ हजार तो डॉक्टर चरणामृत के रूप में ही ले लेंगे। बाकी?&lt;br /&gt; ख्याल आता है, अगर मुझे कुछ हो जाये तो? पैसों के अभाव में ढंग का इलाज न मिल पाने के कारण अगर मुझे कुछ हो जाता है तो? जीते जी मुझे कर्ज़ चुकाने हैं, इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन मरने के बाद सारे कर्ज़ चुकाकर भी कम से कम ढाई लाख रुपये दिव्या को मिलेंगे। साठ हजार फंड के। नब्बे हजार ग्रुप इंशोरेंस, पन्द्रह हजार स्पेशल ग्रेच्यूटी, साठ हजार ग्रेच्यूटी। सर्टिफिकेट्स वगैरह के। और छोटी-मोटी रकमें, दो लाख बीमे के। अजीब मज़ाक है। ज़िंदा हाथी खाक का, मरा सवा लाख का। इलाज के बिना मरूं और मरने पर पैसे ही पैसे। किसे? दिव्या को ही तो। वही तो नॉमिनी है। &lt;br /&gt; कम से कम इस फ्रंट पर तो मुझे ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। कभी न कभी मकान भी पूरा हो जायेगा। हो सकता है, मेरे सामने हो जाये। फिर मेरी जगह दिव्या को नौकरी भी तो मिलेगी। ग्रेजुएट है। क्लर्की ही सही। आगे तरक्की कर सकती है। पर ये सारे पैसे दिव्या को मिलें, नौकरी भी उसे मिले, मकान भी उसी के नाम रहे और मां-पिताजी उन्हीं ग्यारह सौ की पेंशन में गुजारा करते रहें? अब तो फिर भी कुछ न कुछ देता हूं, बाद में तो वह भी बंद हो जायेगा। उन्हें इन पैसों में से कुछ नहीं मिलेगा, क्या किसी एकाध जगह नॉमिनी बदला नहीं जा सकता। पूछना पड़ेगा। अगर दिव्या नौकरी करेगी तो उसे यहीं रहना होगा और मां-पिताजी अपना घर छोड़कर यहां आयेंगे नहीं?&lt;br /&gt; फिर ख्याल आता है, क्यों सोच रहा हूं मैं यह सब? अभी तो पता नहीं, इलाज शुरू भी हुआ है या नहीं। अभी तो नहीं मर रहा। क्या पता एकदम ठीक हो जाऊं। इन रिपोर्टों में भी जिस शब्दावली में मेरा रोग और निदान लिखा है, मुझे समझ कहां आयी है। मुझे सोच-सोचकर अपना खून नहीं जलाना चाहिए।&lt;br /&gt; आंखें बंद करता हूं, फिर वही ख्याल... अपने-पराये... मरना... दिमाग में टूटे-फूटे वाक्य बन-बिगड़ रहे हैं। मानस पटल पर सबके चेहरे आ-जा रहे हैं। मां... दिव्या... पिताजी... अपने होने वाले बच्चे का चेहरा... कैसा होगा... यार-दोस्त...। सिर झटकता हूं। उठकर पानी पीता हूं। यह क्या हो रहा है मुझे... मैं... मैं... मुझे आराम क्यों नहीं मिल रहा... कोई है... मुझसे बात करो... मेरी सारी बातें नोट करे कोई... मैं... अकेला नहीं रह सकता... मुझे कोई... बोलने वाला... सुनने वाला चाहिए... अरे... कोई है...? कहां है... नर्स... कितने बजे हैं... कौन-सी तारीख है... महीना... साल... डॉक्टर कब आयेगा मां... मां... मैं यहां हूं मां... मुझे कुछ दिखायी क्यों नहीं दे रहा... किसकी चिट्ठी है... कौन आया है... कौन-कौन आ रहा है... जो भी आये... जल्दी आये... तुंत... मैं सबसे मिलना चाहता हूं। गले मिलना... पिताजी आ रहे हैं... लेकिन मां उन्हें अकेले... नहीं आने देगी... वह भी आयेगी... लेकिन मां तो सब कुछ भूल जाती है... मुझे पहचानेगी क्या या गुमसुम बैठी रहेगी... दोनों आयेंगे। पेंशन के चैक के बदले किसी से उधार लेकर...। भाई आयेंगे... भाभियां आयेंगी... कुछ भी हो... मुझसे स्नेह रखती हैं... सब...। बहनें आयेंगी... सारी तकलीफों के बावजूद... कब से नहीं मिला हूं उनसे। दीपा... उसका पति अजय... उनकी नन्हीं-सी बच्ची... क्या नाम है... करिश्मा... और संध्या... उसका गोल-मटोल गोपू... लेकिन अब उसे उठाकर ऊपर... उछाल नहीं पाऊंगा... सब दोस्त आयेंगे... उमेश, देशी, गामा, फिर... मामा आयेगा... सबके सुख-दुख में सबसे पहले पहुंचता है... दिव्या तुम... तो यहीं हो न... मेरे सिरहाने... कहीं जाना नहीं दिव्या... नहीं मुझे दवा नहीं चाहिए... तुम यहीं मेरे पास बैठकर...स्वेटर और ख्वाब... बुनती रहो... अनन्त काल तक... मुझे... कुछ नहीं होगा... इस घड़ी में अभी... बहुत चाभी बाकी है... अभी तो मेरा बच्चा... उसका नामकरण... बर्थ डे पार्टी... तालियां...।&lt;br /&gt; दिमाग को एक तेज झटका लगता है। मैं यह सब क्या देख रहा था? आस-पास देखता हूं। अभी भी रात है। नर्स अभी तक नहीं आयी। दवा...पानी... फाइल अभी भी फर्श पर गिरी पड़ी है... उठाऊं। उठने की कोशिश करता हूं। टाल जाता हूं। उसमें लिखा बदल थोड़े ही गया होगा।&lt;br /&gt; लेकिन अगर मैं किसी को भी न बुलवाऊं तो...? अस्पताल में तो देखभाल हो ही जायेगी। यहां हमेशा तो नहीं रहना होगा... और फिर दर्द हर समय तो नहीं उठेगा? इलाज तो चलता रह सकता है। मैं सबको प्यार करता हूं। सबको इस तरह परेशान करने का मुझे क्या हक है। मेरी मरने के बाद सबके हिस्से में जो दु:ख लिखा है, वे उसे झेलेंगे ही। जीते-जी सबको क्यों रुलाऊं। जो भी आयेगा, काम-धंधा छोड़कर आयेगा। मेरी हालत देख-देखकर रोता रहेगा। जो नहीं आयेंगे, उनकी जान वहीं सूखी रहेगी। हर वक्त तार या फोन का खटका लगा रहेगा।&lt;br /&gt; जो भी झेलना है, मुझे ही झेलना है। सबको अपने साथ क्यों मारूं। सबका मोह सिर्फ मेरे लिए ही तो नहीं। मैं भी तो सबको खुश देखना चाहता हूं। सबको क्यों परेशान करूं। सबसे मिलना है, तो फिर आखिरी बार मैं ही क्यों न जाऊं सबसे मिलने? सबके पास रहूं। तब किसी को पता भी नहीं चलेगा, यह हमारी आखिरी मुलाकात है। अभी तो मेरी मौत मुझे इतना समय देगी कि सबसे मिल-जुल लूं। कुछ जी लूं। मां-बाप के पास रह लूं। दिव्या को उसके कठिन वक्त में साथ दूं। अपने होने वाले बच्चे का इंतजार करूं। उसका स्वागत करूं। खिलाऊं। उसकी मुस्कान में खुद को देखूं।&lt;br /&gt; ब्रेन ट्यूमर का क्या है। किसी को बताया न जाये तो उसे पता भी न चलेगा। कहीं ज्यादा तकलीफ हुई तो कह दूंगा - मामूली सिर दर्द है। ठीक हो जायेगा। दवाएं लेता रहूंगा। लेकिन महंगा इलाज, ऑपरेशन नहीं कराऊंगा। क्या होगा उससे? मौत सिर्फ सरकेगी। टलेगी नहीं। पैसे कहां हैं इलाज के लिए? अगर हो भी जायें तो उनसे दूसरे काम निपटाऊंगा।&lt;br /&gt; सोचकर अच्छा लग रहा है। लेकिन कर पाऊंगा यह सब? आनन्द की तरह जीना? या जीने का नाटक करना... किसी को पता भी न चले... और जब पता चले तो बहुत देर हो चुके... इतनी देर कि इलाज... खर्च... रोना... धोना... और फुलस्टॉप... कुछ भी मायने न रखें।&lt;br /&gt; दिमाग फिर थकने लगा है। दर्द की लहरें फिर माथे से टकरा रही हैं। आंखें बंद कर लेता हूं। धीरे... धीरे... नींद...।&lt;br /&gt;•&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-5794170794885376332?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/5794170794885376332/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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लिपटे अपने बच्चे का मुंह मिसेज रस्तोगी को दिखाए, उन्होंने उसे टोका, ''ठहर जरा, खाली हाथ बच्चे का मुंह नहीं देखते। पहले कुछ शगुन ले आऊं।'' कहती हुई वे भीतर चली गयीं। ड्राइंग रूम में उनके लौटने तक शारदा ने बच्चे को कालीन पर लिटा दिया है और स्टीरियो पर फड़कते गानों का एक कैसेट चढ़ा दिया है। पूछ रही है-''साहब कैसे हैं, प्रिया मेम साब कैसी हैं, संदीप बाबू कैसे हैं, आपके घुटनों का दर्द कैसा है अब?'' बच्चे को गुदगुदाते हुए शारदा पिछले डेढ़-दो महीने का हिसाब-किताब ले-दे रही है।&lt;br /&gt; ज्यों ही मिसेज रस्तोगी ने बच्चे का मुंह देखा, सकपका कर एकदम पीछे हट गयीं,''यह कैसे हो सकता है!'' सांस एकदम तेज हो गयी। माथे पर पसीना आ गया। उन्होंने शारदा की तरफ देखा, वह अपने बच्चे में मस्त है। सोफे का सहारा लेकर वे वहीं बैठ गयीं। मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। ''यह क्या हो गया! कैसे हो गया! शारदा का बच्चा और...'' उनके दिल को कुछ-कुछ होने लगा। ''भला इस बच्चे की शक्ल संदीप से कैसे मिल रही है? वही गोल चेहरा, नीली आंखें, चिबक पर काला मस्सा!'' शारदा तो एकदम काली-कलूटी है और उसके पहले दो बच्चे भी शक्ल में अपनी मां पर गए हैं। उसके मरद को भी देखा है उन्होंने, शारदा से उन्नीस-बीस ही है! तो... तो... फिर क्या यह बच्चा उनका अपना पोता है? शारदा से... इस काली-कलूटी नौकरानी से? शादीशुदा, दो बच्चों की मां से... जो घर-घर जूठे बर्तन मांजती फिरती है उससे... वे आगे सोच नहीं पायीं। एक बार फिर शारदा की तरफ देखा। उसका ध्यान अभी भी बच्चे की तरफ है। अपने राजा मुन्ना की बातें बताऐ जा रही है। वे वहां और बैठ नहीं पायीं। बच्चे के ऊपर शगुन के पैसे रखकर बधाई के शब्द बुदबुदा कर भीतर चली गयीं। यह क्या हो गया? संदीप तो... संदीप तो... उन्हें कैसे पता नहीं चला संदीप इस नौकरानी से... उन्हें कभी शक भी नहीं हुआ और मामला इतना आगे... उनका सिर घूमने लगा है।&lt;br /&gt; शारदा घर भर में घूमती फिर रही है। कह रही है-''उस लड़की ने तो घर बहुत गंदा कर छोड़ा है। मैं चार दिन में ही इसे पहले जैसा चमका दूंगी।'' चाय बनायी है उसने। एक कप उनके आगे रख दिया है। वे तेज नज़रों से शारदा की तरफ देखती हैं। नये मातृत्व से उसका चेहरा दिपदिपा रहा है। पूछना चाहती हैं - शब्द होठों तक आकर साथ छोड़ देते हैं। शारदा लगातार बोले जा रही है, ''मेरा राजा मुन्ना तो लाखों में एक है। मैं इसे बहुत बड़ा आदमी बनाऊंगी। बिलकुल तंग नहीं करता। पहले वाले बच्चों ने कित्ता सताया था मुझे।'' मिसेज रस्तोगी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा। शारदा के शब्द हथौड़े की ठक...ठक... की तरह बज रहे हैं दिमाग पर। पथराई आंखों से देख रही हैं वे। उन्होंने एकाध बार शारदा को हाथ के इशारे से चुप करना चाहा, लेकिन ऐसा भी नहीं कर पायीं।&lt;br /&gt; शारदा रसोई में चाय के बर्तन धोने गयी तो वे चुपके से जाकर एक बार फिर बच्चे को देख आयीं ''शक की कोई गुंजाइश नहीं है। उसकी नीली आंखें और गोरा रंग सारा किस्सा बयान कर रहे हैं।'' वे एक पल उसे देखती रह गयीं। हाथ आगे भी बढ़े उसे गोद में उठाने के लिए - आखिर अपना खून है - लेकिन सकपका कर पीछे खींच लिये। तेजी से अपने कमरे में लौट आयीं। उन्हें हल्की सी झलक मिली - शारदा संदीप के कमरे में उसकी फोटो के आगे खड़ी है। तो क्या...शारदा कहीं इस बच्चे को लेकर इस घर में घुसने का ख्वाब तो नहीं देख रही? क्या कर डाला है संदीप तूने! कुछ तो आगा-पीछा सोचा होता! हाथ-पांव ढीले पड़ने लगे हैं उनके। वे इंतज़ार करने लगीं-शारदा जल्दी चली जाए। उनकी रुलाई रोके नहीं रुक रही।&lt;br /&gt; चाय पीकर चली गयी है शारदा, ''काम करने कल से आऊंगी। अभी तो बाकी घरों में भी बताना है। सभी तो कंटाल गए हैं उस लड़की से।''&lt;br /&gt; तो इसका यह मतलब हुआ, अभी घंटे भर में पूरी कॉलोनी को खबर हो जाएगी कि शारदा जिस तीसरे बच्चे को गोद में लिये घर-घर बधाइयां बटोरती फिर रही है, वह प्रोफेसर वीडी रस्तोगी के होनहार सपूत संदीप रस्तोगी का है। कॉलोनी के जिस घर में भी वह जाएगी, वहीं बच्चे के कुल-वंश का पन्ना खुलकर सबके सामने आ जाएगा। सभी उसकी जन्म-पत्री बांचने लगेंगी। क्या करें, प्रोफेसर साहब को फोन करें। लेकिन वे तो तीन बजे तक ही आ पाएंगे। प्रिया को फोन पर बताएं! वह बेचारी घबरा जाएगी सुनकर। क्या करें! वे बौराई-सी घर भर के चक्कर काटती फिर रही हैं। क्या कर डाला संदीप ने। कहीं का न छोड़ा। अब कॉलोनी में बात फैलने में घंटा भर भी न लगेगा। सब थू-थू करेंगे। रिश्तेदारी है। कैंपस है। प्रिया का ऑफिस है। बातें बिना परों के सब जगह पहुंच जाएंगी। नासपीटी को यही घर मिला था बरबाद करने के लिए ! मुझे क्या पता था, इतनी बड़ी आफत पाल रही हूं। हाय-हाय करतीं वे रोये जा रही हैं।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;प्रोफेसर साहब के आते ही मिसेज रस्तोगी ने अपने सीने पर रखा पत्थर उठा कर उनके सीने पर रख दिया। सन्न रह गए वे। छी: इतनी घटिया पसंद संदीप की। ऐसी कौन-सी आग लगी हुई थी जवानी को। मुंह से बोलते तो सही जनाब। प्रिया के लिए रिश्ता ढूंढ़ने से पहले उसी के लिए लड़की देखते। जल्दी ही कुछ करना होगा। बात प्रिया की होने वाली ससुराल तक भी पहुंच सकती है। अभी तो बात भी पक्की नहीं हुई है। वे भी परेशानी की चादर ओढ़कर बैठ गए हैं। सोच रहे हैं-क्या करें। अगर यह सब सच है तो संदीप के कानपुर लौटने से पहले कुछ करना होगा। शारदा को ही यहां से हटाना होगा। उसका क्या है। कहीं भी झोपड़ी खड़ी कर लेगी। चार पैसे कमा लेगी। लेकिन यहां तो जो भी शारदा की गोद में इस बच्चे को देखेगा, हमारे खानदान पर हंसेगा। इतने बरसों में जो इज्ज़त बनायी है, उसकी गठरी उठाए - उठाए शारदा घर-घर घूमती फिरेगी। मुंह पर कोई कुछ नहीं कहेगा, लेकिन सब मज़े लेंगे। क्या करें!&lt;br /&gt; पूछा उन्होंने, ''क्या कहती हो, कुछ पैसे-वैसे लेकर वह यहां से चली जाएगी क्या? क्या करता है उसका मरद?''&lt;br /&gt; ''करता क्या है। सारा दिन दारू पी के पड़ा रहता है। जब वह काम पर जाती है तो पीछे बच्चों को संभालता है। सुना है कहीं माली-वाली है। पता नहीं यहां से जाने के लिए तैयार होगी भी या नहीं।'' तभी मिसेज रस्तोगी ने पूछा,''क्या यह नहीं हो सकता, आजकल ही में उससे बच्चा लेकर दूर किसी अनाथालय में रखवा दिया जाए। पर उसके लिए भी पता नहीं मानती है या नहीं?''&lt;br /&gt; ''कैसा था उसका रुख?''&lt;br /&gt; ''बहुत इतरा रही थी। सबके हाल-चाल पूछ रही थी, जैसे सबकी सगी वही हो। भीतर संदीप के कमरे में उसकी फोटो के आगे खड़ी थी। सुनो जी, मुझे तो एक और भी डर लगा रहा है,'' उन्होंने शंका जताई,''उसके लक्षण तो ठीक नहीं लगते। कहीं घर की मालकिन बनने के ख्वाब न देख रही हो?''&lt;br /&gt; ''तुम इतनी दूर की मत सोचो। इतना आसान नहीं है घर में घुस जाना। क्या तुम्हें पूरा विश्वास है, बच्चे की शक्ल संदीप से मिलती है!'' उन्होंने फिर आश्वस्त होना चाहा।&lt;br /&gt; ''अब मैं आपको क्या बताऊं, कल खुद देख लेना अपनी आंखों से'' वे फिर बिसूरने लगीं, ''लेकिन जो भी करना है, जल्दी करो।''&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;तीनों रात भर सो नहीं पाए। मिसेज रस्तोगी को तो रात भर खटका लगता रहा। वह आ गई है, एक हाथ में बच्चा और दूसरे हाथ में कपड़ों की पोटली लिये। उसने जबरदस्ती संदीप के कमरे पर कब्जा कर लिया है। उन्हें घर से बाहर धकेल दिया है। प्रिया पर भी वह हुक्म चला रही है। खुद मालकिन बनकर वह घर भर को सता रही है। संदीप भी हाथ बांधे एक तरफ खड़ा है। रात भर उन्हें बुरे-बुरे ख्याल आते रहे। सभी कॉलोनी वाले बधाई देने आ रहे हैं। खूब हंस रहे हैं, मज़ाक कर रहे हैं। हिजड़ों की फौज आ गयी है दरवाजे पर नाचने के लिए। बख्शीश लिये बिना टल नहीं रही। वे रात भर उठती-बैठती रोती-कलपती रहीं।&lt;br /&gt; उधर प्रोफेसर रस्तोगी रात भर करवटें बदलते रहे। ज़िंदगी में बहुत उतार-चढ़ाव देखे थे। लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ था कि पूरे खानदान की इज्ज़त ही दांव पर लग गयी हो, और वे कुछ न कर पा रहे हों।&lt;br /&gt; प्रिया तो सोच-सोचकर जैसे पागल हुई जा रही है। कैसे सामना करेगी सबकी निगाह का। बात ससुराल भी पहुंचेगी ही। ज़िंदगी भर के लिए उनके पीहर को नीचा दिखाने के लिए उन लोगों को एक बहाना मिल जाएगा। फिर ऑफिस है, लोग हैं। सभी कुरेदेंगे। जैसे-तैसे सुबह हुई। वह आयी। उसी आत्मविश्वास के साथ लापरवाही वाला अंदाज़ लिये। बच्चा गोद में। उसके आते ही सबका रक्त चाप बढ़ गया। सभी खुद को पूरी तरह व्यस्त दिखाने लगे। प्रिया एक किताब लेकर बैठ गयी। प्रोफेसर साहब कुछ फाइलें लेकर स्टडी में घुस गए। मिसेज रस्तोगी अपने जोड़ों के दर्द को लेकर हाय, हाय करती बेडरूम में जा लेटीं।&lt;br /&gt; पहले तो उसके लिए दरवाजा खोलने के लिए भी कोई नहीं आया। दो-तीन बार उसने लगातार बेल बजायी तो प्रिया उठी। दोनों की आंखें मिलीं। शारदा मुस्कराईं-''कैसी हैं मेम साब!'' प्रिया बिना कुछ बोले एक तरफ हो गयी। कुछ कह ही न पायी। शारदा धड़धड़ाती हुई अंदर चली आयी। बच्चे को कालीन पर लिटाया। स्टीरियो चलाया। ए.सी. ऑन कर दिया। फिर चाय बनाने रसोई की तरफ बढ़ गयी। इतनी देर सबकी सांस थमी रही। किसी की हिम्मत न हुई, उसे रोके-टोके। जैसे सब उसी की गिरफ्त में हों। प्रिया उस पर सबसे ज्यादा चिल्लाया करती थी। कोई उसकी चीज़ों को, खास कर स्टीरियो को हाथ लगाए - वह कत्तई बरदाश्त नहीं कर सकती थी। आज प्रिया बेबस-सी देख रही है। और शारदा के पीछे-पीछे कामों में मीनमेख निकालती घूमने वाली श्रीमती रस्तोगी - वे भी बिलकुल शांत हैं। तीनों दम साधे व्यस्तता का नाटक कर रहे हैं। घर भर में स्टीरियो की आवाज गूंज रही है। किसी की हिम्मत नहीं हो रही, उसको बंद कर दे।&lt;br /&gt; बड़ी तेजी से काम निपटाए जा रही है शारदा। बीच-बीच में आकर अपने राजा मुन्ने को भी देख लेती है। घर के कामों के साथ-साथ उसे दूध पिलाना, उसके पोतड़े बदलना सब कुछ चल रहा है। जब वह गुसलखाने में कपड़े धोने गयी तो मिसेज रस्तोगी लपककर उठीं और प्रिया और प्रोफेसर साहब को ड्राइंग रूम में ले आयीं।&lt;br /&gt; ''ओह! यह तो सचमुच संदीप पर गया है। बहुत प्यारा बच्चा है।'' प्रोफेसर साहब के हाथ भी उसे उठाने के लिए कसमसाने लगे। बड़ी मुश्किल से खुद को रोका उन्होंने। प्रिया की रुलाई फूट पड़ी। मिसेज रस्तोगी को चक्कर आ गया। वे वहीं लुढ़क गयीं। दोनों किसी तरह उन्हें उठा कर बेडरूम तक ले गए।&lt;br /&gt; जब तक वह घर में रही, सिर्फ उसी की मौजूदगी महसूस की जाती रही। बाकी तीनों काठ बने रहे। एकदम चुप। गुमसुम। मातमी उदासी ओढ़े बैठे रहे। आज प्रिया ने भी महसूस किया, उसकी निगाहें बार-बार संदीप के कमरे की तरफ उठ रही हैं। उसने संदीप का कमरा खूब अच्छी तरह झाड़ा-पोंछा। सबसे ज्यादा वक्त उसने उसी कमरे में लगाया। प्रिया ने खुद को मन-ही-मन इसके लिए तैयार भी कर लिया कि अगर शारदा संदीप के बारे में कुछ पूछती है, तो वह उसे तुंत घेर लेगी। लेकिन शारदा ने ऐसी कोई उतावली नहीं दिखायी। ढाई-तीन घंटे तक इन तीनों को बंधक बनाए रखने के बाद वह छम... छम... करती चली गयी।&lt;br /&gt; उसके जाते ही तीनों सिर जोड़कर बैठ गए हैं। पहली समस्या तो यही है कि उससे कुबूलवाया कैसे जाए। संदीप से तो बाद में भी निपट लेंगे। पहले इसका जल्दी कुछ किया जाए। अब तक तो पूरी कॉलोनी को खबर हो चुकी होगी। यह तो तय कर ही लिया गया है कि फिलहाल संदीप को कानपुर में ही कुछ दिन रहने के लिए फोन कर दिया जाए। संदीप का आना इसलिए भी ठीक नहीं है कि कहीं उसी ने शारदा का पक्ष ले लिया तो ग़ज़ब हो जाएगा। उसे फोन पर इस बारे में कुछ भी न बताया जाए।&lt;br /&gt; अगर शारदा कबूल नहीं भी करती, तो भी पहले तो यही करना है, उसे कुछ दे-दिलाकर यहां से हमेशा से चले जाने के लिए कहा जाए - आज या कल में ही। नहीं आती तो उससे बच्चा लेकर किसी अनाथालय में देने की कोशिश की जाए। कोई तीसरी तरकीब वे नहीं सोच पाए। हां, अगर वह घर में घुसने की कोई कोशिश करती है, तब तो साफ जाहिर हो जाएगा कि उसकी पहले से ही यही नियत थी और इसलिए उसने संदीप को फंसाया। उस हालत में तो उससे निपटना आसान हो जाएगा। जनमत उन्हीं की तरफ होगा।&lt;br /&gt; बात अटक गई है - फिलहाल कॉलोनी वालों की निगाह का सामना कैसे करें? बाहर आना-जाना कम ही किया जा सकता है, एकदम बंद तो नहीं। लोगों को कुछ बात रकने को मसाला चाहिए। चटकारे लेंगे। थू-थू करेंगे। अगर सब कुछ ऐसे ही चलने दिया गया तो बच्चा कल बड़ा होगा, इन्हीं गली-मोहल्लों में खेलेगा। किस-किस का मुंह बंद करते फिरेंगे?&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;शाम तक वे तीनों सिर्फ सोचते रहे, कुछ भी तय नहीं कर पाए। अब सीधे-सीधे तो शारदा से यह नहीं कहा जा सकता - देख, तूने हमारे संदीप के साथ रंग-रेलियां मनायीं। मौज की। किसने किसकों फंसाया, भूल जा। लेकिन तुम दोनों की बेवकूफियों का नतीजा अब सामने है। देखो, हम ठहरे इज्ज़तदार आदमी। बेशक यह हमारे बेटे से हुआ है लेकिन इस बच्चे की यहां मौजूदगी से हमारी इज्ज़त को बट्टा लग रहा है, इसलिए तू इसे अपने बसे-बसाए जीवन और रोजी-रोटी के आसरे को लेकर यहां से हमेशा के लिए दफा हो जा।&lt;br /&gt; कौन कहता यह सब? उनकी तो शारदा के सामने आने की हिम्मत नहीं हुई, उसकी मस्ती और लापरवाही को भी वे झेल नहीं पा रहे।&lt;br /&gt; शाम को वह फिर आयी। सबको फिर लकवा मार गया। दिन की सारी योजनाएंं धरी रह गईं। बच्चे को उसी तरह कालीन पर लिटाना, स्टीरियो चलाना, घर भर में गुनगुनाते घूमना, बच्चे की ढेरों बातें बताना, उसे दूध पिलाना, किसी न किसी बहाने संदीप के कमरे में जाना सब कुछ चलता रहा। एक नाटक की तरह वह अकेली अपना पार्ट अदा करती रही। बाकी तीनों मूक दर्शक बने रहे। न उसने संदीप के बारे में पूछा, न किसी को बात करने का मौका मिला।&lt;br /&gt; एक बार फिर वह हाथ से निकल गयी। उसके जाते ही फिर तीनों के सिर जुड़ गए - आखिर चाहती क्या है? एक तरफ तो इस घर को अपना घर समझ कर घर भर की चीज़ें इस्तेमाल करने लगी है तो दूसरी तरफ किसी किस्म की कोई मांग नहीं। जिक्र नहीं। घर भर को एक जकड़न में बांध रखा है उसने। काम छुड़वाने के लिए भी कैसे कहा जाए। बात करने का कोई सिरा तो हाथ लगे। दोनों बार उससे किसी ने बात नहीं की, लेकिन उसे परवाह ही नहीं। वह अपने बच्चे में ही मस्त है।&lt;br /&gt; कॉलोनी में सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। दो-एक औरतें बहाने से घर भी आयीं। शारदा का जिक्र भी छेड़ा। उसके वापस आने से आराम हो गया है, लेकिन वही बात नहीं कही, जिसके लिए आयीं थीं। कुछेक औरतों ने सीधे ही शारदा को कुरेदने की कोशिश की, लेकिन उसने साफ इनक़ार कर दिया है। लोग हंसते हैं - उसके मना करने से क्या है, कोई भी बता सकता है-उसकी रगों में किसका खून दौड़ रहा है। वह किसी के भी मज़ाक का जवाब नहीं देती। टाल जाती है।&lt;br /&gt; अब वह पहले की तरह गंदे कपड़ों में नहीं आती। बच्चे को एकदम साफ रखती है। अपनी हैसियत से महंगे कपड़े पहनाती है। उसके पहले दोनों बच्चे उसके साथ कभी नहीं देखे गए, लेकिन तीसरा हरदम उसकी गोद में रहता है। कुछ घरों में उसे बच्चे के लिए पुराने कपड़े देने की कोशिश की गई तो उसने लेने से सफ इनकार कर दिया। पहले यही शारदा अपने लिए और बच्चों के लिए सब कुछ मांग लिया करती थी।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;तीसरे दिन सुबह जाकर कुछ बात बनी। बनी नहीं बिगड़ गयी। उस समय प्रोफेसर साहब घर पर नहीं थे। वह आयी। बच्चे को कालीन पर लिटाया। ज्यों ही स्टीरियो चलाने के लिए मुड़ी, प्रिया एकदम बरस पड़ी-''हटा इसे यहां से। रोज़-रोज़ कालीन पर लिटा देती है। खराब होता है यह।''&lt;br /&gt; इससे पहले कि शारदा पलट कर कुछ कहे, प्रिया ने एक और फरमान जारी कर दिया,''और खबरदार जो आज से मेरे स्टीरियो को हाथ लगाया। ढंग से काम करना है तो कर वरना और कोई घर देख।'&lt;br /&gt; शारदा एकदम ठिठकी खड़ी रह गर्यी। उसे शायद इसकी उम्मीद नहीं थी। उसने बच्चे को उठाया और एक कोने में बैठ गयी। मौका सही लगा मिसेज रस्तोगी को भी। वे भी मैदान में आ गयीं-''बता कब से फंसा रख है तूने संदीप को? बोल!''&lt;br /&gt; ''क्या मतलब?'' शारदा बमकी, ''किसने किसको फंसा रखा है?''&lt;br /&gt; ''तो फिर तेरे इस छोकरे की शक्ल संदीप से कैसे मिल रही है?'' बहुत रोकने पर भी उनकी आवाज भर्रा ही गयी है।&lt;br /&gt; ''मुझे क्या पता?'' शारदा ने लापरवाही से कहा।&lt;br /&gt; ''तुझे पता नहीं तो फिर किसे पता होगा? पता नहीं कहां-कहां मुंह मारती फिरती है। हमारे सीधे-सादे लड़के को फंसा लिया है। हमें कहीं का न छोड़ा।''&lt;br /&gt; शारदा एकदम खड़ी हो गयी - ''खबरदार मेमसाब, जो मेरे चरित्तर के बारे में कुछ ऐसा-वैसा कहा तो, इत्ती देर से मैं चुपचाप सुन रही हूं और आप बोले जा रही हैं। मैं अपने काम से काम रखती हूं। फालतू लफड़ों में नहीं पड़ती।''&lt;br /&gt; ''फालतू लफड़ों में नहीं पड़ती तो बता तू कि बच्चों की शक्ल यूं ही किसी से कैसे मिल जाती है?'' अब कमान प्रिया ने संभाल ली है।&lt;br /&gt; ''मुझे क्या पता। आपको काम छुड़वाना हो तो वैसे बोल देयो। मैं अभी छोड़के चली जाती। पर मेरे कू फालतू बोलने का नईं।'' यह कहते हुए उसने बच्चे को उठाया और एकदम बाहर निकल गई।&lt;br /&gt; एक पल को तो मां-बेटी दोनों सकते में आ गयीं। यह क्या हो गया? फिर राहत की सांस भी ली। अब कम-से-कम हर वक्त छाती पर तो सवार नहीं रहेगी। एक दुविधा जरूर खड़ी हो गयी है। उससे संवाद की जो स्थिति पैदा हुई थी, वह एकदम हाथ से निकल गयी। इतनी मुश्किल से हाथ आया मौका दोनों ने खो दिया। अब न तो उससे यह ही कहा जा सकता है कि कॉलोनी छोड़ के चली जा और न ही उससे बच्चा मांगा जा सकता है। उसके तेवर देखकर तो यही लगता है -आसानी से हाथ धरने नहीं देगी। अलबत्ता, यह साफ हो गया कि इस घर में घुसपैठ करने का उसका कोई इरादा नहीं है।&lt;br /&gt; जब प्रोफेसर साहब को पूरी बात पता चली तो वे झल्लाए, ''तुम लोगों को ज़रा-सा भी सब्र नहीं था? जान-बूझकर पूरी बाजी उलट दी है। उसने अगर अपनी मर्ज़ी से काम पर आना बंद कर दिया तो उसे कुछ कहने-सुनने का हमारा कोई हक ही नहीं रहेगा।''&lt;br /&gt; शारदा ने वाकई काम पर आना बंद कर दिया है। बाकी घरों में उसी मुस्तैदी से बच्चे को लिये-लिये घूम रही है। भीतर-ही-भीतर चल रही सुगबुगाहट अब और मुखर हो गयी है। लोगों को अब पूरा विश्वास होने लगा है।&lt;br /&gt; बहुत सोच-समझकर और अपने आप को हर तरह से तैयार करके प्रोफेसर रस्तोगी रात के अंधेरे में शारदा की झोंपड़ी में गए हैं। इतने पैसे ले कर, जितने शारदा दस सालों में भी न कमा सके। लेकिन शारदा पैसे देखते ही भड़क गयी, ''किस बात के पैसे? जब काम करती थी, पैसे लेती थी। मेहनत-मजूरी करती हूं। करती रहूंगी। मैं क्यों जाऊं यहां से? कहां जाऊं?''&lt;br /&gt; प्रोफसर साहब ने जब उसके तेवर देखे तो एक और चारा डाला - इतने पैसे और ले लो और यह बच्चा हमें दे दो। हमेशा के लिए। यह सुनते ही शारदा इतने ज़ोर से चिल्लायी कि सारी बस्ती सुन ले-''साफ-साफ सुन लो साब - यह बच्चा मेरा है। सिर्फ मेरा। मैं इसे किसी कीमत पर नहीं दूंगी। समझे। अगर आप लोगों को शक है कि यह संदीप बाबू का है तो आप जाकर उन्हीं से क्यों नहीं पूछते? कहां छुपा रखा है उन्हें?'' दनदनाती हुई वह अपनी झोंपड़ी में घुस गयी।&lt;br /&gt; प्रोफेसर साहब पूरी तरह टूटे हुए, अंधेरे में ठोकरें खाते हुए वापस लौट रहे हैं। सोच रहे हैं - कल-परसों में ही घर बदलकर किसी और कॉलोनी में रहने चले जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; *****&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-6546423222683086854?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/6546423222683086854/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=6546423222683086854&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5913688233422255937/posts/default/6546423222683086854'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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से मद्रास बंद। स्टेशन पर कोई ऑटो, टैक्सी नहीं। ऑफिस की गाड़ी आकर कब की चली गयी होगी। किस्मत से सहयात्री मिलीटरी वाला है। उसी की जीप में लिफ्ट लेकर होटल तक पहुंच पाया हूं।&lt;br /&gt; अब एक पूरा बेकार, खाली-सा दिन मेरे सामने पसरा पड़ा है। बाहर जा नहीं सकता। इन बंद वालों को बस आज ही का दिन मिला था। पहले पता होता तो आता ही नहीं आज। पर अब क्या करूं। आज शनि है। कल रवि। यानी सोमवार तक मुझे यूं ही वक्त गुजारना है। समझ में नहीं आ रहा - क्या करूं।&lt;br /&gt; कुछेक फोन ही कर लिये जायें। टेलीफोन डाइरेक्टरी मंगवाता हूं। लोकल ऑफिस के मैनेजर के घर फोन करके अपनी पहुंच की खबर देता हूं। बताते हैं वे, ड्राइवर तीन-चार घंटे इंतजार करता रहा स्टेशन पर। फिर बंद वालों ने भगा दिया। उन्हें यह जानकर तसल्ली होती है, होटल में ठीक-ठाक पहुंच गया हूं। अपने कामकाज के सिलसिले में पूछता हूं। बताया जाता है मुझे - आज तो कोई मिलने भी नहीं आ पायेगा। अलबत्ता, कल सुबह ही वे किसी के साथ गाड़ी भिजवा देंगे, घूमने-फिरने के लिए।&lt;br /&gt; अब! फिर वही सवाल। इस अजनबी शहर में, `बंदोत्सव' में मैं करूं तो क्या करूं। याद आया, अरे, बनानी से भी तो मिलना है। मन एकदम रोमांचित हो आया। सारे रास्ते तो उसके ख्यालों ने व्यस्त रखा लेकिन मेरा सारा रोमांच क्षण भर में गायब हो गया। इस समय तीन बजे हैं। वैसे भी जब पूरा मद्रास बंद है तो युनिवर्सिटी भी तो बंद होगी। उसके घर का पता कहां है मेरे पास। डाइरेक्टरी देखता हूं। युनिवर्सिटी के नम्बरों में न तो अंग्रेजी विभाग का डाइरेक्ट नम्बर है, न ही विभाग के हेड का नाम या उसका रेसिडेंशियल नम्बर। बनानी के नम्बर का तो सवाल ही नहीं उठता। काश! उससे आज मुलाकात हो जाती तो कितने अच्छे कट जाते ये दो दिन।&lt;br /&gt; अब तो परसों तक इंतज़ार करना पड़ेगा, ``कैसे तलाशा जाये आपको इस महानगरी में मिस बनानी चक्रवर्ती? किसी को भी तो नहीं जानते हम इस अजनबी शहर में मैडम। आपको खोज भी लेते हम, लेकिन यह ''बंद'।''&lt;br /&gt; यूं ही डाइरेक्टरी के पन्ने पलटता हूं- ''सी' और ''सी' में चक्रवर्ती। अचानक सूझता है मुझे - थोड़ी-सी मेहनत की जाये तो बनानी को आज और अभी भी ढूंढ़ा जा सकता है। आज पता भर चल जाये तो मुलाकात कल भी की जा सकती है। है तो बेवकूफी भरा तरीका, लेकिन किसी को पता थोड़े ही चलेगा, इस तरफ कौन है। ऐसा हो ही नहीं सकता, यहां का बंगाली समुदाय और उनमें से भी चक्रवर्ती, बनानी को न जानते हों। आखिर कितनी होंगी ऐसी बंगाली लड़कियां मद्रास में, जो युनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाती हों और बंगला में लिखती हों। हिसाब लगाता हूं - पूरे मद्रास में पच्चीस तीस हजार के करीब बंगाली होंगे। उनमें भी चक्रवर्ती होंगे, हजार से भी कम। और टेलीफोन डाइरेक्टरी बताती है - कुल 42 चक्रवर्तियों के पास फोन हैं। इन्हीं से पूछकर देखा जाये तो। न भी मिले, कुछ वक्त तो गुजरेगा। तीस-चालीस रुपये में यहीं बैठे-बैठे बनानी का पता चल जाये तो उससे बढ़कर क्या हो सकता है आज के दिन। हो सकता है, इन्हीं में से किसी परिवार में ही हो वह। वैसे डाइरेक्टरी में कोई बनानी चक्रवर्ती नहीं है। तो यह शरारत भी करके देख ली जाये।&lt;br /&gt; पहले चक्रवर्ती से शुरू किया है। एक... तीन... पंद्रह... सत्ताइस... पैंतीस... और ये बयालीस। कुल पचास मिनट लगे और पैंतीस जगह बात हुई बाकी नम्बर दुकानों, ऑफिसों के हैं या लाइन नहीं मिली। हंसी आ रही है खुद पर-हर तरह की आवाजें, प्रतिक्रियाएं, गालियां, हंसी। फोन पटके गये। होल्ड कराया गया, पागल करार दिया गया मुझे। बेहद भले लोग, लेकिन नतीजा जीरो। ''हां, नाम सुना तो है, देखा भी है, पन किधर रहती, मालूम नहीं। आर यू क्रेजी, इज इट द वे टू लोकेट ए गर्ल, नो... नो... नो... ऑवर बनानी इज ओनली एट ईयर्स ओल्ड... यहां बनानी है, बट वह हमारा वाइफ है। वह कभी टीचर नहीं थी। हू आर यू... यू मैड मैन... विच बनानी चक्रवर्ती? यू मीन दैट गर्ल...डॉटर ऑफ  प्रोताश चक्रवर्ती, बट शी इज टीचर इन प्राइमरी स्कूल...''.&lt;br /&gt; मज़ा आ रहा है मुझे। कल तक पूरे शहर के बंग समाज में यह खबर फैल जायेगी - कोई सिरफिरा बम्बई से आया है और किसी बनानी चक्रवर्ती को खोज रहा है। एक - एक घर में फोन करके। क्रेजी फैलो। डाइरेक्टरी एक किनारे रख दी है। तो इन सब चक्रवर्तियों में हमारी वाली बनानी को कोई नहीं जानता। नहीं जानता का यह मतलब तो नहीं कि वह है ही नहीं। हो सकता है जो नम्बर नहीं मिले, वहीं हो। कुल मिलाकर एक मज़ेदार एक्सरसाइज हो गयी। न सही आज मुलाकात, परसों युनिवर्सिटी तो खुलेगी। उसे बताऊंगा इस बारे में कितना हंसेगी।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;अजीब गोरख धंधा है इस युनिवर्सिटी का भी। दस जगह फोन करके भी कुछ पता नहीं चल पाया है बनानी का... कहीं कोई तमिल भाषी बैठा होता है तो कहीं कोई कुछ बताये बिना ही फोन रख देता है। हार कर अपने स्थानीय साथी से अनुरोध करता हूं-अंग्रेज़ी विभाग की बनानी चक्रवर्ती से बता करा दें जरा। वे भी कई जगह फोन करते है। अधिकतर तमिल में ही बात करते हैं। बताते हैं - युनिवर्सिटी गर्मियों की छुट्टियों की वजह से बंद है और दूसरे, अंग्रेजी विभाग में इस नाम की लेक्चरर नहीं है। ''अरे, तो फिर कहां गयी बनानी, राघवेन्द्र ने तो सिर्फ यहीं का पता दिया था। अब वह वहां है नहीं। पता नहीं मद्रास में भी है या नहीं। कैसे पता लगाया जाये। उसकी शक्ल, सूरत, पता-ठिकाना, घर-परिवार कुछ भी तो पता नहीं।''&lt;br /&gt; सोच रहा हूं - यूनिवर्सिटी छोड़कर कहां गयी होगी। फिर उसका यह पता भी तो तीन साल पुराना है। बता तो रहा था राघवेन्द्र, तीनेक साल से सम्पर्क छूटा हुआ है। हो सकता है इस बीच कलकत्ता लौट गयी हो या शादी कर ली हो। कुछ तो पता चले। अगर यहीं है तो मिलने की कोशिश की जाये और नहीं है तो किस्सा ही खत्म। अपने साथी से फिर अनुरोध करता हूं - ज़रा फिर फोन करके अंग्रेज़ी के हेड का नाम, पता और फोन नम्बर पुछवा दें। वे ही शायद बता सकें, बनानी अब कहां है। वे फिर दो-चार बार नम्बर घुमाते हैं। आखिर हेड का नाम, पता लोकेट कर ही लेते हैं - डॉ. वाणी कुंचितपादम। अब मैं उनके घर का नम्बर मिलाता हूं। इंगेज आ रहा है लगातार। असिस्टेंस सर्विस की मदद लेता हूं - फिर भी नहीं मिलता। लगता है फोन खराब है। सोचता हूं, खुद ही उनके घर की तरफ निकल जाऊं। वैसे भी यहां शाम को कुछ करने-धरने को नहीं है।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;मज़ेदार किस्सा बन गया है बनानी का। सिर्फ छ: शब्दों के तीन साल पुराने पते के सहारे उसकी तलाश कर रहा हूं इतने बड़े शहर में। न मुझे जानती है, न मैं उसे जानता हूं। दो दिन पहले तक नाम भी नहीं सुना था उसका। कभी राघवेन्द्र को मिली थी। ऑथर्स गिल्ड की कॉन्फ्रेंस में। तीन-चार साल हुए। तभी दोनों का परिचय हुआ था। बातें हुई थीं। किताबों का आदान-प्रदान हुआ था। पांच-सात पत्र भी आये-गये, फिर नौकरियां बदलने के चक्कर में दोनों का सम्पर्क लगभग छूट गया था। अब मेरी मद्रास ट्रिप से राघवेन्द्र को बनानी की याद ताजा हो आयी। चलते वक्त कहा था राघवेन्द्र ने - तुझसे झूठ नहीं कह रहा हूं शेखर, बहुत ही जहीन और मैच्योर लड़की थी यार। ब्रेन एण्ड ब्यूटी का अद्भुत ब्लैण्ड। उस लड़की में गज़ब का आकर्षण था कि आप उसे इग्नोर कर ही न सकें। अगर तुम्हारी मुलाकात हो जाये तो तुम्हारी यात्रा सार्थक हो जायेगी।&lt;br /&gt; अब जैसे-जैसे उससे मुलाकात में देर हो रही है, या मिलने की संभावना कम हो रही है, उससे मिलने की ललक उतनी ही बढ़ने लगी है। कल बाजार में घूमते हुए, किताबों की दुकान में वक्त गुजारते हुए और शाम को मरीना बीच पर अकेले टहलते हुए एक सुखद-सा ख्याल आता रहा। हो सकता है, वह भी यहीं कहीं, आस-पास हो। कोई उसे उसके नाम से पुकारे और...फिर तेजी से ख्याल झटक दिया - मैं भी फिल्मी स्टाइल में सोचने लगा हूं। पहले दिन तो फोन करके उसे तलाशने की बेवकूफी करता रहा और अब उसे सड़कों, चौराहों पर खोज रहा हूं।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;डॉ. वाणी कुंचितपादम का घर ढूंढ़ने में खासी परेशानी हुई। ''मैडम घर पर नहीं हैं। आधे घंटे में आ जायेंगी, आप बैठिए।'' उनके पति बताते हैं। मेरे पास इतनी दूर आकर इंतज़ार करने के अलावा कोई उपाय नहीं है। वे दो-चार बार कुरेदते हैं, लेकिन मैं टाल जाता हूं, मैडम से ही काम है। वे ड्राइंगरूम में मुझे अकेला छोड़कर गायब हो गये हैं। टिपिकल तमिल साज-सज्जा, तस्वीरें, तमिल पुस्तकें, पत्रिकाएं, लगता ही नहीं, इंग्लिश की हेड के घर बैठा हूं।&lt;br /&gt; वे आयीं। सामान से लदी-फंदीं। मुझे देखकर चौंकती हैं। आने का कारण जानकर राहत की सांस लेती हैं। बताता हूं। फोन पर ही पूछना चाहता था, पर... हां, फोन कई दिन से खराब पड़ा है। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा, एक अनजान लड़की का पता लगाने के लिए कोई इतनी मेहनत कर सकता है। बताती हैं - अब वह युनिवर्सिटी में नहीं पढ़ाती। दो साल से भी ज्यादा हो गये। यहां वह लीव रिज़र्व थी। एक और सदमा मेरे लिए। ''बता सकती हैं कहां होंगी आजकल? '' एक आखिरी कोशिश। ''हां, हां, क्यों नहीं।'' वे बताती हैं, बनानी मद्रास में ही है। सेंट जेवियर्स आर्ट्स कॉलेज में पढ़ाती है। वहां वह कन्फर्म हो गयी है। अरे, तो बनानी अभी भी संभावना है। मैं हल्का-सा खुश हो गया हूं। यहां आना बेकार नहीं गया, लेकिन वे बनानी के घर का पता नहीं बता पातीं। अलबत्ता, सेंट जेवियर्स का पता बता देती हैं। वहां इकॉनोमिक्स के हेड हैं मिस्टर पद्मनाभन, उनसे मिलने की सलाह देती हैं। वहीं कॉलेज क्वार्टर्स में रहते हैं।&lt;br /&gt; उनसे विदा लेता हूं। वे अभी भी मुझे अविश्वास से देख रही हैं - एक अपरिचित लड़की के लिए... इतनी भागदौड़... दरवाजे पर आकर हाथ जोड़कर विदा करती है। &lt;br /&gt;होटल वापस आते-आते रात हो गयी है। तय करता हूं, कल किसी वक्त जाऊंगा। आज सात में से तीन दिन बीत चुके हैं।&lt;br /&gt; जितना वक्त बीतता जा रहा है, उतना ही यह सवाल मैं खुद से बार-बार पूछने लगा हूं - क्यों मिला चाहता हूं उससे! क्यों एक अनजान लड़की के लिए इतनी भागदौड़ कर रहा हूं। एक ऐसी लड़की के लिए, जो मुझे जानती तक नहीं और जान भी ले तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि यह पहचान परिचय तक भी पहुंचेगी या नहीं। माना, बनानी एक संवेदनशील रचनाकार है, मैच्योर है, पढ़ी-लिखी है, उससे बात करना अच्छा लगेगा, लेकिन उस जैसी तो सैकड़ों हैं, हज़ारों हैं, तो क्या सबसे... फिर पूछता हूं खुद से। इतनी-इतनी तो मित्र हैं पहले से, फिर एक और की तलाश क्यों, क्या एक शादीशुदा, सुन्दर व पढ़ी-लिखी बीवी के पति, दस साल की बच्ची के पिता, एक छोटे-मोटे अफसर और छोटे-मोटे लेखक को यह शोभा देता है कि वह एक मित्र के कहने भर से उसकी मित्र की तलाश में मारा-मारा फिरे। जितना सोचता हूं, उलझन बढ़ती ही जाती है।&lt;br /&gt; अगर उससे पहले ही दिन मुलाकात हो जाती तो राघवेन्द्र का पत्र देकर छुट्टी पा लेता। वह फिर मिलना चाहती तो मिल भी लेता, लेकिन उसने न मिलने से जो यह उत्सुकता और बढ़ती जा रही है उससे मिलने की, उससे मेरी दुविधा ही बढ़ रही है और फिर राघवेन्द्र ने चिट्ठी भी तो इतनी आत्मीयता से लिखी है कि मन करने लगा है - इस लड़की से मुलाकात होनी ही चाहिए। उस कवि-मन अनदेखी युवती के प्रति एक अनचीन्हा-सा अनुराग जागने लगा है। फिर राघवेन्द्र की उसके नाम लिखी चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगा हूं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बम्बई, 29 मई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रिय बनानी,&lt;br /&gt; बहुत लम्बे अरसे से तुमसे मेरा पत्राचार छूट गया है, पर तुम्हारे भीतर के संवेदनशील रचनाकार की छवि मेरे मन में अभी भी वैसी ही है। मन है, तुमसे मिलना हो, खूब बातें हों और लम्बे अन्तराल की उपलब्धियों की पोटलियां खोली, दिखायी जायें। मन खुशियों से सराबोर हो जाये। प्रिय शेखर मेरे अभिन्न मित्र, भाई और प्रखर संभावनाशील कथाकार हैं। और उससे भी कहीं अधिक एक प्यारे भाई, अंतरंग और मेरे सहचर। उनकी रचनाएं ज़रूर तुम्हारी नज़रों से गुज़री होंगी। अचानक पता चला कि मद्रास जा रहे हैं तो तुम्हारी याद आना बहुत स्वाभाविक है। इनके साथ तुम्हारे सुख-दु:ख की पहचान मेरे पास वैसे ही पहुंच जायेगी, जैसे कि तुम इनसे मिलोगी। शायद नये शहर में तुम्हारा संवेदनशील व्यक्तित्व इन्हें बहुत अपनत्व देगा।&lt;br /&gt; मेरे नाम खत लिखना और शेखर के हाथ भेज देना। मैं लगातार नौकरियों के चक्कर में भटकता रहा। जल्दी ही तुम्हें अपना पता लिखूंगा। बहुत भाग दौड़ के कारण ही पत्राचार में तुमसे पिछड़ गया। बाकी, तुम्हारी उपलब्धियों को बहुत पास से देखते का मन है।&lt;br /&gt; और क्या लिख रही हो। क्या कर रही हो। आगे क्या इरादा है। कलकत्ता में परिवार कैसा है। पत्र दोगी और ढेरों बातें लिखोगी। सकुशल होगी। नमस्कार।&lt;br /&gt;सस्नेह तुम्हारा&lt;br /&gt;राघवेन्द्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस पत्र के एक-एक शब्द के पीछे एक खूबसूरत, शालीन चेहरा झिलमिलाता दिख रहा है। अलौकिक सौन्दर्य से दिपदिपाता। संवेदनशील व्यक्तित्व। इस पत्र के ज़रिये और जो कुछ राघवेन्द्र ने बताया था, उसके आधार पर मैंने बनानी के रूप, सौन्दर्य, व्यक्तित्व, स्वभाव और यहां तक कि उसकी बौद्धिकता और कलात्मक अभिरुचि की भी एक तस्वीर-सी बना ली है। मन है, जब भी उससे मिलूं, अपनी कल्पना के अनुरूप पाऊं।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;सेंट जैवियर्स में पहुंचने पर पता चला है, पद्मनाभन जी नहीं हैं। सपरिवार कुल्लू-मनाली गये हैं। अगले हफ्ते आयेंगे। पता नहीं क्यों, बहुत अधिक निराश नहीं करती यह खबर। शायद पूरी स्थितियां ऐसी बनती चली जायेंगी कि बनानी से मुलाकात नहीं ही होगी। या तो मैं अधबीच कोशिश छोड़ दूंगा, या कोई और कारण आ निकलेगा। वहां से लौटने को हूं कि वहीं कोई और प्राध्यापक मिल गये हैं। बताते हैं-बनानी यहीं पढ़ाती हैं। पक्का तो पता नहीं, लेकिन शायद एग्मोर में वाइ.डब्ल्यू.सी.ए. के हॉस्टल में रहती हैं। वहीं एक बार पता करके देख लें। उनका बहुत-बहुत आभार मानता हूं।&lt;br /&gt; तो! अब!  सड़क पर खड़ा सोच रहा हूं-तो मिस बनानी चक्रवर्ती, आप हमें मिले बिना जाने नहीं देंगी। घड़ी देखता हूं-साढ़े आठ। वहां पहुंचते-पहुंचते नौ बज जायेंगे। क्या एक शरीफ लड़की से पहली बार उसके हॉस्टल में मिलने जाने का वक्त है यह। क्या पता, स्टाफ ही न मिलने दे। लेकिन अब जब पता चल गया है उसका, तो मिल ही लिया जाये। जो भी होना है, आज ही हो ले। मिले या न मिले। आज ही निपटा दिया जाये यह मामला। वैसे भी वापसी में सिर्फ तीन दिन बचे हैं।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;वहां अगला सदमा मेरा इंतज़ार कर रहा है। इस नाम की कोई लड़की यहां नहीं रहती। मुझे अजीब-सा महसूस होने लगा है। एकदम तेज प्यास लग आयी है। यह क्या मज़ाक है। बीच-बीच में अचानक यह क्या हो जाता है कि वह एक जगह होती है और दूसरी जगह से गायब हो जाती है। फिर अगली जगह फिर प्रकट हो जाती है। क्लर्क से पूछता हूं-जरा अच्छी तरह देखकर बताएं - शायद कुछ अरसा पहले तक रहती रही हो। वह मुझे अजीब निगाहों से घूरता है। मैं उसकी परवाह नहीं करता। यह आखिरी पड़ाव है जहां बनानी को होना चाहिए। अगर वह यहां नहीं है तो फिर कहीं नहीं है। वह रजिस्टर के पन्ने पलट कर मना कर रहा है - इन्द पोन इंगे इरकरदिल्ले... यहां नहीं रहती यह लड़की।&lt;br /&gt; अब मैं इस हॉस्टल के रिसेप्शन में रुकने-न रुकने की हालत में खड़ा हूं। क्लर्क फूट लिया है। हो सकता है, बनानी यहीं रहती आयी हो, अब न रहती हो। इन गर्ल्स हॉस्टलों के नियम भी तो कुछ ऐसे ही होते हैं। ज्यादा-से-ज्यादा एक साल, दो साल। क्लर्क ने भी तो यही कहा है, नहीं रहती। अगर रहती थी तो अब कहां गयी। कुछ तो पता चले। लेकिन पूछूं किससे। इतने में मुझे दुविधा में देख एक लड़की खुद आगे आयी है - किसे पूछ रहे हैं सर?&lt;br /&gt; उसी के सामने पूरा किस्सा बयान करता हूं। यह भी पूछता हूं कि इसी संस्था का और कोई भी हॉस्टल है क्या आस-पास। बताती है लड़की - हॉस्टल तो यही है अलबत्ता, बनानी... दो-एक लड़कियां और जुट आयी हैं। वहीं रिसेप्शन में इंतज़ार करने के लिए कहती हैं - अभी पता करके बतायेंगी, पुरानी हॉस्टलर्स से, आया से, वॉचमैन से।&lt;br /&gt; मैं अजीब-सी हालत में वहीं बैठा हूं। यह मैं क्या कर रहा हूं। यह कौन-सा तरीका है किसी को खोजने का? दिमाग खराब हो गया है क्या? मिल भी गयी वह तो कौन-सी क्रांति हो जायेगी। मैं ही तो सारे कामकाज छोड़कर उससे मिलने के लिए मारा-मारा फिर रहा हूं। अगर मिल भी गयी और उसने ''ओह, थैंक्स, सो नाइस ऑफ यू। आप आये, बहुत अच्छा लगा'' कहकर संबंध पर, मुलाकात पर वहीं फुल स्टॉप लगा दिया तो। क्या कर लूंगा मैं तब?&lt;br /&gt; मैं एक झटके से उठ खड़ा होता हूं। नहीं मिलना मुझे उससे। अब और बेवकूफी नहीं करूंगा। चलने को ही हूं कि एक लड़की भागती हुई आयी है - सर आप ही... मिस बनानी से... मैं उसकी तरफ देखता हूं - तो... क्या... यह लड़की... बनानी... ''सर, वह मेरी रूममेट थी। अब यहां नहीं रहती। उसके एक अंकल ट्रंसफर होकर आये थे, दो-तीन महीने पहले। अब वह उन्हीं के साथ रहती है, मइलापुर में।''&lt;br /&gt; लो। एक और पता। लम्बी सांस लेता हूं। चलो यही सही। उससे पता पूछता हूं, पता उसके पास नहीं है। सिर्फ उसे छोड़ने गयी थी टैक्सी में। तभी देखा था उसके अंकल का फ्लैट। हां, लोकेशन बता सकती है। वह कागज पर ड्रा करके लोकेशन बताती है। सेंथोम चर्च। उसके ठीक सामने एक तिमंजिली इमारत। बिलकुल सफेद रंग की। ग्राउण्ड फ्लोर पर बायीं तरफ का पहला फ्लैट। दरवाजे पर पीतल की नेम प्लेट। अंकल का नाम याद नहीं, लेकिन वे भी चक्रवर्ती। काफी है मेरे लिए। जाऊं या न जाऊं, बाद की बात है।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;अब वापसी में सिर्फ दो दिन बचे हैं। फिर दुविधा में पड़ गया हूं। जाऊं या नहीं। कल दोबारा उन्हीं स्थानीय लेखक मित्रों से मिलने चला गया, जिनसे तीन दिन पहले ही मिला था। वही-वही समस्याएं, वही-वही रोना कि यहां सबसे अलग-थलग बैठे हैं, हमारे लिखे को कोई नोटिस नहीं लेता। और रचनाओं के नाम पर सब कुछ बासी पुराना-पुराना-सा। आज खाली हूं। फिर बनानी के ख्याल आ रहे हैं। अब भी मिलने नहीं गया तो अफ़सोस होता रहेगा। इतनी कोशिश की, भागदौड़ की और मंज़िल का पता पूछकर लौट आया। फिर राघवेन्द्र सुनेगा तो हंसेगा।&lt;br /&gt; दूसरा मन कहता है - अब बचे ही सिर्फ दो दिन हैं। अगर इन दो दिनों में दो बार भी मुलाकात हो जाये तो गनीमत। अब तो घर-परिवार में है। पता नहीं कैसे लोग हों, घर पर कौन-कौन हों? लेकिन एक आखिरी कोशिश करके देख लेने में हर्ज क्या है? तय कर लेता हूं, जाना ही चाहिए।&lt;br /&gt;• &lt;br /&gt;घर बिलकुल आसानी से मिल गया है। दरवाजे पर साफ-सुथरी चमकती हुई पीतल की नेम प्लेट लगी है-डॉ.चंदन चक्रवर्ती। घंटी पर हल्के से हाथ रखता हूं। थोड़ा इंतज़ार। अब यहां पहुंचकर भी वह पहले वाली ऊहापोह नहीं रही है, जो चार-पांच दिन पहले तक थी। इतना तो भटका दिया है इस लड़की ने कि मिलने न मिलने के बीच का अंतराल ही मिट गया है।&lt;br /&gt; दरवाजा एक महिला ने खोला है, निश्चय ही आंटी होंगी, नमस्कार करके बतलाता हूं - बम्बई से आया हूं, बनानी और मेरे एक कॉमन फ्रेण्ड हैं राघवेन्द्र। यहां आ रहा था तो उन्हीं ने पता दिया था बनानी का। पूछते-पूछते यहां तक आ पहुंचा हूं।&lt;br /&gt; वे बड़े प्यार से अंदर बुलाती हैं। बिठाती हैं। दो-एक घरेलू नाम पुकारती हैं। पल भर में उनके पति और दो लड़कियां ड्राइंग रूम में आ जुटे हैं। लड़कियों को देखकर सोचता हूं-कौन-सी होनी चाहिए बनानी इनमें से। एक लम्बी-पतली-सी है, घने बाल, आंखों पर चश्मा, हाथ में किताब, दूसरी गाउन में है। शायद रसोई का काम छोड़कर चली आयी है। थोड़ी सांवली, दूसरी से बड़ी, खूबसूरत चेहरा-मोहरा, पहली ही नज़र में जहीन होने का सुबूत देता हुआ।&lt;br /&gt; महिला उन्हें मेरे बारे में बताती है, सबको आश्चर्य होता है मेरा इतना सोमांचकारी खोज अभियान सुनकर। मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी है - बताया क्यों नहीं जा रहा - इनमें से बनानी कौन-सी है। वैसे मेरी ख्याल से गाउन वाली ही होनी चाहिए। या क्या पता, इन दोनों में से हो ही नहीं।&lt;br /&gt; आंटी पहले बंगला में शुरू करके, फिर हिन्दी में बताती हैं - बनानी कलकत्ता गयी हुई है। उसकी मां का ऑपरेशन हुआ था, उसके लिए गयी थी। इसी सण्डे रात को वापस आ रही है। आप मण्डे आयेंगे तो ज़रूर मुलाकात हो जायेगी, आप ज़रूर आना।&lt;br /&gt; ''तो मिस बनानी चक्रवती।' मैं आखिरी झटके से उबरने की कोशिश करता हूं - आप नहीं ही मिलीं। मन-ही-मन मुस्कराता हूं। अब इन लोगों को कैसे बताऊं कि मेरी गाड़ी के जाने का वक्त भी लगभग वही है, जो बनानी के आने का है।&lt;br /&gt; चलने के लिए उठता हूं, लेकिन आदेश सुना दिया गया है - डिनर के बिना नहीं जाने दिया जायेगा। बनानी नहीं है तो क्या हुआ, घर तो उसी का है।&lt;br /&gt; बैठ जाता हूं। अब सबसे परिचय कराया जाता है। छोटी वाली बरखा बी.ए. में, बड़ी वाली श्यामली एम.ए.में। दोनों बनानी दी की जबरदस्त फैन। श्यामली भी लिखती है। छपी भी हैं उसकी रचनाएं। ये लोग कई साल इलाहाबाद रहे हैं, इसलिए कई लेखकों से परिचय रहा है।&lt;br /&gt; शुरू-शुरू में अटपटा महसूस करता रहा, लेकिन जब पूरा चक्रवर्ती परिवार इतने सहज, आत्मीय और खुलेपन के साथ बात करने लगा तो मेरी भीतरी गांठें खुलने लगीं। मैंने देखा, उन लोगों की हर तीसरी बात में बनानी का ज़िक्र ज़रूर आता था। मैं बार-बार खुद को कोसने लगा - ऐसे वक्त क्यों आया! एक तो पूरे शहर की परिक्रमा करके उसके घर तक पहुंचा और यहां... उससे मिलना कितना सुखद होता।&lt;br /&gt; उस परिवार में दो-तीन घंटे बैठा रहा। अत्यन्त शालीन, सुसंस्कृत लोग। बेहद आत्मीय। जब चलने के लिए इजाज़त चाही तो आग्रह किया गया, एक बार फिर आऊं। उनके साथ एक और शाम बिताऊं। मैं हंसकर रह जाता हूं। फिर पूछा जाता है - बनानी के लिए कोई मैसेज देना चाहेंगे। एक इच्छा होती है-राघवेन्द्र के पत्र के साथ अपनी तरफ से दो लाइनें खिकर दे दूं, लेकिन टाल जाता हूं। दरवाजे से बाहर आते-आते अचानक पूछ बैठता हूं - क्या मैं बनानी का कमरा देख सकता हूं।&lt;br /&gt;•&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5913688233422255937-1033511632827556979?l=soorajprakash.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://soorajprakash.blogspot.com/feeds/1033511632827556979/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5913688233422255937&amp;postID=1033511632827556979&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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term='कहानी'/><title type='text'>पन्‍द्रहवीं कहानी - क्या आप ग्रेसी राफेल से मिलना चाहेंगे?</title><content type='html'>चर्चगेट। मुंबई में पश्चिमी रेलवे में उपनगरीय ट्रेनों का अंतिम पड़ाव। आप जब वहां पहुंचेंगे तो स्टेशन के अहाते से बाहर निकलने के लिए तीन तरफ के लिए तीन चार रास्ते मिलेंगे। दायीं तरफ, बायीं तरफ और सामने, नाक की सीध में। सीधे चलने पर बायीं तरफ खुलने वाला रास्ता पश्चिमी रेलवे के मुख्यालय और फांउटेन की तरफ जाता है। वहीं एक तरफ कैमिस्ट की दुकान है, और स्टेशन  के अहाते से बाहर आने के लिए तीन चार चौड़ी सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। वहीं वे आपको नज़र आयेंगी। उम्र पचपन के आस पास। बिखरे हुए, खिचड़ी बाल। रंग गोरा और चेहरा साफ। कभी वे बहुत खूबसूरत रही होंगी लेकिन अब उनके चेहरे पर और पूरे शरीर पर लम्बी थकान की भुतैली छाया है। साड़ी पुरानी और अक्सर थिगलियां लगी हुई। पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें। सामान के नाम पर उनके पास दो बड़े बड़े झोले हैं जिनमें पता नहीं क्या क्या अल्लम गल्लम भरा हुआ है। पास में एक मोटा सा सोंटा। कुत्ते भगाने के लिए। यही उनकी पूरी गृहस्थी है। पिछले बीस बरस से। और यही उनका ठीया भी है। इतने ही बरस से। सर्दी गरमी, बरसात, कोई भी मौसम हो, कोई भी समय रहा हो, दिन रात, आप उन्हें यहीं पर, हमेशा यहीं पर पायेंगे। अगर वे वहां नहीं भी होंती तो भी उनकी खाली जगह देख कर साफ महसूस होता है कि वे कहीं आस आस पास ही हैं और दो चार मिनट में ही लौट आयेंगी। अपने ठीये पर। वैसे भी उन्हें कहीं नहीं जाना होता। कहीं भी तो नहीं। कई बार हमारी गैर मौजूदगी ही हमारी मौजूदगी की चुगली खाने लगती है। हम किसी बंद दरवाजे की घंटी बजाते हैं तो घंटी की आवाज हमारे पास जस की तस लौट आती है और हम समझ जाते हैं कि घर में कोई भी नहीं है। और कई बार ऐसा भी होता है कि हम घंटी बजाते ही समझ जाते हैं कि अभी थ़ेडी ही देर में कोई जरूर ही दरवाजे तक आयेगा और हमारे लिए दरवाजा खोलेगा। कई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी मरीज से तीसरी चौथी बार मिलने के लिए अस्पताल जाते हैं और उसका खाली, साफ सुथरा बिस्तर देख कर एक पल के लिए चौंक जाते हैं और तय नहीं कर पाते कि हमारा मरीज चंगा हो कर अस्पताल से रिलीव हो गया है या इस  दुनिया से ही कूच कर गया है। हमारी असमंजस की हालत देख कर साथ वाले बिस्तर पर लेटा मरीज हमें संकट से उबारता है कि चिंता न करें, मरीज घर ही गया है। हमारी सांस में सांस आती है और हम वहां से लौट आते हैं।&lt;br /&gt; तो मैं बात कर रहा था मिसेज ग्रेसी राफेल की। मिसेज ग्रेसी राफेल लगभग बीस बरस पहले जब पागल खाने से छूट कर आयीं थीं तो उनके सामने पूरी दुनिया थी लेकिन ऐसी कोई भी जगह नहीं थी जिसे वे अपना घर कह कर साधिकार जा सकतीं। रही भी होंगी ऐसी जगहें कभी, तो वे भी उनकी अपनी नहीं रही थीं। उनके दिमाग से सब नाम, रिश्ते, घर, मकान, शहर धुल पुंछ चुके थे और जो बाकी बचे भी थे, वहां उन्हें जाना नहीं था। आखिर वहीं से तो वे पागल खानों में भेजी गयी थीं। पता नहीं, वे भी बचे था या नहीं। अब उनके सामने पूरी दुनिया थी और अपना कहने को कोई भी नहीं था।&lt;br /&gt; पागल खाने से बाहर आयी ठीक ठाक औरत कहां जाती और किसके पास जाती। सचमुच पागल होती तो सोचने की जरूरत ही नहीं थी, लेकिन वे पूरे होशो हवास में थीं और जानती थीं कि वे औरत हैं, अकेली हैं, अभी जवान हैं और बेसहारा है। शुरू शुरू में सुरक्षित और स्थायी ठीये की तलाश में इधर उधर भटकती रहीं। उस समय उनकी उम्र पैंतीस के आस पास थी। अलग अलग पागल खानों में सात आठ बरस गुजारने के बाद  और तथाकथित रूप से पागल करार दिये जाने के बावजूद उनमें इतनी समझ बाकी थी कि वे कहीं भी रहें, दिन तो कैसे भी करके गुज़ारा जा सकता था लेकिन लावारिस, अकेली और जवान औरत के लिए घर से बाहर कहीं भी, खाली जगह में और सार्वजनिक जगह पर रात गुजारना कितना मुश्किल और संकटों से भरा और असुरक्षित हो सकता है, वे इस बारे में सतर्क और सचेत होने के बावजूद भटकती रही थीं। सब जगह एक ही डर था। वे कहीं भी सुरक्षित नहीं थीं। जुबान तो वे कब से खो चुकीं थीं। वे अकेले के बल बूते पर इस मोर्चे पर कुछ भी नहीं कर सकती थीं। वे कई दिन तक इधर उधर डरी सहमी बिल्ली की तरह भटकती रही थीं। अलग अलग ठिकानों पर गयी थीं। धर्मशालाओं में, स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर लेकिन कहीं भी वे अपने आपको सुरक्षित नहीं पा सकी थीं। सब जगह देह नोचने और फाड़ खाने वाले ही तो थे। मौका मिलते ही अपने और उनके कपड़े उतारने लगते थे। ऐसे लोगों के लिए पागल, गरीब, बीमारी, बच्ची, बूढ़ी किसी में तब तक फर्क नहीं था जब तक वह मादा हो और नरपशु को तथाकथित यौन सुख देने की स्थिति में हो। पागल और भूखी मादा तो उनके लिए और भी  बेहतर थी क्योंकि उसका विरोध का स्वर उसे दो रोटी दे कर बंद किया जा सकता था। जहां लोग बीमार, अपने तन की हालत से बेसुध नंगी घूम रही पागल औरतों तक को नहीं बख्शते थे और दो रोटी के लालच में उनके साथ पशुवत कुकर्म करके उन्हें गर्भवती तक बना डालते थे, मिसेज राफेल तो फिर भी जवान और खूबसूरत थीं। लोग उनके पीछे कुत्तों की तरह जीभ लपलपाते घूमते रहते। वे सुरक्षित नहीं थीं। कहीं भी नहीं। औरतों में बेशक एक प्राकृतिक जन्मजात गुण होता है कि किसी भी तरह के शारीरिक यौन हमले के संकेत उन्हें पहले से ही मिलने शुरू हो जाते हैं और वे सतर्क हो जाती हैं। पागल की सी हालत में होने के बावजूद सबसे बड़ी खिलाफ सबसे बड़ी बात यह थी कि वे औरत थीं, जवान थीं, अकेली थीं और हर समय घर से बाहर थीं, असहाय थीं, और इन सारी चीजों के चलते यह मान लिया जाता था कि वे पुलिसवालों के लिए, चोर उचक्कों के लिए, प्लेटफार्मों पर सोने वालों के लिए, कुलियों, उठाईगीरों के लिए, और निट्ठलों के लिए सर्वसुलभ थीं। वे रात रात भर सहमी सहमी गठरी बनीं जगती रहतीं और एक जगह से दूसरी जगह, शहर दर शहर भटकतीं फिरी थीं। &lt;br /&gt;और आखिर उन्हें यही जगह सबसे मुफीद लगी थी। इसका कारण यह था कि चर्चगेट स्टेशन लगभग रात एक डेढ़ बजे तक जागता रहता था और दो ढाई घंटे की कच्ची पक्की नींद ले कर साढ़े तीन बजे तक सवेरे की सवारियां उठाने के लिए फिर जाग जाता और अपने काम धाम पर लग जाता था। वे अपने आपको यहां काफी हद तक महफूज समझ सकती थीं। बेशक शुरू शुरू में कई बरस तक वे यहां भी लगातार डरी हुई हालत में रात भर दुबकी बैठी रहती थीं। उस पर भी उन्हें चैन न लेने दिया जाता। वहीं खुले आसमान तले रहने को अभिशप्त बूट पालिश वाले, निठल्ले सारी रात उन्हें परेशान करते, उनका सामान बिखेर देते, लालच देते, धमकियां देते, मारते, उन पर पानी गिरा देते, उनका सारा का सारा सामान कई कई बार गायब कर देते, इधर उधर फैंक आते, रेलवे रिजर्व पुलिस वाले उन्हें बचाने के बजाये आये दिन उन्हें वहां से खद़ेड देते, या थाने ले जाने के बहाने उन्हें अंधेरे कोनों में ले जाने की फिराक में रहते ताकि बहती गंगा में खुद भी हाथ धो सकें। वे अपना सारा का सारा ताम झाम उठाये अपने आपको बचाने की हर चंद कोशिशें करतीं। उन्हें गालियां देतीं, शोर मचातीं और उनके आगे हाथ पैर जोड़तीं। सुनवायी कहीं नहीं थी। पुलिस वालों के जाते ही हौले हौले वहीं आ बैठतीं। शुरू शुरू में उन्हें सताने के आलम यह था कि उठाईगीरे उनका सामान उठा न लें जायें इस डर से उन्हें स्टेशन पर ही बने बाथरूम तक जाने के लिए दो चार मिनट के लिए ही सही, अपना सारा सामान अपने साथ ढो कर बाथरूम तक ले जाना पड़ता। बेशक वे खुद भी नहीं  ही जानती होंगी कि इन बड़े बड़े थैलों में क्या भरा हुआ है और कब से भरा हुआ है। काम का है भी या नहीं, लेकिन अब ये सब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है।&lt;br /&gt; बाद में बाथरूम की भंगिनों ने जब उन्हें पहचान लिया और उनके अस्तित्व को वहां स्वीकार भी कर लिया तभी जा कर उनकी समस्याएं कुछ हद तक कम हुई थीं। &lt;br /&gt; और इस बात में ही कई बरस बीत गये थे कि उन्हें चर्चगेट पर स्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बीच नागरिकता दे दी गयी थी और लोग बाग उनकी मौजूदगी को सहज रूप से स्वीकार कर पाये थे। कई बार हमें पूरी उम्र लग जाती है अपने अस्तित्व को स्वीकार करवाने में। हम मौजूद होते हैं लेकिन देखने, जानने और महसूस करने के बावजूद हमारी मौजूदगी को हमेशा नज़रअंदाज़ किया जाता है। हम हैं या नहीं हैं लोग इस बात को अपनी सुविधा के अनुसार तय करते हैं। हमारी सारी कोशिशों के बावजूद।  &lt;br /&gt; वैसे तो वे हर समय ही फुर्सत में होती हैं। कभी बैठी होती हैं तो कभी लेटी, और कई बार सचमुच सो भी रही होती हैं। लेकिन जब वे अच्छे मूड में होती हैं, खास कर शाम के वक्त तो आप उन्हें किसी भी सुघड़ गृहिणी की तरह, अपने खुद के धोये कपड़ों की तह लगाते, हौले हौले कुछ गुनगुनाते देख सकते हैं। उनके सारे काम, दिनचर्या के सारे के सारे काम स्टेशन पर, यहीं पर पूरे होते हैं। वे वहीं नहाती धोती, खाती पीती, सोती जागती और अपने नित्यकर्म निपटाती हैं। इसके अलावा तो उन्हें और कोई काम होता ही नहीं है।   &lt;br /&gt; यह मुंबई की ही खासियत है कि यहां सारी चीजें एक बार तय हो जायें तो हमेशा वैसे ही चलती रहती है। बिना किसी व्यवधान के। बरसों बरस। भीख या दान या खैरात देने वाले और लेने वाले भी तय हैं। लोग बरसों बरस उन्हीं भिखारियों को या जरूरतमंदों को भीख देते चले आते हैं। लगभग उसी समय के आस पास आते हैं, सवेरे ऑफिस जाते समय या वापिस आते समय वे रुकते हैं, या गाड़ी रोकते हैं, और अपने तयशुदा भिखारी या जरूरतमंद को खाने के पैकेट, बिस्किट के पैकेट, वड़ा पाव या कुछ और चुप चाप दे कर आगे बढ़ जाते हैं। बिना कुछ भी बोले। ऐसा अरसे तक चलता ही रहता है। &lt;br /&gt; ग्रेसी राफेल का गुज़ारा भी इसी तरह से चलता है। उन्हें चाय पिलाने वाले तय हैं। खाना खिलाने वाले तय हैं और उन्हें कपड़े लत्ते देने वाले भी तय हैं। कुछ लोग उन्हें नकद पैसे भी दे जाते हैं। वे बरसों से वहां हैं। लाखों लोग स्टेशन से रोजाना दोनों वक्त गुजरते हैं, उन्हें वहां देखते हैं। बिना आंखें मिलाये या बात किये भी उनकी मौजूदगी को स्वीकार करते हैं तो यह अहसास पनपने लगता है कि हम चीजों को एक समय के बाद जस का तस स्वीकार कर लेते हैं। ऑफिस जाने वाली महिलाएं जाते समय पुरानी साड़ियों, पुराने कपड़ों, शालों, या अंडर गार्मेंट्स के पैकेट उन्हें चुपचाप थमा कर आगे बढ़ जाती हैं। कोई उनके जीवन में नहीं झांकता और न ही किसी किस्म का सवाल ही पूछा जाता है। बस, मौन की भाषा और इतना सा लेनदेन। यही सिलसिला शाम के वक्त भी चलता है। महिलाएं अक्सर उन्हें त्यौहार के दिनों में कोई पकवान या खाने की दूसरी चीजें भी दे जाती हैं। वे ये सारी चीजें चुपचाप अपने पास रख लेती हैं और देने वाले की तरफ देखती भी नहीं। किसी किस्म की कोई प्रतिक्रिया नहीं। कई बार देर रात तक उनके ठीये के पास पाव भाजी के स्टाल लगाने वाले भी उन्हें पाव भाजी या वड़ा पाव वगैरह दे देते हैं या कोई ग्राहक ही उनके लिए पाव भाजी खरीद देता है और वे खा लेती हैं। लेकिन वे न तो किसी से कुछ मांगती हैं और न ही किसी की दी हुई चीज को ठुकराती ही हैं।&lt;br /&gt;और इसी तरह से चल रही है जिंदगी ग्रेसी राफेल की। अरसे से, निरुद्देश्य, अर्थहीन। खाली खाली दिन, खाली खाली रातें, किसी से कोई भी संवाद नहीं, सम्पर्क नहीं, लेन देन नहीं, कहीं आना जाना नहीं, कोई काम नहीं। शायद ही वे कभी किसी से बात करती हों, या कोई उनसे संवाद करता हो। वे किसी के सुख दुख में शामिल नहीं हैं और उनके दुख? वे तो किसी ने जाने ही नहीं। वे कहीं भी किसी की जिंदगी में नहीं हैं और न ही उनकी ज़िंदगी में ही कोई बचा है। वे बीस बरस से इसी तरह का जीवन जीती चली आ रही हैं। आगे भी इसी तरह का निचाट जीवन उन्हें जीते जाना है। बेकार सा, बेमतलब सा और बेरौनक सा। उनकी स्मृति में कुछ भी बाकी नहीं बचा है। न अच्छा न बुरा। जो था भी, उसे वे कब का भुला चुकी हैं। वे सिर्फ वर्तमान में जी रही हैं। वर्तमान भी कैसा? जिसे न ढोया जा सकता है न त्यागा। कितनी अजीब बात है कि दुनिया में करोड़ों लोग बेकार की, बेमतलब की और कई बार बेहद तकलीफ भरी ज़िंदगी जीते चले जाते हैं लेकिन जीना छोड़ता कोई भी नहीं। जो जैसा चल रहा है, चलने दो, जब तक चलता है चलने दो। भविष्य कैसा है ये तो वे पिछले बीस बरसे से देख ही रही हैं। जो है, उसमें बेहतरी की गुंजाइश ही कहां बची है। &lt;br /&gt;उन्हें पता है कि किसी सुबह वे यहीं इसी ठीये पर मरी हुई पायी जायेंगी। बेशक उनके ठीक पास से लाखों लोग रोजाना गुज़रते हैं, काफी  देर तक लोगों को पता ही नहीं चलेगा कि लेटी नहीं, वे यहां से हमेशा के लिए जा चुकी है। उन्हें पता है उन्हें लावारिस मौत मरना है। और लावारिस मरने वालों का न कोई नाम होता है न धर्म या जाति ही। बीस बरस से उन्होंने जो जगह घेर रखी है, वह जरूर खाली हो जायेगी। शुरू शुरू में आने जाने वालों को अजीब लगेगा लेकिन कुछ दिन बाद वह जगह खाली देखने की लोगों को आदत पड़ जायेगी।&lt;br /&gt; लेकिन वे हमेशा से ऐसी नहीं थीं। उनका भी घर बार था, उनकी ज़िंदगी में भी कई लोग थे और वे भी कई रिश्ते जी रही थीं। पत्नी, मां, बेटी, बहन सब के सब रिश्ते उन्होंने भी जीये हैं। और खूब जीये हैं। वे भी एक सम्मानजनक जीवन जी रही थीं और उनका भी अच्छा खासा घर-बार था, सामाजिक दायरा था और वे एक सुघड़ गृहणी के रूप में, एक सफल पत्नी के रूप में और एक आदर्श मां के रूप में पूरे सात आठ बरस तक रहीं थीं। उनका नाम था,  अपना सर्किल था और पहचान थी। ये सब आगे भी बने रहते अगऱ .  . . । अगर  . . .  बहुत सारे अगर मगर हैं। कहां तक गिनायें। एक कारण से दूसरा जुड़ता चला गया और वे अकेली, असहाय और निरुपाय होती चली गयीं। काश, उनके पिता की असमय मौत न हुई होती, काश, उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में न छोड़नी पड़ती। काश, उन्हें हैदराबाद न जाना पड़ता, न उन्होंने टाइपिंग सीखी होती और न उन्हें मिस्टर राफेल के ऑफिस में नौकरी करनी पड़ती और न ही मिस्टर राफेल पसंद करके ब्याह करके घर ले आते और न ही वे मिस्टर राफेल के शक की शिकार न हो गयी होतीं। इस शक ने एक हंसता खेलता परिवार हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर दिया था और वे अपना घर बार होते हुए भी न केवल बेघर बार हो गयीं थीं बल्कि एक ऐसा अभिशप्त जीवन जीने के लिए मजबूर हो गयीं थीं जिसके बारे में वे कभी सोच भी नहीं सकतीं थीं कि चेरियन परिवार की यह होनहार लड़की एक दिन चर्चगेट स्टेशन पर इस हालत में बीस बरस के लम्बे अरसे तक रहने को मजबूर होगी और उससे पहले उसे सात आठ बरस बिना पागल हुए भी पागल बन कर दूसरी पगली औरतों के बीच अलग अलग पागल खानों में गुजारने पड़ेंगे। कब सोचा था उन्होंने कि उनके लिए पूरी दुनिया ही अपरिचित हो जायेगी और उनका किसी से भी, यहां तक कि अपने बच्चों से भी हमेशा हमेशा के लिए नाता टूट जायेगा। वे एक ऐसी गुमनाम और बेरहम जिंदगी जीने को अभिशप्त हो जायेंगी जिसमें कभी किसी से भी एक भी संवाद की गुंजाइश ही न बचे। पता नहीं, उन्हेंने आखिरी बार किससे, कब और क्या बात की होगी।   &lt;br /&gt; आज की ग्रेसी राफेल तब ग्रेसी चेरियन हुआ करती थीं। वे कई बार अपने स्कूल की बेस्ट स्टूडेंट का खिताब पा चुकी थीं और स्कूल के स्पोर्ट्स डे पर सबसे ज्यादा ईनाम बटोर कर लाना उनके लिए बायें हाथ का खेल था। वे स्कूल की शान थीं और तय था, अपने घर में, रिश्तेदारी में और अपने समाज में उन्हें हमेशा एक ऐसी लड़की के रूप में देखा और सराहा जाता था जो चेरियन परिवार का नाम खूब रौशन करेगी। वे कर ही रही थीं और आगे भी तरक्की की और सीढ़ियां चढ़तीं। बचपन में वे खूब हंसती थीं। खुद भी हंसती और सारे घर में हंसी बिखेरती रहतीं। उनकी हंसने की आदत का यह आलम था कि बात बेबात पर जब देखो खिड़खिड़ कर रही हैं। घर वाले उनकी हंसी से परेशान हो कर कोसते कि जब ससुराल जायेगी तो सारी हंसी धरी की धरी रह जायेगी। वे जवाब देतीं कि तब की तब देखी जायेगी। कई बार मज़ाक में कही गयी बातें भी किस तरह से भविष्यवाणियां बन जाया करती है। उनकी हंसी पर भी नज़र लग गयी और वह हमेशा के लिए थम गयी।&lt;br /&gt; अभी वे ग्यारहवीं में ही पढ़ रही थीं कि उनके पिता को व्यापार में घाटा होने लगा। घर का आर्थिक ग्राफ एकदम नीचे आ गया और घर में खाने के भी लाले पड़ने लगे। एक दिन अचानक उनके पिता नींद में ही चल बसे और किसी को कुछ करने या सोचने का मौका ही न मिला। ग्रेसी भाई बहनों में सबसे बड़ी थी इसलिए उसी को अपनी पढ़ाई अधबीच में ही छोड़ देनी पड़ी। एक बसा-बसाया घर देखते ही देखते भुखमरी के कगार पर आ गया। &lt;br /&gt; घर में कोई भी कमाने वाला नहीं बचा था। नारियल और रबड़ की थोड़ी बहुत खेती थी लेकिन उससे न तो कर्ज पट सकते थे और न ही घर का खर्च ही चल सकता था। जैसे-तैसे घर की गाड़ी खींची जा रही थीं। कुछ दिन वे हैदराबाद में अपनी चचेरी बहन के पास भी रही थीं। उनकी चचेरी बहन और जीजा दोनों ही एक सरकारी संस्थान में काम करते थे और उनकी बहन की डिलीवरी होने वाली थी। डिलीवरी से पहले बहन की सेवा करने और बाद में नवजात बच्चे की देखभाल करने के लिए किसी की जरूरत थी। ग्रेसी की पढ़ाई वैसे भी छूट चुकी थी और यही उचित समझा गया कि उन्हें वहां भेज दिया जाये। उनका दिल भी लगा रहेगा और वे कुछ न कुछ सीख कर ही लौटेंगी। निश्चित ही इसके पीछे आर्थिक समीकरण भी काम कर ही रहे थे। और इस तरह ग्रेसी को हैदराबाद भेज दिया गया था। उस समय उनकी उम्र मात्र सत्रह बरस थी और हैदराबाद जाने के साथ ही उनका घर हमेशा के लिए छूट गया था। &lt;br /&gt; हैदराबाद में दीदी के घर रहते हुए ही उन्होंने टाइपिंग सीखी थी और जीजा जी ने उन्हें अपने एक परिचित मिस्टर राफेल के ऑफिस में टाइपिस्ट की नौकरी दिलवा दी थी। ग्रेसी ने अपनी मेहनत के बल पर ऑफिस में एक खास जगह बना ली थी और वे खासी लोकप्रिय हो गयी थीं। और यही मेहनत और लोकप्रियता उनके लिए जी का जंजाल बन गयी थी। आर्थिक मोर्चे पर आत्म निर्भर हो जाने के बाद उनका आत्म विश्वास भी बढ़ा था और वे घर पर भी पैसे भेजने लगीं थीं ताकि भाई बहनों की पढ़ाई का कोई सिलसिला बन सके।  &lt;br /&gt;कम्पनी के मैनेजर मिस्टर के टी राफेल अक्सर उन्हें अपने केबिन में बुलवाने लगे थे और ऑफिस के बाद भी उन्हें देर तक किसी न किसी काम में उलझाये रहते। इधर उधर की बातें करते और किसी न किसी बहाने ग्रेसी के पहनावे की, काम की और खूबसूरती की तारीफें किया करते। वे इन तारीफों का मतलब खूब समझती थीं और उनकी आंखों में लपलपाती काम वासना को साफ साफ पढ़ सकती थीं। वे शर्म से लाल हो जातीं लेकिन जानते बूझते हुए भी कुछ न कह पातीं। एक तो वे अपने खुद के घर पर नहीं थीं और दूसरे कम्पनी के मैनेजर उनके जीजा के दोस्त थे। वे किसी को भी नाराज़ करने की स्थिति में नहीं थीं और कुल मिला कर उनकी उम्र अभी उन्नीस बरस भी नहीं हुई थी, जबकि राफेल कम से कम पैंतीस बरस के थे। वे उनके और उनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में कुछ भी नहीं जानती थीं। वे अपना काम खत्म करके जितनी जल्दी हो सके, केबिन से बाहर आने की कोशिश करतीं।&lt;br /&gt;तभी एक दिन मिस्टर राफेल ने खुद उनके घर आ कर ग्रेसी के जीजा जी से ग्रेसी का हाथ मांग लिया था। भला जीजा को क्या एतराज हो सकता था। उन्होंने अपनी ड्यूटी पूरी कर दी थी। ग्रेसी को काम धंधे से लगा ही दिया था। ग्रेसी की मम्मी से औपचारिक सहमति ले ली गयी थी और इस तरह ग्रेसी चेरियन स्टार एंटरप्राइजेज की मामूली टाइपिस्ट से रातों रात मैनेजर की ब्याहता बन गयी थीं। &lt;br /&gt;वे समझ नहीं पायी थीं कि उन्हें इस तरक्की पर खुश होना चाहिये या अफसोस मनाना चाहिये। उनके बस में है ही क्या कि चीजों का विरोध कर सकें। उनका बस चलता तो वे खूब पढ़ना चाहतीं, राष्ट्रीय स्तर की एथलीट बनना चाहतीं और एक शानदार ज़िंदगी जीना चाहतीं। अब उनके हिस्से में अपनी पसंद का कुछ भी नहीं रहा था। हंसना तो वे कम से भूल चुकी थीं अब तक बोलना भी छूटने लगा था। घर छूट चुका था और वे अब वही कुछ स्वीकार करने को मजबूर थीं जो दूसरे उनके लिए तय करें। &lt;br /&gt;उन्होंने इस शादी के लिए एक ही शर्त रखी कि उन्हें कुछ दिन तक अपनी पगार का कुछ हिस्सा घर पर भेजने की अनुमति दी जाये ताकि भाई बहन तो अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। बाकी जो जैसा हो रहा है होने दो। लेकिन इस वायदे का भी कुछ मतलब नहीं रहा था क्योंकि जल्दी ही उनकी नौकरी छुड़वा दी गयी थी। लड़ने का सबसे बड़ा हथियार आर्थिक आधार होता है और इसी मामले में उन्हें कमजोर कर दिया गया था। &lt;br /&gt;शादी के बाद ही उन्हें पता चला था कि उनके पति हद दरजे के शराबी आदमी हैं और चरित्र के भी कमजोर हैं। उनकी जिंदगी में अक्सर लड़कियां आती जाती रहती हैं। ग्रेसी ने तब यही सोचा था कि शादी से पहले वे जैसे भी भी रहें हों, अब तो घर बार बस जाने के बाद उनकी जीवन शैली बदलेगा ही और उनका भटकाव कम होगा। लेकिन ये उनका भ्रम था। शादी के बाद भी उनकी जीवन शैली में कोई भी फर्क नहीं आया था। वे खूब पीते थे और कोई शाम ऐसी नहीं गुजरती थी जब वे धुत्त होने के स्तर तक न पी लेते हों। शुरू शुरू के कुछ दिन तक तो वे बिलकुल ठीक रहे और वक्त पर घर आते रहे लेकिन जल्दी ही वे अपने रंग में आ गये थे। वे बाहर से भी पी कर आते थे और घर पर फिर से बोतल खोल कर बैठ जाते। अकेले ही। बेशक ग्रेसी की अब तक खूब तारीफ करते रहे थे और उन्हें खुद पसंद करके लाये थे फिर भी कुछ ऐसा था कि जिसे भीतरी खुशी नहीं कहा जा सकता था। कोई उमंग नहीं, खुशी नहीं और नयापन नहीं। जैसे वे ग्रेसी को घर लाने के बाद उन्हें भूल ही गये थे। घर में लाये किसी भी सामान की तरह। नौकरी तो उनकी तुंत ही छुड़वा दी गयी थी। ग्रेसी उनकी शराब की आदत को ले कर या देर रात घर आने को ले कर कुछ कहना चाहतीं तो वे झिड़क देते कि मुझे किसी की भी कोई भी बात सुनने की आदत नहीं है। मैं अपना काम कर रहा हूं और तुम अपना काम करो। घर संभालो।&lt;br /&gt;ग्रेसी सारा दिन खाली बैठी बैठी बोर होतीं। दीदी जीजा भी ऑफिस गये होते इसलिए उनके घर जाने का भी मतलब न होता। उन्होंने अपने आपको पूरी तरह घर के लिए समर्पित कर दिया था लेकिन घर की जरुरतें इतनी कम थीं कि उनके पास सारा दिन बोर होने के अलावा कुछ भी न होता। उन्होंने एक बार दबी जबान में राफेल से कहा था कि वे आगे पढ़ना चाहती हैं और हो सके तो काम भी करना चाहती हैं लेकिन राफेल को दोनों ही बातें मंजूर नहीं थीं। एक बार फिर झिड़क कर मना कर दिया। वे कट कर रह गयीं। ऐसी भी शादी क्या कि पति से कोई संवाद ही नहीं। वे कब जाते हैं, कब आते हैं और कितना घर पर रहते हैं और जब घर पर रहते हैं तो बीवी से कितनी देर बात करते हैं इस बारे में ग्रेसी को न क
